गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ श्रीगीतगोविन्दम् सखीके द्वारा अपनी भर्त्सना सुनकर श्रीराधा अति दीन भावसे कहने लगी—सखि ! तुम ठीक कह रही हो, श्रीकृष्ण मेरा परित्याग कर दूसरी रमणियोंके साथ अतिशय अनुरागयुक्त होकर विहार कर रहे हैं, तब उनके प्रति मेरा अनुराग प्रकाशित होना व्यर्थ ही है, पर मैं क्या करूँ? मुझे उनकी नर्मकेलिका अनुभव है, उनके विलासोंका स्मरण हो रहा है, सखि ! ये वे ही केलिवन हैं, जहाँ हमने केलिसुख प्राप्त किया था, उनके प्रति मेरी प्रबल आसक्ति है, मुझसे उनका त्याग नहीं होता। सब समय उनके गुणोंका ही स्मरण होता रहता है। मेरे हृदयमें उनके दोषका लेशमात्र भी भाव नहीं उठता, मुझे सदैव सन्तुष्टि रहती है। जब श्यामसुन्दर रास-रजनीमें व्रजाङ्गनाओंके साथ हास-परिहास करते हैं तब—सञ्चरदधर सुधा मधुर ध्वनि मुखरित विग्रहम्—सञ्चरन्त्या अधरसुधया मधुरो ध्वनि यत्र तद् यथा स्याद् तथा मुखरिता मोहिनी वंशी येन तम्। वे जब अधरसुधासे संक्रान्त मधुर-ध्वनि करनेवाली उस वंशीको बजाते हैं, जिसका मोहनकारित्व प्रख्यात है, उस समय मेरा मन अस्थिर हो जाता है, मैं अपना धैर्य खो बैठती हूँ। उनके अङ्गोंका सौन्दर्य, चञ्चल शिरोभूषण, दोलायमान कर्णकुण्डल तथा विशेषकर गोप-युवतियोंका आलिङ्गन चुम्बन स्मरण करते ही मैं सुधबुध खो बैठती हूँ—सखि मैं क्या करूँ? ॥१॥ चन्द्रक-चारु-मयूर-शिखण्डक-मण्डल-वलयित-केशं। प्रचुर-पुरन्दर-धनुरनुरञ्जित-मेदुर-मुदिर-सुवेशं ॥ रासे हरिमिह ... ... ॥२॥ अन्वय—सखि, चन्द्रक-चारु-मयूर-शिखण्डक-मण्डल- वलयितकेशं (चन्द्रकेण अर्द्धचन्द्राकारेण चारूणां मयूरशिखण्डकानां मयूरपुच्छानां मण्डलेन वलयितः वेष्टितः केशो यस्य तादृशं) [अतएव] प्रचुरपुरन्दर-धनुरनुरञ्जित-चित्रितः मेदुरः स्निग्धो यो