गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः सर्गः-अक्लेश-केशवः १०५ हूँ, उनकी बार-बार स्पृहा करती हूँ, सखि, वे मुझसे भुलाये नहीं जाते-मैं क्या करूँ? पद्यानुवाद- सपनोंमें सुधि बनकर आते। सखि वे भुला भुला कर भाते॥ निरगुणियाके गुण ही मनमें 'गुन-गुन' स्वर भर जाते। पर-रत होने पर भी मुझमें रति बनकर ढर जाते॥ सखि! वे भुला-भुला कर भाते। सपनोंमें सुधि बन कर आते॥ बालबोधिनी-षष्ठ प्रबन्धके प्रारम्भमें अपनी रहःवार्त्ताकी ओर अधिक विवृति करते हुए श्रीराधाजी कहती हैं-सखि! अन्य गोपियोंके साथ विहार करनेवाले उन श्रीकृष्णके प्रति मेरे मनने दाक्षिण्य भावको धारण किया है, मेरे न चाहने पर भी यह उनकी गुणावलीका स्मरण करता रहता है, उनको प्राप्त करनेकी कामना करता है। 'भ्रामं भ्रमादपि नेहते'-यहाँ 'भ्राम' शब्द क्रोधका वाचक है। मेरा मन भूलसे भी उनके प्रति क्रोध करना नहीं चाहता। उनकी 'परनायिकासक्ति', 'मदुपेक्षाकारिता' आदि दोषोंको देखना नहीं चाहता, पूर्णरूपेण सन्तुष्ट ही रहता है, मैं क्या करूँ? इस श्लोकमें श्रीराधा उत्कण्ठिता नायिकाके रूपमें प्रस्तुत है। उत्कण्ठिताका लक्षण है- उत्का भवति सा यस्या वासके नागतः प्रियः। तस्यानागमने हेतुं चिन्तयन्त्याकुला यथा॥ अर्थात् जिस नायिकाकी शय्यापर नायक नहीं आता है, वह अपने प्रियतमके नहीं आनेके कारणके विषयमें व्याकुल होकर सोचती रहती है-इसलिए उसे उत्कण्ठिता कहा जाता है। इस श्लोकमें हरिणी नामक छन्द, यमक नामक