गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः १०३ अपनी सरस दृष्टि तथा सानुराग मनसे आनन्दित करते रहते हैं। ‘मामपि’—मुझे भी आनन्दित करते रहते हैं, अर्थात् प्रियतम श्रीकृष्णकी चेष्टाएँ इतनी मनोज्ञ हैं कि उनको देखकर मैं भी हर्ष-प्रकर्षका अनुभव करती हूँ॥७॥ श्रीजयदेव-भणितमतिसुन्दर-मोहन-मधुरिपु-रूपं। हरि-चरण-स्मरणं संप्रति पुण्यवतामनुरूपं॥ रासे हरिमिह ... ... ॥८॥ अन्वय—अति-सुन्दर-मोहन-मधु-रिपु-रूपं (अतिशयेन सुन्दरं मोहनं मनोहरं मधुरिपोः श्रीकृष्णस्य रूपं यत्र तादृशं) श्रीजयदेव-भणितं (श्रीजयदेवोक्तं) सम्प्रति (अधुना) पुण्यवतां (सुकृतिशालिनां भगवद्भक्तानां साधूनां) हरि-चरण-स्मरणं प्रति अनुरूपं (योग्यं तादृशभावेन आस्वादनीयमिति भावः) [भवतु इति शेषः] [रासे विहितविलासमित्यादि] ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कविने सम्प्रति हरिचरण स्मृतिरूप इस काव्यको भगवद्-भक्तिमान पुण्यशाली पुरुषोंके लिए प्रस्तुत किया है, जिसमें श्रीकृष्णके अतिशय सुन्दर मोहन रूपका वर्णन हुआ है। इसका आस्वादन मुख्यरसके आश्रयमें रहकर ही किया जाना चाहिये। बालबोधिनी—पञ्चम प्रबन्धका उपसंहार करते हुए श्रीजयदेव कविने कहा है कि इस प्रबन्धका प्रणयन प्रेमाभक्तियुक्त पुण्यवान पुरुषोंके द्वारा श्रीकृष्णके श्रीचरणकमलोंका स्मरण करनेके लिए किया गया है। ‘चरण’ का अर्थ रासलीला आदिसे है, जो भक्तोंके लिए आज भी अनुकूल है। यह अतीव सुन्दर लीला है और वही श्रीकृष्णके श्रीचरणकमलोंके स्मरणका साधन है, जिसे श्रीराधा कभी भुला नहीं पाती। इस अष्टपदी प्रबन्धमें लय छन्द है। जिसका लक्षण है—‘मुनिर्यगणैर्लयमामन्नन्ति’। इस पाँचवे प्रबन्धका नाम है ‘मधुरिपुरत्नकण्ठिका’।