भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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९८ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—गोपललनाओंके मुखकमलका चुम्बन करनेकी अभिलाषासे इस अनङ्ग उत्सवमें अपने मुखको झुकाये हुए, उनका सुकुमार अधर पल्लव बन्धुक कुसुमवत् मनोहारी अरुण वर्णीय हो रहा है, स्फूत्तियुक्त मन्द-मुस्कानकी अपूर्व शोभा उनके सुन्दर मुखमण्डलमें विस्तार प्राप्त कर रही है, ऐसे उन श्रीकृष्णका मुझे अति स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— गोप वधू चुम्बन-रस लोभित अधर वधूक स्मित मधु शोभित। पुलक युवति-भुज अति आलिङ्गित पद-कर मणि-द्युति निशि-तमचूर्णित ॥ हरि मूरतका ध्यान हो आता अनजान ॥ बालबोधिनी—गोपवधुओंके मुख चुम्बनका लोभ धारण करनेवाले श्रीकृष्णकी मुझे याद आ रही है। जिस समय वे रहस्यमयी कुञ्जक्रीड़ामें निमग्न रहते हैं, उस समय उन गोपियोंके मुखका बारंबार चुम्बन करनेका लोभ बढ़ता जाता है। श्रीकृष्णके बन्धुक अर्थात् दुपहरियाके पुष्पके समान लाल-लाल होंठका मुझे स्मरण आता है। सखि ! मुस्करानेपर तो उनकी शोभा और भी बढ़ जाती है। विपुल-पुलक-भुज-पल्लव-वलयित-वल्लव-युवति-सहस्रं। कर-चरणोरसि-मणिगण-भूषण-किरण-विभिन्न-तमिस्रं— रासे हरिमिह ... ... ॥४॥ अन्वय—सखि, विपुल-पुलक-भुजपल्लव-वलयित- वल्लव-युवति- सहस्रं (विपुलाः अगाधाः पुलका रोमाञ्चा ययोस्ताभ्यां भुजपल्लवाभ्यां पल्लव-पेलव-भुजाभ्यां वलयितं परिवेष्टितम् आलिङ्गितमित्यर्थः वल्लव-युवतीनां गोप-तरुणीनां सहस्रं येन तम्; एकदानेकालिङ्गनात् नैकनिष्ठप्रेमाणमित्यर्थः);