गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 147, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः सर्गः—अक्लेश—केशवः ११५ अन्वय—चरण-रणित-मणि-नूपुरया (चरणयोः पादयोः रणितौ शब्दितौ मणिनूपुरौ मणिमय-मञ्जीरौ यस्याः तादृश्या) [मया सह] परिपूरित-सुरत-वितानं (परिपूरितः सम्पूर्णतां प्रापितः सुरतवितानः परि-रम्भण-विस्तारः येन तादृशं) [केशिमथनम्....] [तथा] मुखर-विशृंखलामेखलया (पूर्वं मुखराः शब्दायमानाः पश्चाच्च विशृंखला त्रुटितगुणा मेखला काञ्ची यस्याः तादृश्या) [मया सह] सकच-ग्रह-चुम्बन-दानं (सकचग्रहंकेशग्रहणपूर्वकं यथा तथा चुम्बनदानं येन तथोक्तं) [केशिमथनम्....] ॥६॥ अनुवाद—केलिक्रीड़ा कालमें मेरे चरणोंके मणिखचित नूपुरोंकी रुन्झुन् ध्वनि गूँज उठती थी, करधनी मुखरित होकर क्रमानुसार विशृंखलित हो गयी थी। उस सुरतक्रीड़ाका परिपूर्ण विस्तार करनेवाले, मेरे केशपाशको ग्रहणकर मुखमण्डल पर बारम्बार चुम्बन करनेवाले श्रीकृष्णसे मुझे मिला दो। पद्यानुवाद— मेरी ये पायल बज उठती रह रहकर मृदु झन-झन री ॥६॥ बालबोधिनी—सखि ! जिस समय श्रीकृष्ण सुचारु रूपसे सुरतक्रीड़ाका सम्पादन करते थे, उस समय मेरे पैरोंके मणिपूरित नूपुर झंकृत हो उठते थे। पहले तो मेरी कटि- करघनी बजने लगती थी, किन्तु बादमें वह टूट जानेके कारण निःशब्द हो जाती थी। मेरे केशोंको पकड़कर वे मेरा चुम्बन करते थे, हे सखि! मुझे उन्हीं श्रीकृष्णसे मिला दो ॥६॥ रति-सुख-समय-रसालसया दरमुकुलित-नयन-सरोजम्। निःसह-निपतित-तनुलतया मधुसूदनमुदितमनोजम्— सखि हे केशिमथनमुदारम् ... ... ॥७॥ अन्वय—रतिसुख-समय-रसालसया (रत्या यत् सुखं तस्य यः समयः कालः तत्र यः रसः चेतसो द्रवीभावः तेन