भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः ११७ होकर ईषत् खुले हुए थे और जिनके मनमें विषमतर मदनविकार निरन्तर विहार कर रहा था, सखि री! उन प्रियतम श्रीकृष्णसे मेरा मिलन करा दो ॥७॥ पद्यानुवाद— मुरझाई मैं इधर, उधर वे मुकुलित केशि-निकन्दन री ॥७॥ बालबोधिनी—श्रीराधा रतिसुखके अनुभवमें डूबकर अलसा गयी तथा श्रीकृष्णने अपने नेत्रकमलोंको सामान्य रूपसे बन्द कर लिये हैं। भ्रमर जैसे एक-एक कर सभी पुष्पोंपर बैठकर मधुपान करता है, परन्तु कमलिनीका उत्कर्ष देखकर उसमें अतिशय आसक्त रहता है तथा प्रमत्त होकर मधुपान करते हुए उसीमें ही विश्राम करता है, वैसे मधुसूदन पुष्पोंके जैसे समस्त गोपियोंका मधुपान करने पर भी सबको छोड़कर राधा-कमलिनीमें अतिशय आसक्त हैं तथा वहीं उनका विश्राम स्थल है। उसीमें ही समस्त प्रकारके रतिसुखका आनन्द अनुभव करते हैं। इस प्रकार श्रीराधाके मनमें श्रीकृष्णकी विदग्धताका अनुभव होनेपर वह भी अनुरागिणी हो गयी। आज श्रीराधाके मनमें श्रीहरिके साथ लीलाविनोद करते हुए पूर्व अनुभूत विषय स्मरण होनेसे व्याकुल होकर सखीसे कहने लगी—सखि! उन श्रीकृष्णसे मिला दो ॥७॥ श्रीजयदेव-भणितमिदमतिशय-मधुरिपु-निधुवन-शीलम्। सुखमुत्कण्ठित-गोपवधू-कथितं वितनोतु सलीलम्— सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥८॥ अन्वय—इदम् उत्कण्ठित-गोप-वधू-कथितं (उत्कण्ठितायाः कृष्णप्राप्तौ उत्सुकाया गोपवध्वा राधिकायाः कथितं यत्र तत्) सलीलम् (सविलासम्) अतिशय-मधुरिपुनिधुवन-शीलं (अतिशयेन मधुरिपोः कृष्णस्य निधुवनं सुरतं शीलयति स्मारयतीति तत्)