गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ श्रीगीतगोविन्दम् (१) साकूतास्मितम्—गोपियोंकी मुस्कान स्वाभाविक तो है ही, अपितु साभिप्राय भी है। अवश्य उस स्मितमें कामवासनाका पुट था। तरुण पुरुषको देखकर कामिनियोंकी कामचेष्टाओंका विजृम्भण होना स्वाभाविक ही है। (२) आकुलाकुललगद्धम्मिल्लम्—कामोद्रेकके कारण रोमाञ्च इत्यादि हो जानेसे उन गोपियोंके केशबन्ध विस्रस्त हो जाते थे। (३) श्रीकृष्णको देखकर कामोद्रेकसे उनके नयनयुगल चञ्चल हो गये। (४) यद्यपि अपने भुजामूलों अथवा हाथोंको ऊपर उठानेका कोई भी कारण नहीं था, फिर भी जम्भाई आदिके बहानेसे वे अपने उन्नत स्तनोंको कृष्णको दिखा रही थीं। परमविवेकी श्रीकृष्णने इन चेष्टाओंका अपने हृदयमें विचारकर उन्हें व्यर्थ कर दिया। श्रीराधाकी अपेक्षा दूसरी कोई श्रेष्ठ नहीं है, इस प्रकार अपने भक्तोंके द्वारा स्तुति किये जानेवाले श्रीकेशव समस्त भक्तोंके क्लेशोंको दूर करें। प्रस्तुत श्लोकमें समुच्चय, आशीः तथा परिकर अलङ्कार है। शार्दूल विक्रीड़ित छन्द है। इस प्रकार अक्लेश-केशव-कुञ्जर-तिलक नामक षष्ठ प्रबन्ध वर्णन हुआ है। इति द्वितीयः सर्गः। 卐卐卐