गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० श्रीगीतगोविन्दम् तब वे रतिके उत्साहसे युक्त होकर समस्त दिशाओंको उल्लसितकर हँसते-हँसते मेरे सामने प्रकट हो गये। सखी री, उन्हीं कृष्णसे मुझे मिला दो॥१॥ प्रथम समागम लज्जितया पटु-चाटु-शतैरनुकूलम्। मृदु-मधुर-स्मित-भाषितया शिथिलीकृत-जघन-दुकूलम्— सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥२॥ अन्वय—प्रथम-समागम-लज्जितया (प्रथमः आद्यः यः समागमः सङ्गमः तेन लज्जितया जातलज्जया) [मया सह] पटुचाटुशतैः (पटूनि नारी-मनोहरण-निपुणानि-निपुणानि यानि चाटूनां प्रियवादनां शतानि तैः) अनुकूलं (अनुकूलयन्तं कृतापराधं मां क्षमस्वेति असकृत् कथयन्तं) [केशिमथनम्..], [तथा] मृदु-मधुर-स्मित-भाषितया (मृदु मधुरं यत् स्मितम् ईषद्धासः तेन सह भाषितं भाषणं यस्याः तथाभूतया) [मया सह] शिथिलीकृत-जघन-दुकूलं (शिथलीकृतं प्रभ्रंशितं जघनस्थं दुकूलं वसनं येन तादृशं) [केशिमथनम्.....] ॥२॥ अनुवाद—प्रथम मिलनमें स्वभावसुलभ लज्जासे अत्यन्त विमुग्ध देखकर मेरी लज्जाको दूर करनेके लिए उन्होंने अनेक प्रकारकी अनुनय-विनयरूप वचन परम्पराका प्रयोग किया। उनकी चाटुकारितापूर्ण बातोंसे विमुग्ध होकर मैं कोमल तथा मधुर मुस्कानके साथ उनसे वार्तालाप करने लगी, उस समय मेरे जघन-प्रदेशके वस्त्रको हटानेवाले विदग्ध श्रीकृष्णसे मुझे मिला दो॥१॥ पद्यानुवाद— प्रथम मिलनकी बेला आयी, चढ़ व्रीड़ाके स्यन्दन री। किन्तु मधुर बोलोंसे उनके, बनी स्वयं रस-रञ्जन री॥ बालबोधिनी—श्रीराधा सखीसे कहती हैं—यद्यपि प्रियतम श्रीकृष्णसे यह मेरा प्रथम मिलन नहीं था, फिर भी मैं उनके समक्ष ऐसी चेष्टा कर रही थी, जिस प्रकार कोई नायिका