भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 448 में से

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तृतीयः सर्गः मुग्ध-मधुसूदनः कंसारिरपि संसार-वासना-बन्ध-शृंखलाम्। राधमाधाय हृदये तत्याज व्रजसुन्दरीः ॥१॥ अन्वय—[एवं सर्गद्वयेन राधा-माधवयोः उत्कर्षवर्णन-प्रसङ्गतः श्रीराधाया उत्कण्ठां निरूप्य इदानीं कृष्णोत्कण्ठां वर्णयति महाकविः]—[यथा सा तस्मिन् उत्कण्ठिता तथा] कंसारिः (श्रीकृष्णः) अपि संसार-वासना-बन्ध-शृंखलां (सम्यक्सारभूता या वासना तस्या बन्धे दृढ़ीकरणे श्रृंखला निगडरूपिणी तां) राधां हृदये (चेतसि) आधाय (आ सम्यक् प्रकारेण निवेश्य) व्रजसुन्दरीः [अन्याः व्रजाङ्गनाः इति शेषः] तत्याज [यथा विवेकी तारतम्येण परमपदार्थ-निश्चयात् तदेकचित्तः अन्यत् सर्वं त्यजति तद्वदिति भावः] ॥१॥ अनुवाद—कंसारि श्रीकृष्णने श्रीराधाके पूर्व प्रणयका स्मरण कर उसे सर्वश्रेष्ठ प्रेमका सार अनुभव करते हुए संसार वासनाके बन्धनकी श्रृंखलारूपी श्रीराधाको अपने हृदयमें धारणकर अन्य ब्रजाङ्गनाओंके प्रेमको अकिञ्चित्कर जानकर उन सबका परित्याग कर दिया। पद्यानुवाद— जग बन्धन सम प्राणोंकी मानिनि राधाको मनमें— अङ्कित कर भूल गये हरि, प्रिय ब्रजवधुओंको क्षणमें॥ बालबोधिनी—पूर्व वर्णित दो सर्गोंमें श्रीराधामाधवके उत्कर्षका निरूपण करते हुए अन्तमें श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति अनुराग-उत्कण्ठाका निरूपण किया है। अब इस सर्गके प्रारम्भमें श्रीकृष्णका श्रीराधाके प्रति अनुराग एवं उत्कण्ठा प्रदर्शित की जा रही है।

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