भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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१०८ श्रीगीतगोविन्दम् इसके उत्तरमें कहते हैं कि गोपियोंने सबकुछ त्यागकर श्रीकृष्णसे प्रीति की है, उनमें अपने सुखका लेशमात्र भी नहीं है। पुनः जबतक परस्पर गाढ़ अनुराग न हो तबतक प्रेम परिस्फुट नहीं होता। प्रेमीके हृदयमें प्रेमकी वासना जाग्रत कराने हेतु प्रेयसीको स्वानुराग प्रदर्शित करना होता है, यह प्रेमका स्वभाव है। एकदेशीय प्रेममें रसाभास दोष आ जाता है। कहा गया है— अनुरागोऽनुरक्तायां रसावह इति स्थितिः। अभावेत्वनुरागस्य रसाभासं जगुर्बुधाः ॥ अर्थात् प्रीति जब अनुरक्ता स्त्रीमें होती है, तब वह रसवर्द्धनकारी होती है, परन्तु अनुरागके अभावमें तो रसाभास ही हो जाता है, ऐसा विद्वानोंका मत है। अतः यहाँ श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति अनुराग रस- वर्द्धनकारी है। सखि! कृष्णने सर्वप्रथम मेरे साथ रमणकर रतिसुखका अनुभव किया था, उनके विरहमें वही क्रीड़ा-सुख मुझे बार-बार स्मरण हो रहा है, जिससे मेरा चित्त व्याकुल हो रहा है। सम्प्रति मेरा हृदय 'मादनाख्य' मदन रसमें विभावित हो रहा है। मनोरथके प्रदाता केशीमथनका विरह मुझे असहनीय हो रहा है। सखि! उनसे मेरा रमण कराओ। इस प्रकार कविने श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति और श्रीकृष्णका श्रीराधाके प्रति अनुराग प्रदर्शित किया है। यदि मिलन प्रसङ्ग पहले दिखाया होता तो रसाभास दोष हो जाता। 'सविकारम्' पदके द्वारा श्रीराधा कह रही हैं—मुझमें काम विकार उत्पन्न हो गये हैं। कामजनित विकार मनमें उत्पन्न होनेपर नारियाँ व्याजान्तरसे अर्थात् बहाना बनाकर अपने प्रियतमको नाभि, स्तन आदि दिखाती हैं।