भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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११२ श्रीगीतगोविन्दम् भूली किन अधरोंने किनका, लिया मधुर कब चुम्बन री। किन घड़ियोंमें हुआ हमारा, युग-युगका परिरम्भण री ॥ बालबोधिनी—सखि ! वे श्रीकृष्ण सङ्केत-स्थानमें मुझे कोमल पल्लवोंसे रचित शय्यापर सुला देते थे, इसके पश्चात् वे मेरे वक्षःस्थलपर चिरकालतक रमण करते थे। मैं उन श्रीकृष्णका आलिङ्गन कर उनका चुम्बन कर लेती थी। उस समय श्रीकृष्ण भी मुझे आलिङ्गन करके मेरे अधरसुधाका पान करते थे। सखी मुझे उन श्रीकृष्णसे मिलन करा दो। कृत परिरम्भण—इस प्रकारके आलिङ्गनको रसमञ्जरीकारने क्षीरनीर नामक आलिङ्गन बताया है और कथनकी पुष्टिके लिए पञ्चसायक नामक ग्रन्थका प्रमाण दिया है। रसिकप्रियाकारने इस प्रकारके आलिङ्गनको तिल-तण्डुल नामक आलिङ्गन माना है और अपने कोकशास्त्रका प्रमाण दिया है ॥३॥ अलस-निमीलित-लोचनया पुलकावलि-ललित-कपोलम् श्रमजल-सकल-कलेवरया वरमदन-मदादतिलोलम्— सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥४॥ अन्वय—अलस-निमीलित-लोचना (अलसेन सुरतश्रमजातेन आलस्येन निमीलिते मुकुलिते विलोचने यस्याः तादृश्या) [मया सह] पुलकावलि-ललित-कपोलं (पुलकानां रोमाञ्चानाम् आवल्या श्रेण्या चुम्बनादिति भावः ललितौ कपोलौ गण्डौ यस्य तादृशं) [केशिमथनम्.....] [तथा] श्रमजल-सकल-कलेवरया (श्रमजलं स्वेदाम्बु सकलकलेवरे यस्याः तादृश्या) [मया सह] वर-मदनमदात् (प्रवृद्ध-मनसिज-विकारात् हेतोः) अतिलोलं (मां प्रति नितरां साकाङ्क्षं) [केशिमथनम्.....] ॥४॥ अनुवाद—जिनके साथ मदन-आमोदमें अप्रत्याशित सुखसे मेरी आँखें अलसा गयीं, मुँद गयीं, उस विलास सुखसे श्रीकृष्णके कपोलयुगलने अत्यन्त मनोज्ञ तथा ललित रूप