भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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तृतीयः सर्गः—मुग्ध-मधुसूदनः १२७ इतस्ततस्तामनुसृत्य राधिकामनङ्ग-बाण-व्रण-खिन्न-मानसः। कृतानुतापः स कलिन्दनन्दिनी-तटान्त-कुञ्जे विषसाद माधवः ॥२॥ अन्वय—सः माधवः अनङ्ग-बाण-व्रण-खिन्नमानसः (अनङ्गस्य मदनस्य बाणजनितेन व्रणेन खिन्नं कातरं मानसं यस्य तादृशः सन्) इतस्ततः तां राधिकाम् अनुसृत्य (अन्विष्य) कृतानुतापः (कथमहं तस्याः सर्वोत्तमतां जानन्नपि अवज्ञातवान् इति जातमनस्तापः सन् इत्यर्थः) कलिन्द-नन्दिनी-तटान्तकुञ्जे (कलिन्दनन्दिनी यमुना तस्याः तटान्ते कुलप्रान्ते यः कुञ्जः तत्र) विषसाद (विषादं कृतवान्) ॥२॥ अनुवाद—अनङ्गबाणसे जर्जरित श्रीकृष्ण 'हाय'! मैंने श्रीराधाका क्यों परित्याग किया—मेरा उनके साथ कैसे मिलन होगा—इसप्रकार अनुतापयुक्त होकर श्रीराधाका इधर उधर अन्वेषण करने लगे। कहीं भी न मिलने पर यमुनाके निकटवर्त्ती निकुञ्जमें विषण्णचित्त होकर पश्चात्ताप करने लगे। पद्यानुवाद— अनुतापित पीड़ित फिरते, मनसिज बाणोंके व्रणमें। हूले से जमुन-पुलिन पर, भूले से वृन्दावनमें॥ बालबोधिनी—श्रीकृष्णके अनुभावका वर्णन किया जा रहा है। विरहमें श्रीराधाजीकी जो स्थिति थी, वही स्थिति अब श्रीकृष्णकी हो गयी है। श्रीकृष्ण श्रीराधाके विरहमें कामबाणोंसे विक्षत हो गये थे। यद्यपि वहाँ ब्रजसुन्दरियाँ समुपस्थित थीं, तथापि उन्हें उनसे उदासीनता ही बनी रही। मनःकान्ता श्रीराधाकी उपस्थिति उन्हें अधिक विषादयुक्त बना रही थी। सोचा कि आज श्रीराधाका मैं समादर नहीं कर पाया, अतः वे यमुनातट प्रान्तके कुञ्जमें चली गयी हों। विषादयुक्त मनसे उनका अन्वेषण करने लगे—न मिलने पर अनुतप्त हो गये। यदि श्रीराधाको अनुनयविनयके द्वारा मना लिया होता, तो वे फिर यहाँसे कहीं न जातीं।