गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ७९ परस्पर आलिङ्गन किये जानेपर ही शृङ्गार रस परिपुष्ट होता है, जो तुम्हारे (श्रीराधाजीके) साथ ही सम्भव है। फिर भी तुम्हारा स्मरण करते हुए श्रीश्यामसुन्दरकी लीलाचेष्टा देखो। शृङ्गार रसमें पञ्चम रागका ही प्रायः गान किया जाता है। भरत मुनिने कहा भी है— पञ्चमं मध्य भूयिष्ठं हास्य शृङ्गारयोर्भवेत्। अर्थात् हास्य तथा शृङ्गार रसमें मध्यताल प्रचुर पञ्चम राग ही गाया जाता है॥२॥ कापि विलास-विलोल-विलोचन-खेलन-जनित-मनोजम्। ध्यायति मुग्धवधूरधिकं मधुसूदन-वदन-सरोजम्— [हरिरिह-मुग्ध-वधूनिकरे... ॥३ ॥] अन्वय—सखि, कापि मुग्धवधूः (नवीना रमणी) विलास-विलोल-विलोचन-खेलन-जनित-मनोजम् (विलासेन विलोलयोः चटुलयोः विलोचनयोः नयनयोः खेलनेन चालनभङ्ग्या कटाक्षपातेनेत्यर्थः जनितः मनोजः कामः यत्र तत् यथास्यात् तथा) मधुसूदन-वदन-सरोजम् (श्रीहरिमुख-पङ्कजम्) अधिकं (अतिमात्रं) ध्यायति (चिन्तयति निरीक्षते; भ्रमरवत् रसविशेषा- न्वेषणपर इति श्लिष्ट-मधुसूदन-पदोपन्यासः) [अन्यत् पूर्ववत्] ॥३॥ अनुवाद—देखो सखि ! श्रीकृष्ण जिस प्रकार निज अभिराम मुखमण्डलकी शृङ्गार रस भरी चञ्चल नेत्रोंकी कुटिल दृष्टिसे कामिनियोंके चित्तमें मदन विकार करते हैं, उसी प्रकार यह एक वराङ्गना भी उस वदनकमलमें अश्लिष्ट (संसक्त) मकरन्द पानकी अभिलाषासे लालसान्वित होकर उन श्रीकृष्णका ध्यान कर रही है। पद्यानुवाद— कोई लास लोल लोचनसे बने सहज मतवाले। मधुसूदनके मुख सरसिजमें ठगी, दीठ-मधु ढाले ॥
८० श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—मुग्धानायिकाकी चेष्टाओंका वर्णन करती हुई सखी कह रही है—वह नायिका श्रीकृष्णके मुख कमलका ध्यान कर रही है। श्रीश्यामसुन्दर प्रेमविलासके कारण विलसित अपने चञ्चल नेत्रोंसे दृष्टि डालकर वर रमणियोंके मदनविकारको अभिवर्द्धित कर रहे हैं और अत्यधिक आनन्दका अनुभव मन-ही-मन कर रहे हैं। मुग्धा नायिकामें लज्जाका प्राचुर्य होता है, अतएव उसकी शृङ्गारिक चेष्टाएँ बड़ी ही मर्यादित होती हैं॥३॥ कापि कपोलतले मिलिता लपितुं किमपि श्रुतिमूले। चारु चुचुम्ब नितम्बवती दयितं पुलकैरनुकूले— [हरिरिह-मुग्ध-वधूनिकरे... ॥४॥] अन्वय—सखि, नितम्बवती (विपुलनितम्बा) कापि (तरुणी गोपाङ्गना) श्रुतिमूले (कर्णमूले) किमपि लपितुं (भाषितुं) मिलिता (किञ्चित् कथनच्छलेन सङ्गता सती) पुलकैः (रोमाञ्चैः) [प्रियतम-स्पर्शसुखेन-अधीरा सतीति भावः] अनुकूले (अभिलाषुकै, प्रियाभिलाषसूचके इति यावत्) कपोलतले (प्रियतमस्य गण्डदेशे) चारु (मनोज्ञं यथास्यात् तथा) दयितं (प्रियं हरिं) चुचुम्ब॥४॥ अनुवाद—वह देखो सखि! एक नितम्बिनी (गोपी) ने अपने प्राणवल्लभ श्रीकृष्णके कर्ण (श्रुतिमूल) में कोई रहस्यपूर्ण बात करनेके बहाने जैसे ही गण्डस्थलपर मुँह लगाया तभी श्रीकृष्ण उसके सरस अभिप्रायको समझ गये और रोमाञ्चित हो उठे। पुलकाञ्चित श्रीकृष्णको देख वह रसिका नायिका अपनी मनोवाञ्छाको पूर्ण करने हेतु अनुकूल अवसर प्राप्त करके उनके कपोलको परमानन्दमें निमग्न हो चुम्बन करने लगी। पद्यानुवाद— चारु नितम्बवती कोई मिस कानोंमें कुछ कहने— पुलक कपोल चूम श्रीहरिके लगी प्रेम रस बहने ॥
प्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ८१ बालबोधिनी-नितम्बवती किसी प्रौढ़ा नायिकाकी सौन्दर्या- तिशयताको इस पद द्वारा सूचित किया गया है। सखियोंके बीचमें प्रियतमका चुम्बन करना अनुचित है, इसलिए कार्यान्तर बोधनका बहाना बनाकर उसने श्रीकृष्णके कपोलप्रान्तको चूम लिया-इस वाक्यांशके द्वारा नायिकाके शृङ्गार वैदग्ध्यको सूचित किया गया है, यहाँ श्रीकृष्ण अनुकूल नायक हैं ॥४॥ केलि-कला-कुतुकेन च काचिदमूं यमुनावनकुले। मञ्जुल-वञ्जुल-कुञ्जगतं विचकर्ष करेण दुकूले- [हरिरिह-मुग्ध-वधूनिकरे... ॥५॥] अन्वय-सखि, काचित् (गोपललना) यमुनाकूले (यमुनातीरे) मञ्जुल-वञ्जुल-कुञ्जगतं (मञ्जुलः मनोहरः यः वञ्जुलकुञ्जः लतादिपिहितो वेतसकुञ्जः तत्र गतं) अमुं (हरिं) केलिकला- कुतुकेन (केलिकलायां सुरतनैपुण्ये यत् कुतुकम् औत्सुक्यं तेन हेतुना) करेण (हस्तेन) दुकूले (पीताम्बरे) विचकर्ष (आकृष्टवती) ॥५॥ अनुवाद-सखि ! देखो, यमुना पुलिनपर मनोहर वेतसी (वञ्जुल या बेंत) कुञ्जमें किसी गोपीने एकान्त पाकर काम रस वशवर्त्तिनी हो क्रीड़ाकला कौतूहलसे उनके वस्त्रयुगलको अपने हाथोंसे पकड़कर खींच लिया। पद्यानुवाद- केलि कलाकुल कोई गोपी, यमुना जलके तीरे। ले जाने हरि, वसन खींचती, वञ्जुल वनमें धीरे ॥ बालबोधिनी-सखी किसी अधीरा नायिकाका वर्णन करते हुए श्रीराधासे कहती है, श्रीकृष्ण जब मनोहर वेतसी लताकुञ्जमें गये हुए थे, तब वह अधीरा नायिका श्रीकृष्णका वस्त्र पकड़कर उन्हें यमुना किनारे ले गयी; क्योंकि वह रहकेलि कलाकौतूहलसे आविष्ट हो गई थी। 'च' कारसे तात्पर्य है कि उसने विजन स्थान देखकर श्रीकृष्णके साथ अनेक प्रकारसे परिहास किया।
८२ श्रीगीतगोविन्दम् यमुनातीरे न कहकर यमुना जलतीरे कहनेका अभिप्राय है कि जलके समान ही तटपर शैत्य (शीतलता) तथा पावनता भी है। अन्य नायिकामें अनुरक्त श्रीकृष्णका वस्त्र खींचकर ले जाना अधीरताका अभिव्यञ्जक है ॥५ ॥ करतल-ताल-तरल-वलयावलि-कलित-कलस्वन-वंशे। रासरसे सहनृत्यपरा हरिणा युवतिः प्रशंससे— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥६ ॥] अन्वय—सखि, हरिणा (श्रीकृष्णेन) करतल-ताल-तरल- वलयावलि-कलित-कलम्बने-वंशे (करतलयोः पाणितलयोः तालेन ध्वनिविशेषेण तरला चञ्चला या वलयावलिः कङ्कणश्रेणिः तया कलितः अनुपूरितः कलम्बनः मधुरस्वरो वंशः वाद्यविशेषः यस्मिन् तादृशे) रासरसे (रासोत्सवे) सहनृत्यपरा (सहनृत्यन्ती) काचित् युवतिः प्रशंससे (साधु साध्विति प्रशंसिता) ॥६॥ अनुवाद—हाथोंकी तालीके तानके कारण चञ्चल कंकण- समूहसे अनुगत वंशीनादसे युक्त अद्भुत स्वरको देखकर श्रीहरि रासरसमें आनन्दित नृत्य-परायणा किसी युवतीकी प्रशंसा करने लगे। पद्यानुवाद— जिसकी ताल समय कर-चूड़ी वंशी-स्वरमें खनकी। रास-सखी की स्तुति श्रीहरिने जी भर भर कर की॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीसे कह रही है कि रासलीलामें श्रीकृष्णके साथ नृत्य करती हुई कोई युवती तान, मान, लयके साथ हाथोंसे ताली बजाने लगी, जिससे उसकी चूड़ियाँ एक दूसरेसे टकराकर अभिघातके कारण मधुर ध्वनि प्रकट करने लगीं और इस प्रकार वलयकी खनकाहट और वंशीध्वनि मिलकर अद्भुत मधुर नाद प्रस्तुत करने लगी, जिसे सुनकर श्रीकृष्ण पुनः पुनः उस रमणीकी प्रशंसा करने लगे ॥६ ॥
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ८३ श्लिष्यति कामपि चुम्बति कामपि कामपि रमयति रामां। पश्यति सस्मित-चारुतराम्परामनुगच्छति वामां— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥७॥] अन्वय—सखि, [हरिः] कामपि (तरुणीं) श्लिष्यति (आलिङ्गति),; कामपि चुम्बति; कामपि रामां रमयति (क्रीड़ाकौतुकेन सुखयति); सस्मित-चारुतराम् (सस्मिता अतएव चारुतरा ताम्; मृदुमधुर-हासेन अतिमनोहरामित्यर्थः) [कामपि] पश्यति; [तथा] अपरां वामाम् (प्रतिकूलाम्, प्रणयकोपवशात् अभिमानभरेण स्थानान्तर-गामिनीम्) अनुगच्छति ॥७॥ अनुवाद—शृङ्गार-रसकी लालसामें श्रीकृष्ण कहीं किसी रमणीका आलिङ्गन करते हैं, किसीका चुम्बन करते हैं, किसीके साथ रमण कर रहे हैं और कहीं मधुर स्मित सुधाका अवलोकन कर किसीको निहार रहे हैं तो कहीं किसी मानिनीके पीछे-पीछे चल रहे हैं। पद्यानुवाद— किसी सखीको भुजमें भरते और किसीसे रसते। गीले कर फिर किसी अधरको, किसी आँखमें हँसते ॥ कहीं किसीके पीछे पीछे छायासे हरि चलते। वृन्दावनके लताकुञ्जकी क्रीड़ा कहते कहते ॥ बालबोधिनी—रासक्रीड़ामें श्रीकृष्ण विविध रूप धारण करके क्रीड़ोन्मुख नायिकाओंके साथ विविध शृङ्गारिक चेष्टाओंको किया करते हैं। सम्भोग सुखकी लालसाके वशीभूत होकर श्रीकृष्ण कभी किसी कामिनीका आलिङ्गन करते हैं तो कभी किसीका चुम्बन। कहीं किसीके साथ विहार कर रहे हैं तो कहीं सरस रसपूर्ण नेत्रोंसे किसी वर सुन्दरीका सतृष्ण भावसे निरीक्षण कर रहे हैं और कभी विभ्रमके कारण किसी वराङ्गनाको 'श्रीराधा' कहकर सम्बोधित कर रहे हैं, जिससे वह मानिनी हो जाती है। रतिकी भावना तीव्र होनेपर चेष्टाविशेषके साथ उसका अनुगमन करते हैं।
८४ श्रीगीतगोविन्दम् मानिनी गोपीके रति पराङ्मुख होनेपर बार-बार अनुनय विनय करते हुए उसके क्रोध (रोष) को विगलित करनेका प्रयास करते हैं। प्रस्तुत श्लोकमें श्रीकृष्णका शठत्व, धृष्टत्व, दक्षिणत्व, अनुकूलत्व तथा धूर्त्तत्व दिखायी देता है। सभी नायिकाएँ अभिसारिका नायिकाएँ हैं। शृङ्गारतिलक ग्रन्थमें धृष्ट नायकके लक्षण इस प्रकार बताये हैं— अभिव्यक्तान्य तरुणी भोगलक्ष्मापि निर्भयः। मिथ्यावचन दक्षश्च धृष्टोऽयं खलु कथ्यते॥ (शृ. ति. १-१७) अर्थात् अन्य तरुणीके साथ सम्भोगके चिह्नोंके स्पष्ट रहनेपर भी बिना भयके निपुणताके साथ जो झूठ बोलता है, उसे धृष्ट नायक कहते हैं। शठके लक्षण इस प्रकार बताये गये हैं— प्रियं व्यक्ति पुरोऽन्यत्र विप्रियं कुरुते भृशम्। निगूढ़मपराधं च शठोऽयं कथितो बुधैः॥ (शृ. ति. १-१८) अर्थात् विद्वानोंने उस नायकको शठ नायक कहा है, जो अपने अपराधको छिपाये रहता है। किसी दूसरी नायिकाके प्रति आसक्त रहता है और अपनी नायिकाके समक्ष मीठी-मीठी बातें करता है॥७॥ श्रीजयदेव-भणितमिदमद्भुत-केशव-केलि-रहस्यं । वृन्दावन-विपिने ललितं वितनोतु शुभानि यशस्यम्— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे...॥८॥] अन्वय—श्रीजयदेव-भणितम् (श्रीजयदेवेन भणितम् उक्तम्) वृन्दावन-विपिने ललितं (मनोहरं) यशस्यम् (यशस्करम्) इदम् अद्भुत-केशव-केलिरहस्यं (अद्भुतम् वैदग्धी-विशेषेण
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ८५ विचित्रं श्रीराधाविलापपरीक्षणरूपं केशवस्य केलिरहस्यं) [भक्तानां] शुभानि वितनोतु (विस्तारयतु) ॥८॥ अनुवाद— श्रीजयदेव कवि द्वारा रचित यह अद्भुत मङ्गलमय ललित गीत सभीके यशका विस्तार करे। यह शुभद गीत श्रीवृन्दावनके विपिन विहारमें श्रीराधाजीके विलास परीक्षण एवं श्रीकृष्णके द्वारा की गयी अद्भुत कामक्रीड़ाके रहस्यसे सम्बन्धित है। यह गान वन बिहारजनित सौष्ठवको अभिवर्द्धित करनेवाला है॥ पद्यानुवाद— मग्न हुए रस सरिमें कवि 'जय' निशिदिन बहते बहते। श्रोता भी हों मुक्त क्लेशसे सब कुछ सहते सहते॥ बालबोधिनी—गीतके उपसंहारमें कहा गया है कि कवि जयदेवजीने श्रीकेशवकी अद्भुत केलिक्रीड़ा-रहस्यका इस गीतमें निरूपण किया है। अद्भुत रहस्य यह है कि एक ही श्रीकृष्णने एक ही समयमें अनेक वराङ्गनाओंकी अभिलाषाओंकी पूर्त्ति करते हुए उनके साथ क्रीड़ा की। ताल और रागमें आबद्ध होनेके कारण यह गीत अति ललित है। इसके लालित्यका सबसे बड़ा कारण यह है कि इसमें श्रीकेशवकी केलि-कलाका रहस्य वर्णित है। यह मञ्जुल मधुर गीत पढ़ने और सुननेवाले भक्तजनोंका कल्याण करे और उनके सुयशकी वृद्धि करे॥८॥ विश्वेषामनुरञ्जनेन जनयन्नानन्दमिन्दीवर- श्रेणीश्यामल-कोमलैरूपनयन्नङ्गै रनङ्गोत्सवम् । स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीभिरभितः प्रत्यङ्गमालिङ्गितः शृङ्गारः सखि मूर्त्तिमानिव मधौ मुग्धो हरिः क्रीड़ति ॥१९॥ अन्वय—सखि, अनुरञ्जनेन (स्वस्ववाञ्छातिरिक्त-रसदान- प्रीणतेन) विश्वेषाम् (जगताम्) आनन्दं जनयन्, मुग्धः (सुन्दरः)
८६ श्रीगीतगोविन्दम् हरिः मधौ (वसन्ते) इन्दीवर-श्रेणी-श्यामल-कोमलैः (नीलोत्पल- श्रेणीतोऽपि श्यामलैः सुकुमारैश्च) अङ्गैः अनङ्गोत्सवं (कामोल्लासं) उपनयन् (संवर्द्धयन्) [अत्र इन्दीवर-शब्देन शीतलत्वं, श्रेणीशब्देन नवनवायमानत्वं, श्यामलपदेन सुन्दरत्वं, कोमलशब्देन सुकुमारत्वञ्च सूचितम्] अभितः, (समस्ततः, सर्वैरङ्गैरित्यर्थः) व्रजसुन्दरीभिः स्वच्छन्दं, [यथास्यात् तथा] प्रत्यङ्गम् (प्रत्यवयम्) आलिङ्गितः (प्रगाढाश्लिष्टः; आलिङ्गनानु-रञ्जनेनानुरञ्जित इत्यर्थः) मूर्त्तिमान् (देहधरः) शृङ्गारः (शृङ्गाररसः) इव क्रीड़ति (एक एव विश्वमनुरञ्जयन् आनन्दयति) [शृङ्गार-रसोऽपि श्यामवर्णः—यथा— स्थायी भावो रतिः श्यामवर्णोऽयं विष्णुदैवतः इति] ॥९॥ अनुवाद— हे सखि ! इस वसन्तकालमें विलास-रसमें उन्मत्त श्रीकृष्ण मूर्त्तिमान शृङ्गार रसस्वरूप होकर विहार कर रहे हैं। वे इन्दीवर कमलसे भी अतीव अभिराम कोमल श्यामल अङ्गोंसे कन्दर्प महोत्सवका सम्पादन कर रहे हैं। गोपियोंकी जितनी भी अभिलाषा है, उससे भी कहीं अधिक उनकी उन्मत्त लालसाओंको अति अनुरागके साथ तृप्त कर रहे हैं। परन्तु व्रजसुन्दरियाँ विपरीत रतिरसमें आविष्ट हो विवश होकर उनके प्रत्येक अङ्गप्रत्यङ्गको सम्यक् एवं स्वतन्त्र रूपसे आलिङ्गित कर रही हैं ॥१॥ पद्यानुवाद— हैं विहर रहे मधु ऋतुमें, अनुरागमयी आँखोंसे— कोमल श्यामल सरसिजकी, मधु स्निग्धमयी पाँखोंसे ॥ है अङ्ग अङ्ग आलिङ्गित, मृदु गोपीजन-अङ्गोंमें। शृङ्गार-मूर्त्ति हरि दीपित, जन करते रस-रङ्गोंसे ॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीकी उद्दीपना भावनाको अभिवर्द्धित करने हेतु उन्हें प्रियतम श्रीहरिकी शृङ्गारिक चेष्टाओंको दिखलाती हुई कहती है—सखि ! देखो, इस समय वसन्तकाल है, इसमें भी मधुमास है और श्रीहरि मुग्ध होकर
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ८७ समस्त गोपीयोंके साथ साक्षात् शृङ्गार रसके समान क्रीड़ा विलास कर रहे हैं, शृङ्गारः सखिः मूर्त्तिमानिव—श्रीकृष्णको मूर्त्तिमान शृङ्गार रसके समान बनाकर सखीके द्वारा उनका प्रमदासङ्गत्व स्वरूप व्यक्त हुआ है। पुरुषः प्रमदायुक्तः शृङ्गार इति संज्ञितः—प्रमदासे युक्त पुरुष शृङ्गार कहलाता है। गोपियोंकी जितनी भी अभिलाषा रही, उससे भी कहीं अधिक रूपमें श्रीकृष्ण अनङ्ग-उत्सव द्वारा उनका अनुरञ्जन कर रहे हैं, आनन्दवर्द्धन कर रहे हैं। वे श्रीहरि अनुरागके द्वारा समस्त जीवोंको आनन्द प्रदान कर रहे हैं। श्रीकृष्णके अङ्गोंका सौन्दर्य वर्णन करते हुए सखी कहती है कि वे नीलकमलसे भी अधिक श्यामल तथा कोमल हैं। इन्दीवर शब्दसे शीतलत्व, श्यामलत्व और कोमलत्व सूचित होता है। और भी इन्दीवर शब्दसे शैत्य और श्रेणी शब्दसे नव-नवायमानत्व समझा जाता है। श्यामल शब्दसे सुन्दरत्व और कोमल शब्दसे सुकुमारत्व घोषित होता है। अपने इन कोमलतम अङ्गोंके द्वारा श्रीकृष्ण कामोत्सव मना रहे हैं। व्रजसुन्दरियाँ बिना किसी अवरोधके स्वच्छन्दतापूर्वक उनके उन-उन अङ्गोंका आलिङ्गन किये हुए हैं। रस निष्पत्ति दो प्रकारसे होती है। नायकका नायिकाके प्रति तथा नायिकाका नायकके प्रति अनुरागसे। नायकका नायिकाके प्रति अनुराग रहनेपर भी नायिकाका नायकके प्रति जबतक अनुराग नहीं होता तब तक रसकी निष्पत्ति नहीं हो सकती है। प्रश्न होता है कि यहाँ तो परस्पर अनुरञ्जन मात्र हुआ है, तब रस कहाँ है ? विभाव, अनुभाव, सात्त्विक तथा सञ्चारी भावोंके सम्मिलनमें रसकी स्थिति है। यही रस स्नेह, मान, प्रणय,
८८ श्रीगीतगोविन्दम् राग-अनुराग, भाव-महाभाव आदिके क्रमसे अभिवर्द्धित होता है। अतः जब प्रेमका परिपाक हो जाता है तब रसका अभ्युदय होता है। यह प्रेम-रस जब प्रकाशित होने लगता है, तब नायक-नायिकामें काल, देश और क्रियाके सम्बन्धमें कोई सङ्कोच नहीं रहता। निःसङ्कोच भाव रहनेपर भी मिलनमें सम्पूर्णता नहीं हो सकती, इसके उत्तरमें कहते हैं कि महाभाव रसके द्वारा सर्वाङ्ग मिलन सिद्ध होता है। पुनः शङ्का होनेपर कि श्रीकृष्णने अङ्गनाओंका केवल एकदेशीय रूपमें अवलोकन किया है तो इसका निराकरण यह है कि प्रत्यङ्गमालिङ्गित-अर्थात् श्रीकृष्णने सर्वाङ्ग-एक-एक अङ्गको यथोचित क्रियाओं द्वारा आलिङ्गन, चुम्बन, स्पर्श आदिके द्वारा उन सबका अनुरञ्जन किया है। अब फिर यह प्रश्न सामने आया कि एकाकी श्रीकृष्णने सबका आलिङ्गन कैसे किया ? समाधान यह है कि जैसे शृङ्गार रस एक होकर भी समस्त जगतमें परिव्याप्त है, उसी प्रकार श्रीकृष्णमें भी सर्वव्यापकत्व है। इसी गुणसे वह अखिल विश्वका अनुरञ्जन करते हैं। प्रस्तुत श्लोकमें दीपकालङ्कार है, वैदर्भी रीति है, शार्दूल विक्रीड़ित छन्द है, शृङ्गार रस है तथा वाक्यौचित्य है। सम्पूर्ण गीतकी नायिका श्रीराधा उत्कण्ठिता नायिका हैं। नायकके द्वारा विपरीत आचरण किये जाने पर जो नायिका विरहोत्कण्ठिता तथा उदास रहती है, वह उत्कण्ठिता नायिका कहलाती है॥१॥ रासोल्लासभरेण विभ्रम-भृतामाभीर-वामभ्रुवा- मभ्यर्णे परिरभ्य निर्भरमुरः प्रेमान्धया राधया। साधु तद्वदनं सुधामयमिति व्याहृत्य गीतस्तुति- व्याजादुद्भटचुम्बितः स्मितमनोहारी हरिः पातु वः ॥२॥ इति श्रीगीतगोविन्द महाकाव्ये सामोद दामोदर नाम प्रथमः सर्गः।
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ८९ अन्वय—[अधुना कविर्वसन्तरासमनुवर्णयन् शारदीय- रासकृत-श्रीराधाकृष्ण-विलासमनुस्मरन् तद्वर्णनरूपया आशिषा भक्तान् संवर्द्धयति]—प्रेमान्धया (अनुरागभरेण ज्ञानशून्यया) राधया रासोल्लासभरेण (रासोत्सवानन्दातिशयेन) विभ्रमभृताम् (हावभाव-समन्विताम्) आभीर-वामभ्रुवाम् (गोप-ललनानां) [मध्ये] अभ्यर्णं (समीपे) निर्भरं (गाढं यथा तथा) उरः (वक्षः) परिरभ्य (आश्लिष्य), त्वद्वदनं (तव मुखं) साधु सुधामयम् (पीयूषपूर्णम्) इति गीतस्तुतिव्याजात् (गानप्रशंसाच्छलेन) व्याहृत्य (उक्त्वा) उद्घटचुम्बितः (प्रगाढचुम्बितः) [अतएव] स्मितमनोहारी (स्मितेन मनोहरणशीलः) हरिः वः (युष्मान्) [भक्तानिति भावः] पातु॥ [अतएव सर्गोऽयं श्रीराधा-विलासानुभवेन सम्यङ्मोदेन सह वर्त्तमानो दामोदरो यत्र स इति सामोद-दामोदरः प्रथमः] ॥१०॥ अनुवाद—जिस श्रीकृष्णके प्रेममें अन्धी होकर विमुग्धा श्रीराधा लज्जाशून्य होकर रासलीलाके प्रेममें विह्वला शुभ्रा गोपाङ्गनाओंके समक्ष ही उनके वक्षःस्थलका सुदृढ़रूपसे आलिङ्गन कर 'अहा नाथ' तुम्हारा वदनकमल कितना सुन्दर है, कैसी अनुपम सुधाराशिका आकर है—इस प्रकार स्तुति-गान करती हुई सुचारु रूपसे चुम्बन करने लगी तथा श्रीराधाकी ऐसी प्रेमासक्ति देखकर हृदयमें स्वतःस्फूर्त्त आनन्दके कारण जिस श्रीकृष्णका मुखकमल मनोहर हास्यभूषणसे विभूषित होने लगा, ऐसे हे श्रीकृष्ण! आप सबका मङ्गलविधान करें। पद्यानुवाद— मधु रास-मुग्ध सखि सम्मुख मातल राधा भर भुजमें— हरिको; बोली—'प्रिय, कितना है अमृत मुख सरसिजमें।' फिर गीत-स्तुति मिस सत्वर वह चूम उठी मुख उनका। प्रिय चुम्बनसे प्रमुदित हरि अब दूर करें दुःख सबका॥ बालबोधिनी—यह प्रथम सर्गका अन्तिम श्लोक है। इस सर्गका नाम सामोद-दामोदर है।
९० श्रीगीतगोविन्दम् सखी वासन्ती रातका चित्राङ्कन करते हुए श्रीराधाजीको शारदीया रासस्थित श्रीकृष्णके विलासका स्मरण कराने लगी। श्रीकृष्ण वसन्त ऋतुमें कामोत्सवमें मग्न हैं। लीलानायक श्रीकृष्ण आभीर वामनयना गोपियोंके मध्य विराजमान हैं। पहले तो श्रीराधा विरहोत्कण्ठिता थी, किन्तु सखीसे प्रेरित होने पर उनके हृदयमें उत्कट अभिलाषा जाग उठी। लज्जाशीला होनेपर भी प्रेमावेशके कारण सभी सखियोंके समक्ष सुधामय वाक्योंसे स्तुतिगान करनेके बहाने श्रीकृष्णके वक्षःस्थलका सुदृढ़ आलिङ्गन कर उनका चुम्बन करने लगी। समस्त व्रजरम्भाओंके समक्ष राधाके हृदयका भाव निःसङ्कोच उद्घाटित होनेपर श्रीकृष्णका मुखमण्डल मञ्जुल हर्षसे परिपूर्ण हो गया। शील-स्वभावा श्रीराधिकाकी विदग्धता एवं रासोल्लासके कारण विभ्रम भावोन्मत्ता प्रेमान्धतासे अभिभूत हुए श्रीकृष्ण सबका मङ्गल विधान करें। प्रस्तुत श्लोकमें नायिका प्रगल्भा है और नायक मुग्ध है। शार्दूल विक्रीड़ित छन्द है। आशीः, अप्रस्तुत प्रशंसा, व्याजोक्ति आदि अलङ्कार हैं। इति बालबोधन्यां श्रीगीतगोविन्दटीकायां प्रथमः सर्गः। 卐卐卐
द्वितीयः सर्गः (अक्लेश-केशवः) विहरति वने राधा साधारण-प्रणये हरौ विगलित-निजोत्कर्षादीर्ष्यावशेन गतान्यतः। क्वचिदपि लताकुञ्जे गुञ्जन्मधुव्रत-मण्डली- मुखर-शिखरे लीना दीनाप्युवाच रहः सखीम् ॥१॥ अन्वय—[अथ सखीवचनं निशम्य श्रीकृष्णस्य साधारण- विहरणं विलोक्य ईर्ष्यादयात् तद्दर्शनमप्यसहमाना अन्यतोगता राधा सखीमुवाच]—साधारण-प्रणये (साधारणः समानः सर्वास्वेव गोपाङ्गनासु इति शेषः प्रणयः प्रीतिः यस्य तथाभूते) हरौ (कृष्णे) वने विहरति (विहारं कुर्वति सति) राधा विगलित- निजोत्कर्षात् (विगलितो निजोत्कर्षः अहमेव असाधारणी प्रिया इत्येवं रूपेण यतस्तस्मादित्यर्थः (ईर्ष्यावशेन) (अन्योत्कर्षा- सहिष्णुताया) दीना (कातरा) [सती] [प्रणयतारतम्यादपि विहारस्य साम्यव्यवहरणात् श्रीकृष्णस्य स्वभावान्यथात्वदर्शनाक्षमतया] अन्यतः (अन्यस्मिन्) गुञ्जन्मधुव्रत-मण्डली-मुखर-शिखरे (गुञ्जन्तो ये मधुव्रताः (भ्रमरास्तेषां मण्डलीभिः श्रेणीभिः मुखरं ध्वनितं शिखरम् अग्रं यस्य तादृशे) क्वचिदपि लताकुञ्जे लीना लुक्कायिता सती) रहः (निर्जने) सखीम् [अत्यन्तगोप्यमपि] उवाच ॥१॥ अनुवाद—समस्त गोपाङ्गनाओंके साथ एक समान स्नेहमय श्रीकृष्णको वृन्दाविपिनमें विहार करते हुए देखकर अन्य गोपिकाओंकी अपेक्षा अपना वैशिष्ट्य न होनेसे प्रणय-कोपके आवेशमें वहाँसे दूर जाकर भ्रमर-मण्डलीसे गुञ्जित दूसरे लताकुञ्जमें श्रीराधा छिप गयी एवं अति दीन होकर गोपनीय बातोंको भी सखीसे कहने लगी।
९२ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— राधा बोल उठी मनकी लख हरि गोपीजनकी क्रीड़ा निशिदिन वृन्दावनकी अलिकुल-गुञ्जित लता-कुञ्जमें छिपकर जीवन-धनकी। लीलासे ईर्षाहित होकर भूली सुध-बुध तनकी राधा बोल उठी मनकी ॥१॥ बालबोधिनी—इस द्वितीय सर्गका नाम अक्लेश-केशव है। तात्पर्य यह है कि स्वयं-भगवान् रसिक-शेखर श्रीकृष्ण सदैव क्लेशरहित हैं। उनमें क्लेशका संक्लेश मात्र भी नहीं है। भगवान्के दो असाधारण चिह्न हैं— १. अखिलहेयप्रत्यनिकत्त्व, अर्थात् भगवान्से किसी प्रकारके क्लेश-कर्म-विपाक आदि प्राकृतिक दोषोंका सम्पर्क नहीं होता है। वे सभी दोषोंके प्रत्यनीक हैं अर्थात् प्रबल शत्रु हैं। योगसूत्रकारने भी साधनपादमें कहा है— क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः। अर्थात् क्लेश कर्म, उनके परिणाम तथा वासनादि दोषोंके सम्पर्कसे रहित पुरुषविशेषको ईश्वर शब्दसे अभिहित किया जाता है। २. अखिल कल्याण गुणाकरत्व—श्रीकृष्ण सम्पूर्ण संसारका कल्याण करनेवाले अप्राकृत सद्गुणोंके आकर हैं। इन्हीं अर्थोंके कारण इस सर्गका नाम अक्लेश-केशव है। मानवती श्रीराधा सखीके समझाये जानेपर श्रीकृष्णके मदन-महोत्सवमें सम्मिलित हो गयीं। इस मदन-उत्सवमें श्रीकृष्ण सभी सखियोंके प्रति समान स्नेह रखते हुए विहार कर रहे थे। जब कि श्रीराधाको यह गर्व था कि मैं उनकी सर्वश्रेष्ठा वल्लभा हूँ, नित्य सहचरी हूँ, परन्तु आज अपने प्रति विशिष्ट स्नेह प्रदर्शित न होनेसे श्रीराधा प्रणय-कोपके
द्वितीयः सर्गः-अक्लेश-केशवः ९३ आवेशमें अन्यत्र एक कुञ्जमें चली आयीं और छिपकर बैठ गयीं। ईर्ष्याकषायिता श्रीराधाको वहाँ भी कहीं शान्ति नहीं मिली। इस लताकुञ्जके शिखरपर पुष्पोंमें मँडराता हुआ अलिवृन्द गुञ्जार कर रहा था। उस समय श्रीराधा अपनी मानकी वेदनासे पीड़ित होकर अपनी सखीसे उन रहस्यात्मक बातोंको कहने लगी, जिन्हें किसीके समक्ष कहा नहीं जाना चाहिए। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छन्द है। हरिणी छन्दका लक्षण है—‘रसयुग हयैः न्सौ म्नौ स्लौ गो यदा हरिणी।’ नायिका प्रौढ़ा है। रतिभावके उद्रेकातिशयके कारण रसवदलङ्कार तथा अनुप्रास अलङ्कार हैं। अपि-सोत्कर्ष भावमयी राधा कुछ न बोल सकनेकी स्थितिमें थीं, रहस्यमयी बातें बतलाने वाली नहीं थीं, यह ‘अपि’ शब्दके द्वारा घोषित है। अतः ‘अपि’ शब्द चमत्कारातिशय युक्त है। गुर्ज्जरी रागेण यति तालेन गीयते ॥ प्रबन्ध ५॥ प्रस्तुत श्लोक पञ्चम प्रबन्धकी पुष्पिका रूप है। दूसरे श्लोकसे इसका समुचित प्रारम्भ है। यह प्रबन्ध गुर्ज्जरी-राग तथा यति-तालसे गाया जाता है॥१॥ गीतम् ॥५॥ गुर्ज्जरीराग यतितालाभ्यां गीयते सञ्चरदधर-सुधा-मधुर-ध्वनि-मुखरित-मोहन-वंशं बलित-दृगञ्चल-चञ्चल-मौलि-कपोल-विलोल-वतंसम्। रासे हरिमिह विहित-विलासं स्मरति मनो मम कृत-परिहासम् ॥१॥ध्रुवम्॥ अन्वय-सखि, सञ्चरदधर-सुधा मधुर-ध्वनि-मुखरित- मोहन-वंशं (सञ्चरन्ती उद्गच्छन्ता अधरसुधा यत्र तेन
“हरि-मूरतका ध्यान, हो आता अनजान”
द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः ९५ मधुरेण ध्वनिना मुखरितः शब्दितः मोहनः मनोमोहकरः वंशः वेणु येन तादृशं) वलित-दृगञ्चल-चञ्चल-मौलि-कपोल- विलोल-वतंसं (वलितेन इतस्ततः प्रचरता दृगञ्चलेन दृशोः नेत्रयोः अञ्चलं चक्षुःप्रान्तभागः तेन कटाक्षेणेत्यर्थः योऽसौ चञ्चलमौलिः कम्पितशिरोभूषणं तेन कपोलयोः गण्डयोः विलोलौ चञ्चलौ वतंसौ मणिकुण्डले यस्य तादृशं) इह रासे (शारदीय-रासलीलायां) विहितविलासं (विहितः कृतः विलासः हावभावो येन तादृशं) [तथा] कृतपरिहासं (कृतः परिहासो येन तादृशं) हरिं मम मनः स्मरति ॥१॥ अनुवाद—सखि, कैसी आश्चर्यकी बात है कि इस शारदीय रासोत्सवमें श्रीकृष्ण मुझे छोड़कर अन्य कामिनियोंके साथ कौतुक आमोदमें विलास कर रहे हैं। फिर भी मेरा मन उनका पुनः पुनः स्मरण कर रहा है। वे सञ्चरणशील अपने मुखामृतको अपने करकमलमें स्थित वेणुमें भरकर फुत्कारके साथ सुमधुर मुखर स्वरोंमें बजा रहे हैं, अपाङ्ग-भङ्गीके द्वारा अपने मणिमय शिरोभूषणको चञ्चलता प्रदान कर रहे हैं, उनके कानोंके आभूषण कपोल देशमें दोलायमान हो रहे हैं, उनके इस श्याम रूपका, उनके हास-परिहासका मुझे बारम्बार स्मरण हो रहा है॥१॥ पद्यानुवाद— हे सखि! कम्पित अधर मधु-ध्वनित वेणु-स्वर चलित दृगञ्चल चञ्चल शिर, भर— गति कपोल द्वय लोल वलय वर रास विलास हास कृत मनहर हरि मूरतका ध्यान, हो आता अनजान ॥ बालबोधिनी—सखिने कहा—प्रिय राधिके! जब श्रीकृष्णने तुम्हारा प्रत्याख्यान किया है, तब तुम क्यों उनके प्रेममें इतनी अधीर हो रही हो?
९६ श्रीगीतगोविन्दम् सखीके द्वारा अपनी भर्त्सना सुनकर श्रीराधा अति दीन भावसे कहने लगी—सखि ! तुम ठीक कह रही हो, श्रीकृष्ण मेरा परित्याग कर दूसरी रमणियोंके साथ अतिशय अनुरागयुक्त होकर विहार कर रहे हैं, तब उनके प्रति मेरा अनुराग प्रकाशित होना व्यर्थ ही है, पर मैं क्या करूँ? मुझे उनकी नर्मकेलिका अनुभव है, उनके विलासोंका स्मरण हो रहा है, सखि ! ये वे ही केलिवन हैं, जहाँ हमने केलिसुख प्राप्त किया था, उनके प्रति मेरी प्रबल आसक्ति है, मुझसे उनका त्याग नहीं होता। सब समय उनके गुणोंका ही स्मरण होता रहता है। मेरे हृदयमें उनके दोषका लेशमात्र भी भाव नहीं उठता, मुझे सदैव सन्तुष्टि रहती है। जब श्यामसुन्दर रास-रजनीमें व्रजाङ्गनाओंके साथ हास-परिहास करते हैं तब—सञ्चरदधर सुधा मधुर ध्वनि मुखरित विग्रहम्—सञ्चरन्त्या अधरसुधया मधुरो ध्वनि यत्र तद् यथा स्याद् तथा मुखरिता मोहिनी वंशी येन तम्। वे जब अधरसुधासे संक्रान्त मधुर-ध्वनि करनेवाली उस वंशीको बजाते हैं, जिसका मोहनकारित्व प्रख्यात है, उस समय मेरा मन अस्थिर हो जाता है, मैं अपना धैर्य खो बैठती हूँ। उनके अङ्गोंका सौन्दर्य, चञ्चल शिरोभूषण, दोलायमान कर्णकुण्डल तथा विशेषकर गोप-युवतियोंका आलिङ्गन चुम्बन स्मरण करते ही मैं सुधबुध खो बैठती हूँ—सखि मैं क्या करूँ? ॥१॥ चन्द्रक-चारु-मयूर-शिखण्डक-मण्डल-वलयित-केशं। प्रचुर-पुरन्दर-धनुरनुरञ्जित-मेदुर-मुदिर-सुवेशं ॥ रासे हरिमिह ... ... ॥२॥ अन्वय—सखि, चन्द्रक-चारु-मयूर-शिखण्डक-मण्डल- वलयितकेशं (चन्द्रकेण अर्द्धचन्द्राकारेण चारूणां मयूरशिखण्डकानां मयूरपुच्छानां मण्डलेन वलयितः वेष्टितः केशो यस्य तादृशं) [अतएव] प्रचुरपुरन्दर-धनुरनुरञ्जित-चित्रितः मेदुरः स्निग्धो यो
द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः ९७ मुदिरो नवजलधरः तद्वत् सुशोभनो वेशो यस्य तादृशं) [रासे विहितविलासमित्यादि] ॥२॥ अनुवाद—अर्द्धचन्द्राकारसे सुशोभित अति मनोहर मयूर- पिच्छसे वेष्टित केशवाले तथा प्रचुर मात्रामें इन्द्रधनुषोंसे अनुरञ्जित नवीन जलधर पटलके समान शोभा धारण करनेवाले श्रीकृष्णका मुझे अधिक स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— चन्द्रक चारु मयूर शिखण्डित कोमल केश वलय आमण्डित। प्रचुर पुरन्दर धनु अनुरञ्जित सघन मेघ-छवि वपु बहु सज्जित॥ बालबोधिनी—मोर पंखके अन्तिम भागमें बने हुए वृत्ताकार मण्डलको 'चन्द्रक' कहा जाता है। चन्द्रमाके समान यह भी आह्लाददायक होता है। इन्हीं मधुर पिच्छोंसे श्रीकृष्णका केशपाश वलयित हो रहा है। उससे उनका श्यामवर्ण ऐसे प्रतीत हो रहा है, मानो सजल मेघ अनेक इन्द्रधनुषोंसे सुसज्जित हो, उन्हींके कमनीय दिव्य विग्रहका मुझे बारबार स्मरण हो रहा है॥२॥ गोप-कदम्ब-नितम्बवती-मुख-चुम्बन-लम्भित-लोभं। बन्धुजीव-मधुराधर-पल्लवमुल्लसित-स्मित-शोभम्॥ रासे हरिमिह ... ... ॥३॥ अन्वय—सखि, गोप-कदम्ब-नितम्बवती-मुखचुम्बन-लम्भित- लोभम् (गोप-कदम्बस्य गोपकुलस्य या नितम्बवत्यः नितम्बिन्यः तरुण्यः तासां मुख-चुम्बने लम्भितः प्रापितः लोभः यस्य तं) [तथा] बन्धुजीव-मधुराधर-पल्लवम् (बन्धुक-पुष्पवत् अरुणः मधुरः मनोहरश्च अधरपल्लवो यस्य तादृशम्) [तथा] उल्लसित-स्मित-शोभम् (उल्लासिता परिवर्द्धिता स्मितेन मृदुमधुरहासेन शोभा यस्य तथोक्तम्) [मम मनः रासे विहितविलासमित्यादि] ॥३॥
९८ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—गोपललनाओंके मुखकमलका चुम्बन करनेकी अभिलाषासे इस अनङ्ग उत्सवमें अपने मुखको झुकाये हुए, उनका सुकुमार अधर पल्लव बन्धुक कुसुमवत् मनोहारी अरुण वर्णीय हो रहा है, स्फूत्तियुक्त मन्द-मुस्कानकी अपूर्व शोभा उनके सुन्दर मुखमण्डलमें विस्तार प्राप्त कर रही है, ऐसे उन श्रीकृष्णका मुझे अति स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— गोप वधू चुम्बन-रस लोभित अधर वधूक स्मित मधु शोभित। पुलक युवति-भुज अति आलिङ्गित पद-कर मणि-द्युति निशि-तमचूर्णित ॥ हरि मूरतका ध्यान हो आता अनजान ॥ बालबोधिनी—गोपवधुओंके मुख चुम्बनका लोभ धारण करनेवाले श्रीकृष्णकी मुझे याद आ रही है। जिस समय वे रहस्यमयी कुञ्जक्रीड़ामें निमग्न रहते हैं, उस समय उन गोपियोंके मुखका बारंबार चुम्बन करनेका लोभ बढ़ता जाता है। श्रीकृष्णके बन्धुक अर्थात् दुपहरियाके पुष्पके समान लाल-लाल होंठका मुझे स्मरण आता है। सखि ! मुस्करानेपर तो उनकी शोभा और भी बढ़ जाती है। विपुल-पुलक-भुज-पल्लव-वलयित-वल्लव-युवति-सहस्रं। कर-चरणोरसि-मणिगण-भूषण-किरण-विभिन्न-तमिस्रं— रासे हरिमिह ... ... ॥४॥ अन्वय—सखि, विपुल-पुलक-भुजपल्लव-वलयित- वल्लव-युवति- सहस्रं (विपुलाः अगाधाः पुलका रोमाञ्चा ययोस्ताभ्यां भुजपल्लवाभ्यां पल्लव-पेलव-भुजाभ्यां वलयितं परिवेष्टितम् आलिङ्गितमित्यर्थः वल्लव-युवतीनां गोप-तरुणीनां सहस्रं येन तम्; एकदानेकालिङ्गनात् नैकनिष्ठप्रेमाणमित्यर्थः);