भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः १११ प्रथम समागमके कालमें अपने प्रियतमके समीप बहुत लज्जित होती है। श्रीकृष्ण उसी समय अपने चाटुवाक्योंसे मुझे अपने मनो can play role/अनुकूल बनाते जाते थे। मैं उनके उन मधुर वचनोंसे आह्लादित होती थी और मधुर मुस्कानके साथ उनसे मृदु भाषण करती थी। जैसे ही वे मुझे मनो can play role/मनोनुकूल देखते थे—तभी मेरी जंघाके वस्त्रोंको उन्मोचित कर देते थे। मैं उन्हीं श्रीकृष्णके साथ रमण करना चाहती हूँ—सखी! मुझे उनसे मिलाओ। प्रथम समागम—यह रति-रस नवनवायमान रूपमें ही नित्य अनुभूत होता है॥३॥ किशलय-शयन-निवेशितया चिरमुरसि ममैव शयानम्। कृत-परिरम्भण-चुम्बनया परिरभ्य कृताधरपानम्— सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥३॥ अन्वय—किशलय-शयन-निवेशितया पल्लव-शय्याशायितया) [मया सह] चिरं (बहुक्षणं) ममैव उरसि (वक्षसि) शयानं [केशिमथनम्.....] [तथा] कृत-परिरम्भण-चुम्बनया (कृतं परिरम्भणं चुम्बनञ्च यया) [मया सह] परिरभ्य [आलिङ्ग्य] कृताधरपानं (कृताधरचुम्बनं) [केशिमथनम्.....] ॥३॥ अनुवाद—मनोरम, नवीन एवं कोमल पल्लवोंकी शय्यापर जिन्होंने मुझे सुलाकर मेरे हृदयके ऊपर बड़े उल्लसित होकर सुखसे शयन किया था, जिनका मैंने प्रगाढ़रूपसे आलिङ्गन एवं चुम्बन किया था, पुनः जिन्होंने उसी प्रबलतर अनङ्ग रसमें निमज्जित होते हुए मेरा परिरम्भण कर मेरे अधरसुधाका बारम्बार पान किया था, सखि! उन्हीं प्राणप्रियतम श्रीकृष्णसे मुझे मिला दो ॥३॥ पद्यानुवाद— भूली वदन वसनकी सुधि सब, भूली पूजा-वन्दन री। मेरी शय्या किशलय उनकी, मेरे उरका स्पन्दन री॥