गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ श्रीगीतगोविन्दम् अलि गुञ्जित मधु आम्र-मञ्जरी चुभती है ज्यों शूल। जग सरसा है, पर मेरे तो हियमें उड़ती है धूल॥ बालबोधिनी—श्रीराधा विप्रलम्भ-शृङ्गारके विभावोंका वर्णन करती हुई सखीसे कह रही हैं—इस वासन्तिक वेलामें अशोक वृक्षोंको देखना कठिन हो गया है। वृक्षके नवीन पल्लव विरहाग्निको उद्दीप्त कर रहे हैं। छोटे-छोटे गुच्छोंसे युक्त अशोक लताओंको विकसित करनेवाली जो वायु सरोवरोंके उपवनोंसे होकर आ रही है, वह अति पीड़ादायिनी हो रही है। दुरालोकका विग्रह है—दुःखेन आलोक अवलोकनम् यस्याऽसौ। आम्रवृक्षके अग्रभागमें जो आम्रमञ्जरियाँ निकल रही है और उनके चारों ओर मँडराती हुई भ्रमरियाँ गुञ्जार कर रही हैं। अतःपर यह आम्र मञ्जरी श्रीकृष्ण मिलनमें जो मुझे सुखी बनाया करती थीं, वह अब दुःखी बना रही हैं। भ्राम्यद्भृङ्गी पदमें भ्रमरियोंका निर्देश करके श्रीराधा अपने मनका यह भाव प्रकाशित कर रही हैं कि उनके हृदयमें श्रीकृष्णके अतिरिक्त किसी भी दूसरे पुरुषकी कामना नहीं है। उनकी दृष्टिमें एकमात्र कमनीय पुरुष श्रीकृष्ण ही हैं। प्रस्तुत श्लोकमें शिखरिणी छन्द है। रसैरुद्रैश्छिन्ना यमनसभला सः शिखरिणी। इसमें समुच्चय एवं अनुप्रास अलङ्कार, क्रियोचित्य तथा विप्रलम्भ-शृङ्गार, मागधी एवं गौड़ीया रीति है॥२॥ साकूत-स्मितमाकुलाकूल-गलद्धम्मिल्लमुल्लासित- भ्रू-वल्लीकमलीक-दर्शित-भुजामूलाद्र्ध्वदृष्टस्तनम् । गोपीनां निभृतं निरीक्ष्य गमिताकांक्षश्चिरं चिन्तय- न्नान्तर्मुग्ध-मनोहरं हरतु वः क्लेशं नवः केशवः ॥३॥ इति श्रीगीतगोविन्द महाकाव्ये अक्लेश-केशवो नाम द्वितीयः सर्गः।