भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः ९९ [तथा] करचरणोरसि (हस्तपदवक्षसि) मणिगण-भूषण-किरण- विभिन्न-तमिस्रं (मणिगणभूषणानां मणिमयालङ्काराणां किरणेन विभिन्नं निराकृतं तमिस्रम् अन्धकारो येन तादृशम्) [मम मनः रासे विहितविलासमित्यादि] ॥४॥ अनुवाद—अतिशय रोमाञ्चसे परिप्लुत होकर अपने सुकोमल भुज-पल्लवके द्वारा हजारों-हजारों गोप-युवतियोंको समालिङ्गित करनेवाले एवं कर, चरण और वक्षस्थलमें ग्रथित मणिमय आभूषणोंकी किरणोंसे दिशाओंको आलोकित करनेवाले श्रीकृष्णका मुझे स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— पुलक युवती भुज अति आलिङ्गित पद कर मणि द्युति निशि तम चूर्णित॥ हरि मूरतका ध्यान हो आता अनजान॥ बालबोधिनी—इस समय श्यामसुन्दरके उन कोमल-कोमल पल्लवोंके समान हस्तोंका मुझे स्मरण हो रहा है, जो प्रभूत रोमाञ्चसे युक्त हैं और जिनसे वे सहस्र गोपियोंको परिवेष्टित कर उनका समालिङ्गन करते हैं। उनके कर, चरण तथा हृदयस्थलके आभूषणोंके सौन्दर्यकी किरणोंसे सम्पूर्ण अन्धकार विदूरित हो गया है॥४॥ जलद-पटल-बलदिन्दु-विनिन्दक-चन्दन-तिलक-ललाटं। पीन-पयोधर-परिसर-मर्दन-निर्दय-हृदय-कवाटम्— रासे हरिमिह ... ... ॥५ ॥ अन्वय—सखि, जलद-पटल-बलदिन्दु-विनिन्दक-चन्दन- तिलक-ललाटं (जलद-पटलेन मेघसमूहेन बलन् परिस्फुरन् यः इन्दुः चन्द्रः तस्य विनिन्दकः तिरस्कारकः चन्दनतिलकः ललाटे यस्य तादृशं) [तथा] पीन-पयोधर-परिसर-मर्दन-निर्दय-