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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

१०८ श्रीगीतगोविन्दम् इसके उत्तरमें कहते हैं कि गोपियोंने सबकुछ त्यागकर श्रीकृष्णसे प्रीति की है, उनमें अपने सुखका लेशमात्र भी नहीं है। पुनः जबतक परस्पर गाढ़ अनुराग न हो तबतक प्रेम परिस्फुट नहीं होता। प्रेमीके हृदयमें प्रेमकी वासना जाग्रत कराने हेतु प्रेयसीको स्वानुराग प्रदर्शित करना होता है, यह प्रेमका स्वभाव है। एकदेशीय प्रेममें रसाभास दोष आ जाता है। कहा गया है— अनुरागोऽनुरक्तायां रसावह इति स्थितिः। अभावेत्वनुरागस्य रसाभासं जगुर्बुधाः ॥ अर्थात् प्रीति जब अनुरक्ता स्त्रीमें होती है, तब वह रसवर्द्धनकारी होती है, परन्तु अनुरागके अभावमें तो रसाभास ही हो जाता है, ऐसा विद्वानोंका मत है। अतः यहाँ श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति अनुराग रस- वर्द्धनकारी है। सखि! कृष्णने सर्वप्रथम मेरे साथ रमणकर रतिसुखका अनुभव किया था, उनके विरहमें वही क्रीड़ा-सुख मुझे बार-बार स्मरण हो रहा है, जिससे मेरा चित्त व्याकुल हो रहा है। सम्प्रति मेरा हृदय 'मादनाख्य' मदन रसमें विभावित हो रहा है। मनोरथके प्रदाता केशीमथनका विरह मुझे असहनीय हो रहा है। सखि! उनसे मेरा रमण कराओ। इस प्रकार कविने श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति और श्रीकृष्णका श्रीराधाके प्रति अनुराग प्रदर्शित किया है। यदि मिलन प्रसङ्ग पहले दिखाया होता तो रसाभास दोष हो जाता। 'सविकारम्' पदके द्वारा श्रीराधा कह रही हैं—मुझमें काम विकार उत्पन्न हो गये हैं। कामजनित विकार मनमें उत्पन्न होनेपर नारियाँ व्याजान्तरसे अर्थात् बहाना बनाकर अपने प्रियतमको नाभि, स्तन आदि दिखाती हैं।

द्वितीयः सर्गः-अक्लेश-केशवः १०९ रसिक सर्वस्व नामक व्याख्यामें कहा गया है कि- नाभिमूलकुचोदरप्रकटनव्याजेन यद्योषितां साकांक्षं मुहुरीक्षणं स्खलितता नीवीनिबन्धस्य च। केशभ्रंसन संयमौ चकमितुर्मित्रादि सन्दर्शनैः सौभाग्यादि गुण प्रशस्ति कथनैः तत्सानुरागेङ्गितकम्॥ अर्थात् कामविकार उत्पन्न होनेपर स्त्रियाँ अनुरागपूर्ण चेष्टाएँ करती हैं। जैसे किसी माध्यमसे अपनी नाभि, स्तन तथा उदर दिखलाती हैं, अपने प्रेमीको सस्पृह दृष्टिसे बारम्बार देखती हैं, नीवी-बन्धन स्खलित हो जाता है, केशोंका भ्रंशन और संयमन होता है, प्रियतमके मित्रोंको सम्यक् प्रकारसे देखती हैं, उनके साथ अपने इष्टके सौभाग्य तथा गुणोंकी प्रशंसा करती हैं। इस प्रकारकी रतिपूर्ण चेष्टा करनेवाली मेरे साथ श्रीकृष्णको मिला दो। 'मदन मनोरथ भावितया' - मेरा अन्तःकरण कामजनित कामनाओंसे परिपूर्ण हो गया है। चेष्टा भवति पूत्रार्यो रत्युत्थानातिसक्तयोः । सम्भोगो विप्रलम्भश्च स शृङ्गारो द्विधामतः ॥ अर्थात् जहाँपर रतिकी उद्दीपन क्रियामें अत्यासक्त स्त्री तथा पुरुष शृङ्गारिक चेष्टाएँ किया करते हैं, वहाँ पर शृङ्गार दो प्रकारका होता है- सम्भोग तथा विप्रलम्भ। मुझ विरहिणीकी जैसी अभिलाषा श्रीकृष्णमें है, वैसी ही अभिलाषा वे मुझमें रखते हैं, सखि ! मुझे उनसे मिला दो। यहाँपर शृङ्गार रसकी सम्पूर्ति हुई है। श्रीराधाजी कह रही हैं-जब मैं निशीथ रात्रिमें निभृत निकुञ्जके अभिसार स्थानमें पहुँची, तब उस लतागृहमें श्रीश्यामसुन्दरको न देखकर बड़ी विकलतासे चतुर्दिग् देखने लगी, उस समय सघन-कुञ्जमें छिपकर निवास करनेवाले श्रीकृष्ण मेरी उत्कण्ठाको देखने लगे। जब मैं चकित नेत्रोंसे उनका अनुसन्धान करने लगी,

११० श्रीगीतगोविन्दम् तब वे रतिके उत्साहसे युक्त होकर समस्त दिशाओंको उल्लसितकर हँसते-हँसते मेरे सामने प्रकट हो गये। सखी री, उन्हीं कृष्णसे मुझे मिला दो॥१॥ प्रथम समागम लज्जितया पटु-चाटु-शतैरनुकूलम्। मृदु-मधुर-स्मित-भाषितया शिथिलीकृत-जघन-दुकूलम्— सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥२॥ अन्वय—प्रथम-समागम-लज्जितया (प्रथमः आद्यः यः समागमः सङ्गमः तेन लज्जितया जातलज्जया) [मया सह] पटुचाटुशतैः (पटूनि नारी-मनोहरण-निपुणानि-निपुणानि यानि चाटूनां प्रियवादनां शतानि तैः) अनुकूलं (अनुकूलयन्तं कृतापराधं मां क्षमस्वेति असकृत् कथयन्तं) [केशिमथनम्..], [तथा] मृदु-मधुर-स्मित-भाषितया (मृदु मधुरं यत् स्मितम् ईषद्धासः तेन सह भाषितं भाषणं यस्याः तथाभूतया) [मया सह] शिथिलीकृत-जघन-दुकूलं (शिथलीकृतं प्रभ्रंशितं जघनस्थं दुकूलं वसनं येन तादृशं) [केशिमथनम्.....] ॥२॥ अनुवाद—प्रथम मिलनमें स्वभावसुलभ लज्जासे अत्यन्त विमुग्ध देखकर मेरी लज्जाको दूर करनेके लिए उन्होंने अनेक प्रकारकी अनुनय-विनयरूप वचन परम्पराका प्रयोग किया। उनकी चाटुकारितापूर्ण बातोंसे विमुग्ध होकर मैं कोमल तथा मधुर मुस्कानके साथ उनसे वार्तालाप करने लगी, उस समय मेरे जघन-प्रदेशके वस्त्रको हटानेवाले विदग्ध श्रीकृष्णसे मुझे मिला दो॥१॥ पद्यानुवाद— प्रथम मिलनकी बेला आयी, चढ़ व्रीड़ाके स्यन्दन री। किन्तु मधुर बोलोंसे उनके, बनी स्वयं रस-रञ्जन री॥ बालबोधिनी—श्रीराधा सखीसे कहती हैं—यद्यपि प्रियतम श्रीकृष्णसे यह मेरा प्रथम मिलन नहीं था, फिर भी मैं उनके समक्ष ऐसी चेष्टा कर रही थी, जिस प्रकार कोई नायिका

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः १११ प्रथम समागमके कालमें अपने प्रियतमके समीप बहुत लज्जित होती है। श्रीकृष्ण उसी समय अपने चाटुवाक्योंसे मुझे अपने मनो can play role/अनुकूल बनाते जाते थे। मैं उनके उन मधुर वचनोंसे आह्लादित होती थी और मधुर मुस्कानके साथ उनसे मृदु भाषण करती थी। जैसे ही वे मुझे मनो can play role/मनोनुकूल देखते थे—तभी मेरी जंघाके वस्त्रोंको उन्मोचित कर देते थे। मैं उन्हीं श्रीकृष्णके साथ रमण करना चाहती हूँ—सखी! मुझे उनसे मिलाओ। प्रथम समागम—यह रति-रस नवनवायमान रूपमें ही नित्य अनुभूत होता है॥३॥ किशलय-शयन-निवेशितया चिरमुरसि ममैव शयानम्। कृत-परिरम्भण-चुम्बनया परिरभ्य कृताधरपानम्— सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥३॥ अन्वय—किशलय-शयन-निवेशितया पल्लव-शय्याशायितया) [मया सह] चिरं (बहुक्षणं) ममैव उरसि (वक्षसि) शयानं [केशिमथनम्.....] [तथा] कृत-परिरम्भण-चुम्बनया (कृतं परिरम्भणं चुम्बनञ्च यया) [मया सह] परिरभ्य [आलिङ्ग्य] कृताधरपानं (कृताधरचुम्बनं) [केशिमथनम्.....] ॥३॥ अनुवाद—मनोरम, नवीन एवं कोमल पल्लवोंकी शय्यापर जिन्होंने मुझे सुलाकर मेरे हृदयके ऊपर बड़े उल्लसित होकर सुखसे शयन किया था, जिनका मैंने प्रगाढ़रूपसे आलिङ्गन एवं चुम्बन किया था, पुनः जिन्होंने उसी प्रबलतर अनङ्ग रसमें निमज्जित होते हुए मेरा परिरम्भण कर मेरे अधरसुधाका बारम्बार पान किया था, सखि! उन्हीं प्राणप्रियतम श्रीकृष्णसे मुझे मिला दो ॥३॥ पद्यानुवाद— भूली वदन वसनकी सुधि सब, भूली पूजा-वन्दन री। मेरी शय्या किशलय उनकी, मेरे उरका स्पन्दन री॥

११२ श्रीगीतगोविन्दम् भूली किन अधरोंने किनका, लिया मधुर कब चुम्बन री। किन घड़ियोंमें हुआ हमारा, युग-युगका परिरम्भण री ॥ बालबोधिनी—सखि ! वे श्रीकृष्ण सङ्केत-स्थानमें मुझे कोमल पल्लवोंसे रचित शय्यापर सुला देते थे, इसके पश्चात् वे मेरे वक्षःस्थलपर चिरकालतक रमण करते थे। मैं उन श्रीकृष्णका आलिङ्गन कर उनका चुम्बन कर लेती थी। उस समय श्रीकृष्ण भी मुझे आलिङ्गन करके मेरे अधरसुधाका पान करते थे। सखी मुझे उन श्रीकृष्णसे मिलन करा दो। कृत परिरम्भण—इस प्रकारके आलिङ्गनको रसमञ्जरीकारने क्षीरनीर नामक आलिङ्गन बताया है और कथनकी पुष्टिके लिए पञ्चसायक नामक ग्रन्थका प्रमाण दिया है। रसिकप्रियाकारने इस प्रकारके आलिङ्गनको तिल-तण्डुल नामक आलिङ्गन माना है और अपने कोकशास्त्रका प्रमाण दिया है ॥३॥ अलस-निमीलित-लोचनया पुलकावलि-ललित-कपोलम् श्रमजल-सकल-कलेवरया वरमदन-मदादतिलोलम्— सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥४॥ अन्वय—अलस-निमीलित-लोचना (अलसेन सुरतश्रमजातेन आलस्येन निमीलिते मुकुलिते विलोचने यस्याः तादृश्या) [मया सह] पुलकावलि-ललित-कपोलं (पुलकानां रोमाञ्चानाम् आवल्या श्रेण्या चुम्बनादिति भावः ललितौ कपोलौ गण्डौ यस्य तादृशं) [केशिमथनम्.....] [तथा] श्रमजल-सकल-कलेवरया (श्रमजलं स्वेदाम्बु सकलकलेवरे यस्याः तादृश्या) [मया सह] वर-मदनमदात् (प्रवृद्ध-मनसिज-विकारात् हेतोः) अतिलोलं (मां प्रति नितरां साकाङ्क्षं) [केशिमथनम्.....] ॥४॥ अनुवाद—जिनके साथ मदन-आमोदमें अप्रत्याशित सुखसे मेरी आँखें अलसा गयीं, मुँद गयीं, उस विलास सुखसे श्रीकृष्णके कपोलयुगलने अत्यन्त मनोज्ञ तथा ललित रूप

द्वितीयः सर्गः-अक्लेश-केशवः ११३ धारण किया था, मदन-आमोदजनित श्रमके कारण निःसृत स्वेदविन्दुओंस मनोर देहवाली मुझे देखकर उस प्रबलतर मदन रसमें मत्त होकर अनङ्ग रसका रसास्वादन करनेवाले अति चञ्चल श्रीकृष्णसे हे सखि ! मुझे अति शीघ्र मिला दो ॥४ ॥ पद्यानुवाद- मेरे मिलित लोचन उनका, पुलक ललित वपु-कम्पन री। श्रम-सीकरसे सिञ्चित तन यह, उनमें रतिका गुञ्जन री ॥ बालबोधिनी-सखि ! रतिसुखसे क्लान्त हुआ मेरा शरीर अलसा जाता था और मेरी आँखें मुँद जाती थीं। कामजनित चिन्ताके कारण सारा शरीर स्वेद-विन्दुओँसे सिक्त हो जाता था। उस समय मेरी यह दशा देखकर श्रीकृष्णके हृदयमें कामोद्रेक जनित हर्ष उदित होता था, जिससे उनके कपोलयुगलमें सुमनोहर लावण्य प्रकाशित होने लगता था। वे प्रबलतर मदन आमोदमें निमग्न हो जाते थे। मेरी देहलताको देखकर वे चञ्चल हो उठते थे, हे सखि ! उन्हीं श्रीकृष्णसे मुझे मिला दो। सुरतानन्दसे श्रीराधाके शरीरकी पसीनेसे लथपथता श्रीराधाके पूर्वानुभूत सुखानन्दकी सम्पूर्ति व्यक्त कर रही है॥४॥ कोकिल-कलरव-कूजितया जित-मनसिज-तन्त्र-विचारम्। श्लथ-कुसुमाकुल-कुन्तलया नखलिखित-घन-स्तनभारं- सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥५ ॥ अन्वय-कोकिल-कलरव-कूजितया (कोकिलस्य कलरव इव कूजितं अव्यक्त-भाषितं यस्याः तया) [मया सह] जित-मनसिज-तन्त्र-विचारं (जितः अभिभूतः मनसिज-तन्त्रस्य कामशास्त्रस्य विचारः येन तं कामशास्त्रविशारदमित्यर्थः; अतएव शास्त्रोक्त-क्रियातिक्रमो नाशङ्कनीयः) [केशिमथनम्.....] [तथा] श्लथ-कुसुमाकुलकुन्तलया (श्लथानि सुरतलीला स्खलितानि

११८ श्रीगीतगोविन्दम् कुसुमानि येभ्यस्तादृशाः, आकुलाः बन्धनराहित्यात् विक्षिप्ताः कुन्तलाः यस्यास्तादृश्या) [मया सह] नख-लिखित-घन-स्तन-भारं (नखैः लिखितौ अङ्कितौ घनयोः पीवरयोः स्तनयोः भारौ विस्तारौ येन तम्) [केशिमथनम्.....] ॥५॥ अनुवाद-रतिशास्त्रके निगूढ़ तत्त्वको सम्यक् रूपसे जाननेवाले तथा उसका अनुष्ठान करनेवाले जिन श्रीकृष्णके साथ सुरतकालमें मैं कोकिलके कलरवके समान कुहक उठी, मेरा कबरी-बन्धन खुल गया और उसमें संयुक्त कुसुमावली शिथिल होकर गिर गयी, उन्होंने अपने नखोंके आघातसे मेरे पीन स्तनयुगल पर न जाने क्या-क्या लिख दिये, हे सखि! उन प्रियतम श्रीकृष्णसे मुझे मिला दो ॥५॥ पद्यानुवाद- नख-क्षत उर यह नव कुसुमोंका, बिखरा कबरी-बन्धन री ॥५॥ बालबोधिनी-श्रीराधा अपनी सखीसे श्रीकृष्णके साथ अनुभूत वाम्य रतिका वर्णन कर रही है। सुरतकालके समय मैं कोयलके समान शब्द करती थी। 'कलरव' शब्दः पारावत पर्यायः। रसिक सर्वस्वकारने कहा है "रतिकाल" के समय नायकके द्वारा चुम्बन इत्यादि किये जानेके समय नायिका कोयल, पारावत आदिके समान सीत्कारकी आवाज करती है। श्रीकृष्ण मेरे केशोंको पकड़कर मेरा चुम्बन करते थे तथा मेरे अधरोंका पान करते थे। रतिक्रीड़ामें प्रवृत्त होकर वे मेरे पीन तथा सघन स्तनों पर नखक्षत करते थे-सखी, मुझे उनसे मिला दो ॥५॥ चरण-रणित-मणि-नूपुरया परिपूरितं सुरत-वितानम्। मुखर-विशृंखल मेखलया सकच-ग्रह-चुम्बनदानम्- सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥६॥

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश—केशवः ११५ अन्वय—चरण-रणित-मणि-नूपुरया (चरणयोः पादयोः रणितौ शब्दितौ मणिनूपुरौ मणिमय-मञ्जीरौ यस्याः तादृश्या) [मया सह] परिपूरित-सुरत-वितानं (परिपूरितः सम्पूर्णतां प्रापितः सुरतवितानः परि-रम्भण-विस्तारः येन तादृशं) [केशिमथनम्....] [तथा] मुखर-विशृंखलामेखलया (पूर्वं मुखराः शब्दायमानाः पश्चाच्च विशृंखला त्रुटितगुणा मेखला काञ्ची यस्याः तादृश्या) [मया सह] सकच-ग्रह-चुम्बन-दानं (सकचग्रहंकेशग्रहणपूर्वकं यथा तथा चुम्बनदानं येन तथोक्तं) [केशिमथनम्....] ॥६॥ अनुवाद—केलिक्रीड़ा कालमें मेरे चरणोंके मणिखचित नूपुरोंकी रुन्झुन् ध्वनि गूँज उठती थी, करधनी मुखरित होकर क्रमानुसार विशृंखलित हो गयी थी। उस सुरतक्रीड़ाका परिपूर्ण विस्तार करनेवाले, मेरे केशपाशको ग्रहणकर मुखमण्डल पर बारम्बार चुम्बन करनेवाले श्रीकृष्णसे मुझे मिला दो। पद्यानुवाद— मेरी ये पायल बज उठती रह रहकर मृदु झन-झन री ॥६॥ बालबोधिनी—सखि ! जिस समय श्रीकृष्ण सुचारु रूपसे सुरतक्रीड़ाका सम्पादन करते थे, उस समय मेरे पैरोंके मणिपूरित नूपुर झंकृत हो उठते थे। पहले तो मेरी कटि- करघनी बजने लगती थी, किन्तु बादमें वह टूट जानेके कारण निःशब्द हो जाती थी। मेरे केशोंको पकड़कर वे मेरा चुम्बन करते थे, हे सखि! मुझे उन्हीं श्रीकृष्णसे मिला दो ॥६॥ रति-सुख-समय-रसालसया दरमुकुलित-नयन-सरोजम्। निःसह-निपतित-तनुलतया मधुसूदनमुदितमनोजम्— सखि हे केशिमथनमुदारम् ... ... ॥७॥ अन्वय—रतिसुख-समय-रसालसया (रत्या यत् सुखं तस्य यः समयः कालः तत्र यः रसः चेतसो द्रवीभावः तेन

११६ श्रीगीतगोविन्दम् अलसया निश्चेष्टया) [मया सह] दरमुकुलित-नयन-सरोजम् (दरमुकुलिते ईषन्मुद्रिते नयनसरोजे लोचनपङ्कजे यस्य तादृशं) [केशिमथनम्...] [तथा] निःसह-निपतित तनुलतया [निःसहं शिथिलम् अपाटवं यथा तथा निपतिता तनुलता यस्याः तादृश्या [मया सह] उदित-मनोजं (उदितः आविर्भूतः मनोजः कामो मयि अभिलाष इति यावत् यस्य तादृशं) मधुसूदनं [केशिमथनम्....]॥ [अत्र मधुसूदनमिति श्लिष्टम्; अनेन भृङ्गो यथा अन्यकुसुमावलीनां मधु क्रमेणास्वादयन् कमलिन्या उत्कर्षमनुभूय तस्यामेवासक्तो भवति तद्वदयमपीति स्वमससो वैदग्ध्यमेव बोधितम्; अतएव उदितमनोजम् इतिविशेषणं सर्वथा सङ्गच्छते ॥७॥ अनुवाद—उनके साथ रति-विलास करती हुई अतिशय अनङ्गसुखके अनुभवसे अलसा गयी थी, मेरा अङ्ग-अङ्ग अवसन्न हो गया था, मेरी देहलता रतिश्रमके कारण सामर्थ्यरहित होकर एकान्तमें निर्जीव होकर निढाल हो गयी, उस समय जिन श्रीकृष्णके नयनकमल अनङ्ग-रससे सिक्त ७ नं. श्लोकका तात्पर्य— अलसाका अर्थ है मन्थरा। रतिसुख समये द्वयोरेककालं रेतःकण क्षरण समये यो रसः तदेकाग्री भावस्तेन अलसा मन्थरा। दर मुकुलिते अर्थात् ईषत् निमीलिते। निःसहा—असमर्थः। उदित मनोजम् अर्थात् अभ्युदित कामम्। निपतित तनुलता अर्थात् विपरीत रति। असमर्था— च्युति कालोत्तरावस्था इत्यर्थ। भरत मुनिने कहा है— अङ्गे स्वेदः श्लथत्वं च केशवस्त्रादि संवृत्ति। जाते च्युति सुखे नार्या विरामेच्छा च गम्यते॥

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः ११७ होकर ईषत् खुले हुए थे और जिनके मनमें विषमतर मदनविकार निरन्तर विहार कर रहा था, सखि री! उन प्रियतम श्रीकृष्णसे मेरा मिलन करा दो ॥७॥ पद्यानुवाद— मुरझाई मैं इधर, उधर वे मुकुलित केशि-निकन्दन री ॥७॥ बालबोधिनी—श्रीराधा रतिसुखके अनुभवमें डूबकर अलसा गयी तथा श्रीकृष्णने अपने नेत्रकमलोंको सामान्य रूपसे बन्द कर लिये हैं। भ्रमर जैसे एक-एक कर सभी पुष्पोंपर बैठकर मधुपान करता है, परन्तु कमलिनीका उत्कर्ष देखकर उसमें अतिशय आसक्त रहता है तथा प्रमत्त होकर मधुपान करते हुए उसीमें ही विश्राम करता है, वैसे मधुसूदन पुष्पोंके जैसे समस्त गोपियोंका मधुपान करने पर भी सबको छोड़कर राधा-कमलिनीमें अतिशय आसक्त हैं तथा वहीं उनका विश्राम स्थल है। उसीमें ही समस्त प्रकारके रतिसुखका आनन्द अनुभव करते हैं। इस प्रकार श्रीराधाके मनमें श्रीकृष्णकी विदग्धताका अनुभव होनेपर वह भी अनुरागिणी हो गयी। आज श्रीराधाके मनमें श्रीहरिके साथ लीलाविनोद करते हुए पूर्व अनुभूत विषय स्मरण होनेसे व्याकुल होकर सखीसे कहने लगी—सखि! उन श्रीकृष्णसे मिला दो ॥७॥ श्रीजयदेव-भणितमिदमतिशय-मधुरिपु-निधुवन-शीलम्। सुखमुत्कण्ठित-गोपवधू-कथितं वितनोतु सलीलम्— सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥८॥ अन्वय—इदम् उत्कण्ठित-गोप-वधू-कथितं (उत्कण्ठितायाः कृष्णप्राप्तौ उत्सुकाया गोपवध्वा राधिकायाः कथितं यत्र तत्) सलीलम् (सविलासम्) अतिशय-मधुरिपुनिधुवन-शीलं (अतिशयेन मधुरिपोः कृष्णस्य निधुवनं सुरतं शीलयति स्मारयतीति तत्)

११८ श्रीगीतगोविन्दम् श्रीजयदेवभणितम् (श्रीजयदेवोक्तिः) [भक्तानां] सुखं वितनोतु (विस्तारयतु) सखिहे.... ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कविद्वारा विरचित विरह-विधुरा उत्कण्ठिता नायिकाद्वारा वर्णित श्रीकृष्णके प्रगाढ़तर शृङ्गार विषयक सुरत-वृत्तान्त पढ़ने और सुननेवाले भागवत-जनोंका कल्याण वर्द्धन करें॥८॥ पद्यानुवाद— राधा वर्णित मधुक्रीड़ाका, करता ‘कवि’ अभिनन्दन री॥८॥ बालबोधिनी—इस गीतका उपसंहार करते हुए श्रीजयदेव कवि कहते हैं कि यह गीत मैंने प्रतिपादित किया, परन्तु इस गीतमें वर्णित समस्त प्रसङ्गका वर्णन श्रीराधाजीने अपनी सखीके समक्ष प्रस्तुत किया है। इस गीतका वर्णन करनेवाली श्रीराधा उत्कण्ठिता नायिका हैं और गीतमें विदग्ध श्रीकृष्णकी कामक्रीड़ा-विषयक चरित्रोंका विस्तारके साथ वर्णन हुआ है। भ्रमर जैसे एक-एक करके फूलोंपर बैठकर मधुपान करता है, परन्तु कमलिनीका उत्कर्ष देखकर उसीमें आसक्त हो जाता है और प्रसन्न होकर मधुपान करते हुए उसीमें विश्राम करता रहता है, उसी प्रकार श्रीमथुसूदन भी पुष्पवत् समस्त गोपियोंका त्याग कर मेरा उत्कर्ष जानकर मेरे प्रति अत्यासक्त रूपसे अनुरागी हुए हैं। मैं भी कृष्णकी रति- विदग्धताका अनुभवकर उनकी अनुरागिणी हो गयी हूँ। श्रीराधाके मनमें पूर्व अनुभूत लीलाओंका स्मरण होनेपर अतिशय अधीर होकर उन्होंने श्रीश्यामसुन्दरसे मिलनेके लिए अपनी सखीको अपनी हृदयकी बात सुनायी। श्रीजयदेव कवि वर्णित परम उत्कण्ठिता निधुवन-नागरी श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति अनुराग तथा सुरत-क्रीड़ाका यह वर्णन सबका मङ्गल विधान करे। इस सम्पूर्ण गीतमें विप्रलम्भ शृङ्गार-रस है तथा लय छन्द है॥८॥

२. सर्ग ४-५: स्निग्धमधुसूदन व साभिसारिका

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः १११ हस्त-स्रस्त-विलास-वंशमनृजु-भ्रुवल्लिमद्वल्लवी- वृन्दोत्सारि-दृगन्त-वीक्षितमति स्वेदार्द्र-गण्डस्थलम्। मामुद्वीक्ष्य विलज्जित-स्मित-सुधा-मुग्धाननं कानने गोविन्दं व्रजसुन्दरीगण-वृतं पश्यामि हृष्यामि च ॥१॥ अन्वय—[सख्या आनीता श्रीराधा गोपयुवती-परिवृतं कृष्णम- वलोक्याह]—सखि, कानने (वने) व्रजसुन्दरीगणवृतम् (व्रजयुवती- गणवेष्टितम्) अनृजुभ्रुवल्लिमद्वल्लवी-वृन्दोत्सारि-दृगन्त-वीक्षितं (अनृजवः कुटिलाः भ्रुवल्लयः भ्रूलताः यासां तादृशीनां वल्लवीनां गोपाङ्गनानां वृन्दैः समूहैः उत्सारी भङ्ग्या उत्क्षिप्तः दृशाम् अन्तो यस्मिन् तत् सकटाक्षमित्यर्थः वीक्षितं दृष्टं), [अतएव] माम् उद्वीक्ष्य विलज्जितस्मित-सुधामुग्धाननं (विलज्जितया सविशेष- लज्जा-मिश्रितया स्मितसुधया सुधावन्मधुरस्मितेन मुग्धं मोहकरम् आननं वदनं यस्य तम्) अतिस्वेदार्द्रगण्डस्थलम् (अतिस्वेदेन मयि अत्यावेशेनेति शेषः, आर्द्रं सिक्तं गण्डस्थलं यस्य तादृशं), [तथा] हस्तस्रस्तविलासवंशम् (हस्ताभ्यां स्रस्तः स्खलितः विलासवंशः मोहन-वेणुर्यस्य तं) गोविन्दं पश्यामि हृष्यामि (आनन्दमनुभवामि) च ॥१॥ अनुवाद—हे सखि ! कुटिलतर भ्रुलतामयी गोपवल्लभियोंके साथ लीला विलास करते हुए उनके किसी मनोरम अङ्ग पर दृष्टि निक्षिप्त किये हुए, नेत्रोंके सङ्केतसे उन्हें दूर हटानेवाले, व्रजसुन्दरियोंके समूहसे आवृत श्रीकृष्ण मुझे देखते ही विस्मयाविष्ट हो गये। उस समय मदनावेशके कारण उनके ललित हाथोंसे वंशी गिर पड़ी, गण्डस्थल पसीनेसे भीग गया। हर्षोल्लाससे उनका मुखकमल मन्द-मुस्कान सी मकरन्द सुधासे परिपूर्ण हो गया। उनकी ऐसी स्थिति देखकर मुझे एक अनिर्वचनीय आनन्द हो रहा है।

१२० श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— ले चल उन कुञ्जोंमें जिनमें, ब्रजबालायें घेरे- रहती हैं श्रीहरिको आतुर, पर दिखते ही मेरे- हाथोंसे उनके गिर पड़ती, बंशी सहज सबेरे १। दूर कटाक्षोंसे कर देते, गोपीजनके भेरे २ ॥ बालबोधिनी—विरहमें तीन प्रकारका अनुभव होता है—स्मरण, स्फूर्ति और आविर्भाव। श्रीराधाका कृष्ण-विरहमें पहले स्मरण हुआ, सुदीप्त महाभावमें उनके हृदयमें लीलाएँ स्वतःस्फूर्त्त हुई और अब उन्हें साक्षात् अनुभव हो रहा है। वे सखीसे कहती हैं—देख सखि! मैं इस ब्रजकाननमें ब्रजसुन्दरियोंके साथ विराजमान श्रीगोविन्दको देखकर हँस रही हूँ और आनन्दित हो रही हूँ। सखिने प्रश्न किया—अरी मुग्धे! जब श्रीकृष्ण तुम्हें छोड़कर दूसरी गोपललनाओंके साथ विहार कर रहे हैं, तब तुम्हें आनन्द क्यों हो रहा है? श्रीराधा कहती हैं—जब ऐसी स्थितिमें वे मुझे देखेंगे तो बहुत अधिक लज्जित हो जायेंगे, लज्जाके मारे वे पसीने-पसीने हो जायेंगे, उनके कपोल भी पसीनेसे भीग जायेंगे। मेरे सात्त्विक भावोंको देखकर उनके अङ्गोंमें भी सात्त्विक भाव उदित हो जायेंगे। लज्जाके कारण उनके हाथोंसे बंशी स्खलित हो पड़ेगी। उस समय वे अपने भ्रु-भङ्गियोंसे—इशारेसे उन मनोहर भ्रुलताओंसे युक्त ब्रजवल्लभियोंको अपने पाससे हटा देंगे। उस समय उनका मुख-मण्डल मन्द-मुस्कानसे अतीव मनोहर होगा। इस प्रकार प्रियतमको देखकर परमानन्दित होऊँगी। सखि! ऐसे प्रियतम श्रीकृष्णसे कब मिलूँगी? इस श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द तथा दीपकालङ्कार, विप्रलम्भ-शृङ्गार-रस, पाञ्चाली रीति, लारानुप्रासालङ्कार तथा दक्षिण नायक है॥१॥ १ सबेरे = शीघ्र; २ भेरे = समूह

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः १२१ दुरालोकः स्तोक-स्तवक-नवकाशोक-लतिका- विकासः कासारोपवन-पवनोऽपि व्यथयति। अपि भ्राम्यद्भृङ्गी रणित-रमणीया न मुकुल- प्रसूतिश्चूतानां सखि शिखरिणीयं सुखयति ॥२॥ अन्वय—[इदानीं विरहव्याकुलतां दर्शयति]—सखि, [अधुना] स्तोकस्तवक-नवकाशोक-लतिका-विकासः (स्तोकस्तवका अल्पगुच्छा या नवका नवपुष्पिता अशोककलतिका तस्याः विकासः) दुरालोकः (उद्दीपकत्वात् नितरां दुर्दर्शः); [तथा] कासारोपवन-पवनोऽपि (कासारः सरोवरः तेन सम्पृक्तं यत् उपवनं तस्य पवनोऽपि [एतेन वायोः शैत्यसौगन्ध्यमान्द्यगुणो ध्वनितः] व्यथयति (सन्तापयति); [तथा] भ्राम्यद्भृङ्गी-रणित- रमणीया (भ्राम्यन्तीनां भृङ्गीणां रणितैः गुञ्जितैः रमणीया मनोहारिणी) शिखरिणी (प्रशस्ताङ्कुरसमन्विता) इयं चूतानां (आम्राणां) मुकुलप्रसूतिः (मुकुलोद्गमः) अपि न सुखयति [अपितु सन्तापयत्येव; अधुना अशोकोऽपि शोकदायी, समीरणोऽपि पीडकः; रमणीयापि उद्वेगकरीति—अहो विरहवैपरीत्यम्] ॥२॥ अनुवाद—सखि ! श्रीकृष्णके विरहमें मेरा मन अब किसी भी प्रकारसे परितृप्त नहीं हो रहा है। देखो ! यह ईषत् विकसित अशोककी नयी लताकी प्रफुल्ल शोभा मेरे नयनोंका शूल बन गयी है। इस सरोवरके समीप स्थित उपवनोंसे आनेवाली समीरण (बयार) भी मेरा अङ्ग-अङ्ग दुःखा रही है। चारों ओर भ्रमण करनेवाले भौरोंके सुन्दर गुञ्जन भी अच्छे नहीं लग रहे हैं। उनके गुञ्जनसे मनोज्ञ बने हुए वृक्षोंके अग्रभागमें निकले हुए आमोंके नये-नये बौर भी मुझे सुखी नहीं बनाते। पद्यानुवाद— मुझे जलाते हैं अशोकके कोमल किशलय फूल। बहने वाला मृदु समीर भी, छू उपवन सर-कूल॥

१२२ श्रीगीतगोविन्दम् अलि गुञ्जित मधु आम्र-मञ्जरी चुभती है ज्यों शूल। जग सरसा है, पर मेरे तो हियमें उड़ती है धूल॥ बालबोधिनी—श्रीराधा विप्रलम्भ-शृङ्गारके विभावोंका वर्णन करती हुई सखीसे कह रही हैं—इस वासन्तिक वेलामें अशोक वृक्षोंको देखना कठिन हो गया है। वृक्षके नवीन पल्लव विरहाग्निको उद्दीप्त कर रहे हैं। छोटे-छोटे गुच्छोंसे युक्त अशोक लताओंको विकसित करनेवाली जो वायु सरोवरोंके उपवनोंसे होकर आ रही है, वह अति पीड़ादायिनी हो रही है। दुरालोकका विग्रह है—दुःखेन आलोक अवलोकनम् यस्याऽसौ। आम्रवृक्षके अग्रभागमें जो आम्रमञ्जरियाँ निकल रही है और उनके चारों ओर मँडराती हुई भ्रमरियाँ गुञ्जार कर रही हैं। अतःपर यह आम्र मञ्जरी श्रीकृष्ण मिलनमें जो मुझे सुखी बनाया करती थीं, वह अब दुःखी बना रही हैं। भ्राम्यद्भृङ्गी पदमें भ्रमरियोंका निर्देश करके श्रीराधा अपने मनका यह भाव प्रकाशित कर रही हैं कि उनके हृदयमें श्रीकृष्णके अतिरिक्त किसी भी दूसरे पुरुषकी कामना नहीं है। उनकी दृष्टिमें एकमात्र कमनीय पुरुष श्रीकृष्ण ही हैं। प्रस्तुत श्लोकमें शिखरिणी छन्द है। रसैरुद्रैश्छिन्ना यमनसभला सः शिखरिणी। इसमें समुच्चय एवं अनुप्रास अलङ्कार, क्रियोचित्य तथा विप्रलम्भ-शृङ्गार, मागधी एवं गौड़ीया रीति है॥२॥ साकूत-स्मितमाकुलाकूल-गलद्धम्मिल्लमुल्लासित- भ्रू-वल्लीकमलीक-दर्शित-भुजामूलाद्र्ध्वदृष्टस्तनम् । गोपीनां निभृतं निरीक्ष्य गमिताकांक्षश्चिरं चिन्तय- न्नान्तर्मुग्ध-मनोहरं हरतु वः क्लेशं नवः केशवः ॥३॥ इति श्रीगीतगोविन्द महाकाव्ये अक्लेश-केशवो नाम द्वितीयः सर्गः।

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः १२३ अन्वय—[राधायां नीतं कृष्णाभिप्रायं व्यञ्जयन्नाशास्ते कविः]— गोपीनां (गोपाङ्गनानां) साकूतस्मितम् (साकूतं प्रेमाभिलाषसमेतं स्मितं मन्दहासः यस्मिन् तत्) आकुलाकुल-गलद्धम्मिल्लम् (आकुलाकुलम् अति शिथिलं यथास्यात् तथा गलन्तः स्खलन्तः धम्मिल्लाः केशबन्धः यत्र तत्) उल्लासित-भ्रूवल्लीकम् (उल्लासिता कुटिलता भ्रूवल्ली भ्रूलता यत्र तत्) अलीकदर्शित-भुजामूलाद्धर्दृष्टस्तनम् (अलीकं सव्याजं यथा तथा दर्शितेन भुजामूलेन बाहुमूलेन अर्द्धं दृष्टौ स्तनौ यत्र तत्) [अतएव] मुग्धमनोहरं निभृतं रहस्यं तद्भावप्रकाशनं) निरीक्ष्य [श्रीराधायाः सर्वोत्तमतां] चिरम् अन्तः (चित्ते) चिन्तयन् (विचारयन्) [तथा] [अतः उत्तमा अन्या नास्तीति] गमिताकाङ्क्षः (गमिता तस्यामेव प्रापिता आकाङ्क्षा येन स तथोक्तः) नवः (श्रीराधिकोत्कर्षनिश्चयेन नव इव जातः) केशवः (हरिः) वः (युष्माकं) क्लेशं (संसारतापं) हरतु (दूरीकरोतु) [अतः सर्गोऽयमक्लेशो गतः श्रीराधिकासम्बन्धि-मनःसाधारण्याभासरूपः क्लेशः यस्मात् स केशवो यत्र सः] ॥३॥ अनुवाद—अविवेकी मनको आकर्षित करनेवाली गोपियोंकी साकूत मुस्कान, कामोद्रेकके कारण रोमाञ्च आदि हो जानेसे खुले केशवाली, ऊपर उठे हुए हाथोंके कारण व्यर्थ ही दिखाये गये दोनों स्तनोंका अवलोकन करके अपने हृदयमें चिरकाल चिन्तन करके श्रीकृष्णने उनके प्रति अपनी आकांक्षाओंको विनष्ट कर दिया है, अब राधाभावसे उल्लसित होकर नवनवायमान रूपसे चमत्कृत हो रहे हैं,— ऐसे तरुण केशव आप सबके क्लेशोंको विनष्ट करें। बालबोधिनी—दूसरे सर्गके अन्तिम श्लोकमें महाकवि श्रीजयदेव भक्तजनोंको आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि विदग्ध श्रीकृष्णने गोपियोंकी चार प्रकारकी चेष्टाओंका अपने हृदयमें विचार किया,—इन चेष्टाओंको देखकर कोई भी मूर्ख आकर्षित हो जाया करता है।

१२४ श्रीगीतगोविन्दम् (१) साकूतास्मितम्—गोपियोंकी मुस्कान स्वाभाविक तो है ही, अपितु साभिप्राय भी है। अवश्य उस स्मितमें कामवासनाका पुट था। तरुण पुरुषको देखकर कामिनियोंकी कामचेष्टाओंका विजृम्भण होना स्वाभाविक ही है। (२) आकुलाकुललगद्धम्मिल्लम्—कामोद्रेकके कारण रोमाञ्च इत्यादि हो जानेसे उन गोपियोंके केशबन्ध विस्रस्त हो जाते थे। (३) श्रीकृष्णको देखकर कामोद्रेकसे उनके नयनयुगल चञ्चल हो गये। (४) यद्यपि अपने भुजामूलों अथवा हाथोंको ऊपर उठानेका कोई भी कारण नहीं था, फिर भी जम्भाई आदिके बहानेसे वे अपने उन्नत स्तनोंको कृष्णको दिखा रही थीं। परमविवेकी श्रीकृष्णने इन चेष्टाओंका अपने हृदयमें विचारकर उन्हें व्यर्थ कर दिया। श्रीराधाकी अपेक्षा दूसरी कोई श्रेष्ठ नहीं है, इस प्रकार अपने भक्तोंके द्वारा स्तुति किये जानेवाले श्रीकेशव समस्त भक्तोंके क्लेशोंको दूर करें। प्रस्तुत श्लोकमें समुच्चय, आशीः तथा परिकर अलङ्कार है। शार्दूल विक्रीड़ित छन्द है। इस प्रकार अक्लेश-केशव-कुञ्जर-तिलक नामक षष्ठ प्रबन्ध वर्णन हुआ है। इति द्वितीयः सर्गः। 卐卐卐

तृतीयः सर्गः मुग्ध-मधुसूदनः कंसारिरपि संसार-वासना-बन्ध-शृंखलाम्। राधमाधाय हृदये तत्याज व्रजसुन्दरीः ॥१॥ अन्वय—[एवं सर्गद्वयेन राधा-माधवयोः उत्कर्षवर्णन-प्रसङ्गतः श्रीराधाया उत्कण्ठां निरूप्य इदानीं कृष्णोत्कण्ठां वर्णयति महाकविः]—[यथा सा तस्मिन् उत्कण्ठिता तथा] कंसारिः (श्रीकृष्णः) अपि संसार-वासना-बन्ध-शृंखलां (सम्यक्सारभूता या वासना तस्या बन्धे दृढ़ीकरणे श्रृंखला निगडरूपिणी तां) राधां हृदये (चेतसि) आधाय (आ सम्यक् प्रकारेण निवेश्य) व्रजसुन्दरीः [अन्याः व्रजाङ्गनाः इति शेषः] तत्याज [यथा विवेकी तारतम्येण परमपदार्थ-निश्चयात् तदेकचित्तः अन्यत् सर्वं त्यजति तद्वदिति भावः] ॥१॥ अनुवाद—कंसारि श्रीकृष्णने श्रीराधाके पूर्व प्रणयका स्मरण कर उसे सर्वश्रेष्ठ प्रेमका सार अनुभव करते हुए संसार वासनाके बन्धनकी श्रृंखलारूपी श्रीराधाको अपने हृदयमें धारणकर अन्य ब्रजाङ्गनाओंके प्रेमको अकिञ्चित्कर जानकर उन सबका परित्याग कर दिया। पद्यानुवाद— जग बन्धन सम प्राणोंकी मानिनि राधाको मनमें— अङ्कित कर भूल गये हरि, प्रिय ब्रजवधुओंको क्षणमें॥ बालबोधिनी—पूर्व वर्णित दो सर्गोंमें श्रीराधामाधवके उत्कर्षका निरूपण करते हुए अन्तमें श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति अनुराग-उत्कण्ठाका निरूपण किया है। अब इस सर्गके प्रारम्भमें श्रीकृष्णका श्रीराधाके प्रति अनुराग एवं उत्कण्ठा प्रदर्शित की जा रही है।

१२६ श्रीगीतगोविन्दम् शारदीय रासलीलाकी स्मृति जाग उठी—समस्त गोपियोंके मध्य अन्तर्हित हो श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ रासस्थलीसे चले गये तथा केश-प्रसाधन आदि शृङ्गारिक चेष्टाओंसे श्रीराधाका प्रेमवर्द्धन किया। किन्तु अब श्रीराधाके सामने न होनेसे श्रीकृष्णके हृदयमें विरहजनित सन्ताप जाग उठा और सन्तप्त होकर उन्होंने ब्रजसुन्दरियोंका परित्याग कर दिया। कंसारि—श्रीकृष्ण कंस नामक राक्षसराजके शत्रु हैं, कं सुखं सारयति विस्तारयति कंसारिः। अर्थात् सुखके विस्तार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण ही कंसारि हैं। संसार वासना-बद्ध-शृंखलाम्—संसार = सम्यक् सार, इस समास-वाक्यके अनुसार संसार पद आनन्दमय तथा भावमय मधुररसका वाचक है। मधुर-रस विषयिणी सतत प्रवृत्त रहनेवाली वृत्ति ही संसार-वासना है। श्रीकृष्णको अपने वशमें बनाये रखनेके कारण रासमें श्रीराधा ही श्रृंखला है। जिस प्रकार किसी वस्तुका श्रेष्ठत्व निश्चित हो जाने पर अन्यान्य वस्तुओंको छोड़कर उस श्रेष्ठ-वस्तुको प्राप्त करनेकी सुदृढ़ अभिलाषा होती है—वह श्रेष्ठ वस्तु ही उसके लिए आश्रय-स्वरूप हो जाता है। वैसे ही इस प्रसङ्गमें श्रीराधा श्रीकृष्णके लिए सुदृढ़ आश्रय स्वरूप है अथवा जैसे कोई विवेकी पुरुष तारतम्यके द्वारा सारवस्तुका निश्चय कर उसमें दत्तचित्त होकर अन्य वस्तुओंका परित्याग कर देता है, वैसे ही यहाँ श्रीकृष्णने साक्षातरूपमें अन्यान्य गोपियोंका त्याग कर दिया। ब्रजसुन्दरीः—इस पदमें बहुवचनका प्रयोग होनेका अभिप्राय यह है कि सौन्दर्यसम्पन्न अनेक युवतियोंका श्रीकृष्णने श्रीराधाके वियोगसे सन्तप्त होकर परित्याग कर दिया। इससे श्रीकृष्णकी श्रीराधामें अनुराग-अतिशयता सूचित हो रही है। इस पद्यमें ‘पथ्या’ छन्द है॥१॥

तृतीयः सर्गः—मुग्ध-मधुसूदनः १२७ इतस्ततस्तामनुसृत्य राधिकामनङ्ग-बाण-व्रण-खिन्न-मानसः। कृतानुतापः स कलिन्दनन्दिनी-तटान्त-कुञ्जे विषसाद माधवः ॥२॥ अन्वय—सः माधवः अनङ्ग-बाण-व्रण-खिन्नमानसः (अनङ्गस्य मदनस्य बाणजनितेन व्रणेन खिन्नं कातरं मानसं यस्य तादृशः सन्) इतस्ततः तां राधिकाम् अनुसृत्य (अन्विष्य) कृतानुतापः (कथमहं तस्याः सर्वोत्तमतां जानन्नपि अवज्ञातवान् इति जातमनस्तापः सन् इत्यर्थः) कलिन्द-नन्दिनी-तटान्तकुञ्जे (कलिन्दनन्दिनी यमुना तस्याः तटान्ते कुलप्रान्ते यः कुञ्जः तत्र) विषसाद (विषादं कृतवान्) ॥२॥ अनुवाद—अनङ्गबाणसे जर्जरित श्रीकृष्ण 'हाय'! मैंने श्रीराधाका क्यों परित्याग किया—मेरा उनके साथ कैसे मिलन होगा—इसप्रकार अनुतापयुक्त होकर श्रीराधाका इधर उधर अन्वेषण करने लगे। कहीं भी न मिलने पर यमुनाके निकटवर्त्ती निकुञ्जमें विषण्णचित्त होकर पश्चात्ताप करने लगे। पद्यानुवाद— अनुतापित पीड़ित फिरते, मनसिज बाणोंके व्रणमें। हूले से जमुन-पुलिन पर, भूले से वृन्दावनमें॥ बालबोधिनी—श्रीकृष्णके अनुभावका वर्णन किया जा रहा है। विरहमें श्रीराधाजीकी जो स्थिति थी, वही स्थिति अब श्रीकृष्णकी हो गयी है। श्रीकृष्ण श्रीराधाके विरहमें कामबाणोंसे विक्षत हो गये थे। यद्यपि वहाँ ब्रजसुन्दरियाँ समुपस्थित थीं, तथापि उन्हें उनसे उदासीनता ही बनी रही। मनःकान्ता श्रीराधाकी उपस्थिति उन्हें अधिक विषादयुक्त बना रही थी। सोचा कि आज श्रीराधाका मैं समादर नहीं कर पाया, अतः वे यमुनातट प्रान्तके कुञ्जमें चली गयी हों। विषादयुक्त मनसे उनका अन्वेषण करने लगे—न मिलने पर अनुतप्त हो गये। यदि श्रीराधाको अनुनयविनयके द्वारा मना लिया होता, तो वे फिर यहाँसे कहीं न जातीं।