भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः १२३ अन्वय—[राधायां नीतं कृष्णाभिप्रायं व्यञ्जयन्नाशास्ते कविः]— गोपीनां (गोपाङ्गनानां) साकूतस्मितम् (साकूतं प्रेमाभिलाषसमेतं स्मितं मन्दहासः यस्मिन् तत्) आकुलाकुल-गलद्धम्मिल्लम् (आकुलाकुलम् अति शिथिलं यथास्यात् तथा गलन्तः स्खलन्तः धम्मिल्लाः केशबन्धः यत्र तत्) उल्लासित-भ्रूवल्लीकम् (उल्लासिता कुटिलता भ्रूवल्ली भ्रूलता यत्र तत्) अलीकदर्शित-भुजामूलाद्धर्दृष्टस्तनम् (अलीकं सव्याजं यथा तथा दर्शितेन भुजामूलेन बाहुमूलेन अर्द्धं दृष्टौ स्तनौ यत्र तत्) [अतएव] मुग्धमनोहरं निभृतं रहस्यं तद्भावप्रकाशनं) निरीक्ष्य [श्रीराधायाः सर्वोत्तमतां] चिरम् अन्तः (चित्ते) चिन्तयन् (विचारयन्) [तथा] [अतः उत्तमा अन्या नास्तीति] गमिताकाङ्क्षः (गमिता तस्यामेव प्रापिता आकाङ्क्षा येन स तथोक्तः) नवः (श्रीराधिकोत्कर्षनिश्चयेन नव इव जातः) केशवः (हरिः) वः (युष्माकं) क्लेशं (संसारतापं) हरतु (दूरीकरोतु) [अतः सर्गोऽयमक्लेशो गतः श्रीराधिकासम्बन्धि-मनःसाधारण्याभासरूपः क्लेशः यस्मात् स केशवो यत्र सः] ॥३॥ अनुवाद—अविवेकी मनको आकर्षित करनेवाली गोपियोंकी साकूत मुस्कान, कामोद्रेकके कारण रोमाञ्च आदि हो जानेसे खुले केशवाली, ऊपर उठे हुए हाथोंके कारण व्यर्थ ही दिखाये गये दोनों स्तनोंका अवलोकन करके अपने हृदयमें चिरकाल चिन्तन करके श्रीकृष्णने उनके प्रति अपनी आकांक्षाओंको विनष्ट कर दिया है, अब राधाभावसे उल्लसित होकर नवनवायमान रूपसे चमत्कृत हो रहे हैं,— ऐसे तरुण केशव आप सबके क्लेशोंको विनष्ट करें। बालबोधिनी—दूसरे सर्गके अन्तिम श्लोकमें महाकवि श्रीजयदेव भक्तजनोंको आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि विदग्ध श्रीकृष्णने गोपियोंकी चार प्रकारकी चेष्टाओंका अपने हृदयमें विचार किया,—इन चेष्टाओंको देखकर कोई भी मूर्ख आकर्षित हो जाया करता है।