गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः सर्गः-अक्लेश-केशवः ११३ धारण किया था, मदन-आमोदजनित श्रमके कारण निःसृत स्वेदविन्दुओंस मनोर देहवाली मुझे देखकर उस प्रबलतर मदन रसमें मत्त होकर अनङ्ग रसका रसास्वादन करनेवाले अति चञ्चल श्रीकृष्णसे हे सखि ! मुझे अति शीघ्र मिला दो ॥४ ॥ पद्यानुवाद- मेरे मिलित लोचन उनका, पुलक ललित वपु-कम्पन री। श्रम-सीकरसे सिञ्चित तन यह, उनमें रतिका गुञ्जन री ॥ बालबोधिनी-सखि ! रतिसुखसे क्लान्त हुआ मेरा शरीर अलसा जाता था और मेरी आँखें मुँद जाती थीं। कामजनित चिन्ताके कारण सारा शरीर स्वेद-विन्दुओँसे सिक्त हो जाता था। उस समय मेरी यह दशा देखकर श्रीकृष्णके हृदयमें कामोद्रेक जनित हर्ष उदित होता था, जिससे उनके कपोलयुगलमें सुमनोहर लावण्य प्रकाशित होने लगता था। वे प्रबलतर मदन आमोदमें निमग्न हो जाते थे। मेरी देहलताको देखकर वे चञ्चल हो उठते थे, हे सखि ! उन्हीं श्रीकृष्णसे मुझे मिला दो। सुरतानन्दसे श्रीराधाके शरीरकी पसीनेसे लथपथता श्रीराधाके पूर्वानुभूत सुखानन्दकी सम्पूर्ति व्यक्त कर रही है॥४॥ कोकिल-कलरव-कूजितया जित-मनसिज-तन्त्र-विचारम्। श्लथ-कुसुमाकुल-कुन्तलया नखलिखित-घन-स्तनभारं- सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥५ ॥ अन्वय-कोकिल-कलरव-कूजितया (कोकिलस्य कलरव इव कूजितं अव्यक्त-भाषितं यस्याः तया) [मया सह] जित-मनसिज-तन्त्र-विचारं (जितः अभिभूतः मनसिज-तन्त्रस्य कामशास्त्रस्य विचारः येन तं कामशास्त्रविशारदमित्यर्थः; अतएव शास्त्रोक्त-क्रियातिक्रमो नाशङ्कनीयः) [केशिमथनम्.....] [तथा] श्लथ-कुसुमाकुलकुन्तलया (श्लथानि सुरतलीला स्खलितानि