गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः सर्गः—अक्लेश—केशवः १०१ मणिमय-मकर मनोहर-कुण्डल-मण्डित-गण्डमुदारं। पीतवसन मनुगत-मुनि-मनुज-सुरासुरवर-परिवारं— रासे हरिमिह ... ... ॥६॥ अन्वय—सखि, मणिमय-मकर-मनोहर-कुण्डल-मण्डित-गण्डं (मणिमयाभ्यां मणिप्रचुराभ्यां मकराभ्यां मकराकार-मनोहर- कुण्डलाभ्यां मण्डितौ शोभितौ गण्डौ यस्य तम्) [तथा] अनुगत-मुनि-मनुज-सुरासुर-वर-परिवारम् (अनुगताः सौन्दर्यादिना आकृष्टाः मुनि-मनुज-सुरासुराणां वराः श्रेष्ठाः परिवाराः परिग्रहाः येन तादृशम्) उदारं (महान्तम्) पीत-वसनम् (पीताम्बरम्) [हरिं मम मनः रासे विहितविलास-मित्यादि ॥६॥ अनुवाद—जिनके कपोल-युगल मणिमय मनोहर मकराकृति कुण्डलोंके द्वारा सुशोभित हो रहे हैं, जिन्होंने कामिनी जनोंके मनोभिलाषको पूर्ण करनेमें महान उदार भाव अर्थात् दक्षिण नायकत्वको धारण किया है, जिन पीताम्बरधारी श्रीकृष्णने अपनी माधुरीका विस्तारकर सुर, असुर, मुनि, मनुष्य आदि अपने श्रेष्ठ परिवारको प्रेमरसमें सराबोर कर दिया है, उन श्रीकृष्णका मुझे बरबस ही स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— युग्म कपोल रत्न-मणि मण्डित, मकर मनोहर कुण्डल लम्बित सुन्दर पीत वसन परिवेष्टित, मुनि, सुर, असुर, पद्म-पद पूजित हरि मूरतका ध्यान, हो आता अनजान॥ बालबोधिनी—श्रीकृष्णके कानोंमें लटकनेवाले कुण्डल मकराकृतिके हैं, जिनसे उनके कपोलद्वय समलंकृत हैं। दक्षिण नायक हैं, पीताम्बर धारण करते हैं। नारदादि मुनि, भीष्मादि मनुष्य, प्रह्लादादि असुर तथा इन्द्रादि देवगण उनका श्रेष्ठ परिवार है। ऐसे श्रीकृष्णका मुझे स्मरण हो रहा है॥६॥