गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ श्रीगीतगोविन्दम् शारदीय रासलीलाकी स्मृति जाग उठी—समस्त गोपियोंके मध्य अन्तर्हित हो श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ रासस्थलीसे चले गये तथा केश-प्रसाधन आदि शृङ्गारिक चेष्टाओंसे श्रीराधाका प्रेमवर्द्धन किया। किन्तु अब श्रीराधाके सामने न होनेसे श्रीकृष्णके हृदयमें विरहजनित सन्ताप जाग उठा और सन्तप्त होकर उन्होंने ब्रजसुन्दरियोंका परित्याग कर दिया। कंसारि—श्रीकृष्ण कंस नामक राक्षसराजके शत्रु हैं, कं सुखं सारयति विस्तारयति कंसारिः। अर्थात् सुखके विस्तार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण ही कंसारि हैं। संसार वासना-बद्ध-शृंखलाम्—संसार = सम्यक् सार, इस समास-वाक्यके अनुसार संसार पद आनन्दमय तथा भावमय मधुररसका वाचक है। मधुर-रस विषयिणी सतत प्रवृत्त रहनेवाली वृत्ति ही संसार-वासना है। श्रीकृष्णको अपने वशमें बनाये रखनेके कारण रासमें श्रीराधा ही श्रृंखला है। जिस प्रकार किसी वस्तुका श्रेष्ठत्व निश्चित हो जाने पर अन्यान्य वस्तुओंको छोड़कर उस श्रेष्ठ-वस्तुको प्राप्त करनेकी सुदृढ़ अभिलाषा होती है—वह श्रेष्ठ वस्तु ही उसके लिए आश्रय-स्वरूप हो जाता है। वैसे ही इस प्रसङ्गमें श्रीराधा श्रीकृष्णके लिए सुदृढ़ आश्रय स्वरूप है अथवा जैसे कोई विवेकी पुरुष तारतम्यके द्वारा सारवस्तुका निश्चय कर उसमें दत्तचित्त होकर अन्य वस्तुओंका परित्याग कर देता है, वैसे ही यहाँ श्रीकृष्णने साक्षातरूपमें अन्यान्य गोपियोंका त्याग कर दिया। ब्रजसुन्दरीः—इस पदमें बहुवचनका प्रयोग होनेका अभिप्राय यह है कि सौन्दर्यसम्पन्न अनेक युवतियोंका श्रीकृष्णने श्रीराधाके वियोगसे सन्तप्त होकर परित्याग कर दिया। इससे श्रीकृष्णकी श्रीराधामें अनुराग-अतिशयता सूचित हो रही है। इस पद्यमें ‘पथ्या’ छन्द है॥१॥