गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०० श्रीगीतगोविन्दम् हृदय-कवाटम् (पीनयोः स्थूलयोः पयोधरयोः स्तनयोः यः परिसरः परिणाहः विस्तार इति यावत् तस्य मर्दनाय निर्दयः हृदयकवाटः विशालं वक्षः यस्य तादृशम्; अत्र हृदयस्य दृढ़त्व-विस्तीर्णत्वाभ्यां कवाटत्वेन निरूपणम्) [मम मनः रासे विहित-विलास-मित्यादि] ॥५॥ अनुवाद—अपने ललाटमें मनोहर चन्दनके तिलकको धारणकर नवीन जलद मण्डलमें विद्यमान चञ्चल चन्द्रमाकी महती शोभाको पराभूतकर अनिर्वचनीय सुषमाको धारण करनेवाले एवं वर युवतियोंके पीन पयोधरोंके अमूल्य प्रान्त भागको अपने सुविशाल सुदृढ़ वक्षःस्थलसे निपीडित करनेमें सतत अनुरक्त कवाटमय (किवाड़ स्वरूप) निर्दय-हृदय श्रीकृष्णका मुझे बार-बार स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— चन्दन तिलक ललाट विचर्चित, जलद पटलमें विधु सम दर्शित। युवती पीन पयोधर मर्दित, अपनी निर्दयता पर हर्षित। हरि मूरतका ध्यान, हो आता अनजान ॥ बालबोधिनी—सजल बादलोंके बीच चञ्चल चन्द्रमाकी शोभा अत्यधिक प्रेक्षणीय होती है। श्रीकृष्णके श्यामवर्णका विस्तृत ललाट-पटल ही सजल मेघतुल्य है और उसपर श्वेतवर्णका चन्दन तिलक आह्लादप्रदायी चन्द्रमाकी छटाओंका भी तिरस्कार करनेवाला है। रतिकालमें युवतियोंके कोमल स्तनोंको अपने विशाल वक्षःस्थलसे बड़ी ही निर्दयतापूर्वक मर्दन करनेवाले श्रीकृष्णका मुझे अतिशय स्मरण हो रहा है ॥५॥