गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः ९७ मुदिरो नवजलधरः तद्वत् सुशोभनो वेशो यस्य तादृशं) [रासे विहितविलासमित्यादि] ॥२॥ अनुवाद—अर्द्धचन्द्राकारसे सुशोभित अति मनोहर मयूर- पिच्छसे वेष्टित केशवाले तथा प्रचुर मात्रामें इन्द्रधनुषोंसे अनुरञ्जित नवीन जलधर पटलके समान शोभा धारण करनेवाले श्रीकृष्णका मुझे अधिक स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— चन्द्रक चारु मयूर शिखण्डित कोमल केश वलय आमण्डित। प्रचुर पुरन्दर धनु अनुरञ्जित सघन मेघ-छवि वपु बहु सज्जित॥ बालबोधिनी—मोर पंखके अन्तिम भागमें बने हुए वृत्ताकार मण्डलको 'चन्द्रक' कहा जाता है। चन्द्रमाके समान यह भी आह्लाददायक होता है। इन्हीं मधुर पिच्छोंसे श्रीकृष्णका केशपाश वलयित हो रहा है। उससे उनका श्यामवर्ण ऐसे प्रतीत हो रहा है, मानो सजल मेघ अनेक इन्द्रधनुषोंसे सुसज्जित हो, उन्हींके कमनीय दिव्य विग्रहका मुझे बारबार स्मरण हो रहा है॥२॥ गोप-कदम्ब-नितम्बवती-मुख-चुम्बन-लम्भित-लोभं। बन्धुजीव-मधुराधर-पल्लवमुल्लसित-स्मित-शोभम्॥ रासे हरिमिह ... ... ॥३॥ अन्वय—सखि, गोप-कदम्ब-नितम्बवती-मुखचुम्बन-लम्भित- लोभम् (गोप-कदम्बस्य गोपकुलस्य या नितम्बवत्यः नितम्बिन्यः तरुण्यः तासां मुख-चुम्बने लम्भितः प्रापितः लोभः यस्य तं) [तथा] बन्धुजीव-मधुराधर-पल्लवम् (बन्धुक-पुष्पवत् अरुणः मधुरः मनोहरश्च अधरपल्लवो यस्य तादृशम्) [तथा] उल्लसित-स्मित-शोभम् (उल्लासिता परिवर्द्धिता स्मितेन मृदुमधुरहासेन शोभा यस्य तथोक्तम्) [मम मनः रासे विहितविलासमित्यादि] ॥३॥