भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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द्वितीयः सर्गः-अक्लेश-केशवः १०९ रसिक सर्वस्व नामक व्याख्यामें कहा गया है कि- नाभिमूलकुचोदरप्रकटनव्याजेन यद्योषितां साकांक्षं मुहुरीक्षणं स्खलितता नीवीनिबन्धस्य च। केशभ्रंसन संयमौ चकमितुर्मित्रादि सन्दर्शनैः सौभाग्यादि गुण प्रशस्ति कथनैः तत्सानुरागेङ्गितकम्॥ अर्थात् कामविकार उत्पन्न होनेपर स्त्रियाँ अनुरागपूर्ण चेष्टाएँ करती हैं। जैसे किसी माध्यमसे अपनी नाभि, स्तन तथा उदर दिखलाती हैं, अपने प्रेमीको सस्पृह दृष्टिसे बारम्बार देखती हैं, नीवी-बन्धन स्खलित हो जाता है, केशोंका भ्रंशन और संयमन होता है, प्रियतमके मित्रोंको सम्यक् प्रकारसे देखती हैं, उनके साथ अपने इष्टके सौभाग्य तथा गुणोंकी प्रशंसा करती हैं। इस प्रकारकी रतिपूर्ण चेष्टा करनेवाली मेरे साथ श्रीकृष्णको मिला दो। 'मदन मनोरथ भावितया' - मेरा अन्तःकरण कामजनित कामनाओंसे परिपूर्ण हो गया है। चेष्टा भवति पूत्रार्यो रत्युत्थानातिसक्तयोः । सम्भोगो विप्रलम्भश्च स शृङ्गारो द्विधामतः ॥ अर्थात् जहाँपर रतिकी उद्दीपन क्रियामें अत्यासक्त स्त्री तथा पुरुष शृङ्गारिक चेष्टाएँ किया करते हैं, वहाँ पर शृङ्गार दो प्रकारका होता है- सम्भोग तथा विप्रलम्भ। मुझ विरहिणीकी जैसी अभिलाषा श्रीकृष्णमें है, वैसी ही अभिलाषा वे मुझमें रखते हैं, सखि ! मुझे उनसे मिला दो। यहाँपर शृङ्गार रसकी सम्पूर्ति हुई है। श्रीराधाजी कह रही हैं-जब मैं निशीथ रात्रिमें निभृत निकुञ्जके अभिसार स्थानमें पहुँची, तब उस लतागृहमें श्रीश्यामसुन्दरको न देखकर बड़ी विकलतासे चतुर्दिग् देखने लगी, उस समय सघन-कुञ्जमें छिपकर निवास करनेवाले श्रीकृष्ण मेरी उत्कण्ठाको देखने लगे। जब मैं चकित नेत्रोंसे उनका अनुसन्धान करने लगी,