भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः १०७ मन मेरे प्रति अतिशय अनुरागके कारण विमोहित हुआ है, उनके साथ मेरा अनङ्ग विषयक मनोरथ कैसे सिद्ध होगा ? इसी भावनासे मैं व्याकुल हो रही हूँ। अब तुम उनके साथ मेरा मिलन सम्पादन करा दो। जो विहित पूर्व सङ्केतानुसार निशीथमें निभृत निकुञ्ज-गृहमें आकर, मैं उनके लिए कैसी उत्कण्ठिता हूँ अथवा उनके अदर्शनसे मुझमें कितनी तड़प है, इस कौतुक भावके साथ निकुञ्जवनके गोपनतम स्थानमें छिपकर देखनेवाले, वे कब आयेंगे ? ऐसी चिन्तामें निमग्ना जब थकित चकित नेत्रोंसे देखती थी, तब मेरी कातरताको देखकर शृङ्गार रसभरी हास्यसुधासे मुझको आनन्दित करनेवाले उदार तथा केशी नामक दैत्यका वध करनेवाले श्रीकृष्णका मुझ-कामकेलिकी इच्छासे परिपूर्ण अन्तःकरणवाली तथा रतिचेष्टाएँ करनेवालीके साथ अनङ्ग सम्बन्धीय मनोरथ सिद्ध कराओ ॥१॥ पद्यानुवाद— निशि अन्धियारी ऋतु वसन्त सखि ! घन निकुञ्ज वन नन्दन री। खोज रहे कबसे दिशि दिशिमें, थकित चकित दृग् खंजन री। ले चल वहीं थमे जिससे यह शाश्वत जी का क्रन्दन री। रति-रस-भीने जहाँ विहँसते छिपे खड़े नन्दनन्दन री ॥ बालबोधिनी—काम ज्वरसे सन्तप्ता हृदया श्रीराधा सखीसे कृष्णानुसन्धानकी अभिलाषा व्यक्त करती हैं। प्रस्तुत श्लोकमें उस प्रसङ्गका प्रकाश है, जिसमें उन्होंने अपने प्राणनाथको रतिक्रीड़ाके द्वारा सुख प्रदान किया था, यह गाढ़तम रहस्यपूर्ण लीला है। 'सखि ! रमय केशिमथनमुदारम् मया सह'—हे सखि ! केशिनिसूदनके साथ मेरा रमण कराओ। यहाँ तो श्रीराधाजीकी स्वाभिलाषा व्यक्त हुई है, अपने सुखकी वासना प्रकट हुई है, यह शुद्धभक्तिकी परिभाषाके विपरीत है। अतः ऐसी अभिलाषा क्यों ?