भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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१०४ श्रीगीतगोविन्दम् गणयति गुणग्रामं भ्रामं भ्रमादपि नेहते वहति च परितोषं दोषं विमुञ्चति दूरतः। युवतिषु वलत्तृष्णे कृष्णे विहारिणि मां विना पुनरपि मनो वामं कामं करोति करोमि किम् ॥१॥ इति श्रीगीतगोविन्दे पञ्चमः सन्दर्भः। अन्वय—[ननु श्रीकृष्णस्त्वां विहाय अन्याभिश्चेत् विहरति तर्हि तं किमिति स्मरसीति स्वाभिप्रायं वक्ष्यमाणं सखीं प्रत्याह]—सखि, युवतिषु (गोपाङ्गनासु) वलत्तृष्णे (वलन्ती प्रस्फुरन्ती तृष्णा रमणाकाङ्क्षा यस्य तादृशे) [अतएव मां बिना विहारिणि (मां विहाय अन्यया सह रममाणेऽपीति भावः) कृष्णे [मम] वामं (प्रतिकूलम् अवाध्यमिति यावत्) मनः पुनरपि कामं (अभिलाषं) करोति, गुणग्रामं (श्रीहरेः गुणसमूहं) गणयति (विचारयति); भ्रमादपि भ्रामं (विस्मरणं) न ईहते (चेष्टते; न कथमपि विस्मरतीत्यर्थः); परितोषं (तृप्तिं) [तत्स्मरणेन इति शेषः] वहति; [तथा] दोषं (अवज्ञाजनितमपराधं) दूरतः मुञ्चति (परिहरति, न गणयतीत्यर्थः); किं करोमि [नास्त्यन्या मे गतिरिति भावः] ॥१॥ अनुवाद—“श्रीकृष्णने तुम्हें प्रत्याख्यान किया है, फिर भी तुम क्यों उनके प्रेममें व्याकुल हो रही हो”—प्रियसखिके द्वारा इस प्रकार भर्त्सना किये जानेपर श्रीराधा कहने लगी—सखि ! श्रीकृष्ण मुझे परित्यागकर दूसरी-दूसरी युवतियोंके साथ अतिशय अनुरागके साथ विहार कर रहे हैं, यह देखकर उनके प्रति अनुराग दिखाना व्यर्थ है, यह मैं जानती हूँ, फिर भी मैं क्या करूँ, उनके प्रति मेरी प्रबल आसक्ति किसी तरह से दूर नहीं होती है, मैं तो उनके गुणोंकी गणना ही करती रहती हूँ, अपने उत्कर्षका अनुभवकर आनन्दमें उन्मत्त हो जाती हूँ, भ्रमसे भी मुझे उनके प्रति क्रोध नहीं होता, उनके दोषोंको देखे बिना ही सन्तोषका अनुभव करती