गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः ९५ मधुरेण ध्वनिना मुखरितः शब्दितः मोहनः मनोमोहकरः वंशः वेणु येन तादृशं) वलित-दृगञ्चल-चञ्चल-मौलि-कपोल- विलोल-वतंसं (वलितेन इतस्ततः प्रचरता दृगञ्चलेन दृशोः नेत्रयोः अञ्चलं चक्षुःप्रान्तभागः तेन कटाक्षेणेत्यर्थः योऽसौ चञ्चलमौलिः कम्पितशिरोभूषणं तेन कपोलयोः गण्डयोः विलोलौ चञ्चलौ वतंसौ मणिकुण्डले यस्य तादृशं) इह रासे (शारदीय-रासलीलायां) विहितविलासं (विहितः कृतः विलासः हावभावो येन तादृशं) [तथा] कृतपरिहासं (कृतः परिहासो येन तादृशं) हरिं मम मनः स्मरति ॥१॥ अनुवाद—सखि, कैसी आश्चर्यकी बात है कि इस शारदीय रासोत्सवमें श्रीकृष्ण मुझे छोड़कर अन्य कामिनियोंके साथ कौतुक आमोदमें विलास कर रहे हैं। फिर भी मेरा मन उनका पुनः पुनः स्मरण कर रहा है। वे सञ्चरणशील अपने मुखामृतको अपने करकमलमें स्थित वेणुमें भरकर फुत्कारके साथ सुमधुर मुखर स्वरोंमें बजा रहे हैं, अपाङ्ग-भङ्गीके द्वारा अपने मणिमय शिरोभूषणको चञ्चलता प्रदान कर रहे हैं, उनके कानोंके आभूषण कपोल देशमें दोलायमान हो रहे हैं, उनके इस श्याम रूपका, उनके हास-परिहासका मुझे बारम्बार स्मरण हो रहा है॥१॥ पद्यानुवाद— हे सखि! कम्पित अधर मधु-ध्वनित वेणु-स्वर चलित दृगञ्चल चञ्चल शिर, भर— गति कपोल द्वय लोल वलय वर रास विलास हास कृत मनहर हरि मूरतका ध्यान, हो आता अनजान ॥ बालबोधिनी—सखिने कहा—प्रिय राधिके! जब श्रीकृष्णने तुम्हारा प्रत्याख्यान किया है, तब तुम क्यों उनके प्रेममें इतनी अधीर हो रही हो?