गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ श्रीगीतगोविन्दम् विशद-कदम्बतले मिलितं कलि-कलुषभयं शमयन्तं मामपि किमपि तरङ्गदनङ्गदृशा मनसा रमयन्तं— रासे हरिमिह ... ... ॥७॥ अन्वय—विशद-कदम्बतले (पुष्पित-कदम्बतरुतले) मिलितं (मया सह सङ्गतं) कलि-कलुषभयं शमयन्तं (कलिः कलहः कलुषं मालिन्यः प्रेमकलहोद्भूतं चित्तमालिन्यं तदपनयन्तं चाटुभिरितिशेषः; यद्वा कलिजनित-पाप-तापभयं निवारयन्तं) किमपि (अनिर्वचनीयं यथा तथा) तरङ्गदनङ्ग-दृशा (तरङ्ग इव आचरन् अनङ्गो यत्र तया दृशा दृष्ट्या) मामपि (मामेव) रमयन्तं (मया सह रतिं ध्यायन्तमित्यर्थः) [रासे विहित- विलासमित्यादि] ॥७॥ अनुवाद—विशाल एवं सुविकसित कदम्ब वृक्षके नीचे समागत होकर मेरी अपेक्षामें प्रतीक्षा करनेवाले विविध प्रकारके आश्वासनयुक्त चाटुवचनोंके द्वारा विच्छेद भयको सम्यक् रूपसे अपनयन (दूरीभूत) करनेवाले प्रबलतर अनङ्ग रसके द्वारा चञ्चल नेत्रोंसे तथा नितान्त स्पृहायुक्त मानसमें मेरे साथ मन-ही-मन रमण करनेवाले श्रीकृष्णका स्मरण कर मेरा हृदय विकल हो रहा है। पद्यानुवाद— विशद कदम्बतले उपवेष्टित, जन मनसे कलि भय अपसारित निज अपाङ्गसे मम मन पूरित, सुन्दर मोहन कवि जय वर्णित हरि मूरतका ध्यान, हो आता अनजान ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा कहती हैं—हे सखि! वे अतिशय उत्कण्ठाके साथ इस विशाल कदम्बके नीचे सङ्केत स्थानपर मेरी प्रतीक्षा करते रहते हैं। प्रणय कलह होनेपर विच्छेदके भयसे चाटु वाक्यों द्वारा मनाते रहते हैं। इस तरह वे मुझे