भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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११८ श्रीगीतगोविन्दम् कुसुमानि येभ्यस्तादृशाः, आकुलाः बन्धनराहित्यात् विक्षिप्ताः कुन्तलाः यस्यास्तादृश्या) [मया सह] नख-लिखित-घन-स्तन-भारं (नखैः लिखितौ अङ्कितौ घनयोः पीवरयोः स्तनयोः भारौ विस्तारौ येन तम्) [केशिमथनम्.....] ॥५॥ अनुवाद-रतिशास्त्रके निगूढ़ तत्त्वको सम्यक् रूपसे जाननेवाले तथा उसका अनुष्ठान करनेवाले जिन श्रीकृष्णके साथ सुरतकालमें मैं कोकिलके कलरवके समान कुहक उठी, मेरा कबरी-बन्धन खुल गया और उसमें संयुक्त कुसुमावली शिथिल होकर गिर गयी, उन्होंने अपने नखोंके आघातसे मेरे पीन स्तनयुगल पर न जाने क्या-क्या लिख दिये, हे सखि! उन प्रियतम श्रीकृष्णसे मुझे मिला दो ॥५॥ पद्यानुवाद- नख-क्षत उर यह नव कुसुमोंका, बिखरा कबरी-बन्धन री ॥५॥ बालबोधिनी-श्रीराधा अपनी सखीसे श्रीकृष्णके साथ अनुभूत वाम्य रतिका वर्णन कर रही है। सुरतकालके समय मैं कोयलके समान शब्द करती थी। 'कलरव' शब्दः पारावत पर्यायः। रसिक सर्वस्वकारने कहा है "रतिकाल" के समय नायकके द्वारा चुम्बन इत्यादि किये जानेके समय नायिका कोयल, पारावत आदिके समान सीत्कारकी आवाज करती है। श्रीकृष्ण मेरे केशोंको पकड़कर मेरा चुम्बन करते थे तथा मेरे अधरोंका पान करते थे। रतिक्रीड़ामें प्रवृत्त होकर वे मेरे पीन तथा सघन स्तनों पर नखक्षत करते थे-सखी, मुझे उनसे मिला दो ॥५॥ चरण-रणित-मणि-नूपुरया परिपूरितं सुरत-वितानम्। मुखर-विशृंखल मेखलया सकच-ग्रह-चुम्बनदानम्- सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥६॥