गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ श्रीगीतगोविन्दम् शब्दालङ्कार, संशय एवं दीपक नामक अर्थालङ्कार एवं क्रियौचित्य है। प्रस्तुत श्लोक षष्ठ प्रबन्धकी पुष्पिका मात्र है॥१॥ इति श्रीगीतगोविन्दे पञ्चमः सन्दर्भः। गीतम् ॥६॥ मालव गौड़ रागेण एक ताली तालेन च गीयते निभृत-निकुञ्ज-गृहं गतया निशि रहसि निलीय वसन्तं चकित-विलोकित-सकल-दिशा रति-रभस-भरेन हसन्तं ॥१॥ सखि हे केशि-मथनमुदारम्। रमय मया सह मदन-मनोरथ-भावितया सविकारम् ॥ध्रुवम्॥ अन्वय—सखि, निभृत-निकुञ्ज-गृहं गतया (निर्ज्जननिकुञ्ज- गृहं प्रस्थितया) [मया सह] निशि (रात्रौ) [तदलाभात् मम वैकल्यादि-दिदृक्षया] रहसि (एकान्ते) निलीय (आत्मानं संगोप्य) वसन्तं (तिष्ठन्तं) [केशिमथनम्.....]; [तथा] चकित-विलोकित- सकलदिशा (चकितं कृष्णं कुत्र निलीयते इति इति सशङ्कं यथा तथा विलोकिता दृष्टा सकला दिक् यया तादृश्या) [मया सह] रति-रभस-भरेण (रतौ यः रभसः औत्सुक्यं तस्य भरेण आतिशय्येन) हसन्तं (मद्वैकल्यं समीक्ष्येतिशेषः) [केशिमथनम् ....]; [तथाच] मदन-मनोरथ-भावितया (मदनेन प्रेम्णा यः मनोरथः अभिलाषः तेन भावितया युक्तया) [मया सह] सविकारम् (कामवशेन भावान्तरगतम्) उदारः (महान्तं मनोरथदातारमित्यर्थः) केशिमथनं रमय (रतिं कारय) ॥१॥ अनुवाद—मालव राग तथा एकताली तालके द्वारा यह गीत गाया जाता है, इसकी गति द्रुत है। हे सखि! वह केशिमथन श्रीकृष्ण, जो मदन-सन्तापका शान्तिविधान करनेमें कभी अनुदार नहीं होते और जिनका