गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ७९ परस्पर आलिङ्गन किये जानेपर ही शृङ्गार रस परिपुष्ट होता है, जो तुम्हारे (श्रीराधाजीके) साथ ही सम्भव है। फिर भी तुम्हारा स्मरण करते हुए श्रीश्यामसुन्दरकी लीलाचेष्टा देखो। शृङ्गार रसमें पञ्चम रागका ही प्रायः गान किया जाता है। भरत मुनिने कहा भी है— पञ्चमं मध्य भूयिष्ठं हास्य शृङ्गारयोर्भवेत्। अर्थात् हास्य तथा शृङ्गार रसमें मध्यताल प्रचुर पञ्चम राग ही गाया जाता है॥२॥ कापि विलास-विलोल-विलोचन-खेलन-जनित-मनोजम्। ध्यायति मुग्धवधूरधिकं मधुसूदन-वदन-सरोजम्— [हरिरिह-मुग्ध-वधूनिकरे... ॥३ ॥] अन्वय—सखि, कापि मुग्धवधूः (नवीना रमणी) विलास-विलोल-विलोचन-खेलन-जनित-मनोजम् (विलासेन विलोलयोः चटुलयोः विलोचनयोः नयनयोः खेलनेन चालनभङ्ग्या कटाक्षपातेनेत्यर्थः जनितः मनोजः कामः यत्र तत् यथास्यात् तथा) मधुसूदन-वदन-सरोजम् (श्रीहरिमुख-पङ्कजम्) अधिकं (अतिमात्रं) ध्यायति (चिन्तयति निरीक्षते; भ्रमरवत् रसविशेषा- न्वेषणपर इति श्लिष्ट-मधुसूदन-पदोपन्यासः) [अन्यत् पूर्ववत्] ॥३॥ अनुवाद—देखो सखि ! श्रीकृष्ण जिस प्रकार निज अभिराम मुखमण्डलकी शृङ्गार रस भरी चञ्चल नेत्रोंकी कुटिल दृष्टिसे कामिनियोंके चित्तमें मदन विकार करते हैं, उसी प्रकार यह एक वराङ्गना भी उस वदनकमलमें अश्लिष्ट (संसक्त) मकरन्द पानकी अभिलाषासे लालसान्वित होकर उन श्रीकृष्णका ध्यान कर रही है। पद्यानुवाद— कोई लास लोल लोचनसे बने सहज मतवाले। मधुसूदनके मुख सरसिजमें ठगी, दीठ-मधु ढाले ॥