गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ श्रीगीतगोविन्दम् श्रीजयदेवभणितम् (श्रीजयदेवोक्तिः) [भक्तानां] सुखं वितनोतु (विस्तारयतु) सखिहे.... ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कविद्वारा विरचित विरह-विधुरा उत्कण्ठिता नायिकाद्वारा वर्णित श्रीकृष्णके प्रगाढ़तर शृङ्गार विषयक सुरत-वृत्तान्त पढ़ने और सुननेवाले भागवत-जनोंका कल्याण वर्द्धन करें॥८॥ पद्यानुवाद— राधा वर्णित मधुक्रीड़ाका, करता ‘कवि’ अभिनन्दन री॥८॥ बालबोधिनी—इस गीतका उपसंहार करते हुए श्रीजयदेव कवि कहते हैं कि यह गीत मैंने प्रतिपादित किया, परन्तु इस गीतमें वर्णित समस्त प्रसङ्गका वर्णन श्रीराधाजीने अपनी सखीके समक्ष प्रस्तुत किया है। इस गीतका वर्णन करनेवाली श्रीराधा उत्कण्ठिता नायिका हैं और गीतमें विदग्ध श्रीकृष्णकी कामक्रीड़ा-विषयक चरित्रोंका विस्तारके साथ वर्णन हुआ है। भ्रमर जैसे एक-एक करके फूलोंपर बैठकर मधुपान करता है, परन्तु कमलिनीका उत्कर्ष देखकर उसीमें आसक्त हो जाता है और प्रसन्न होकर मधुपान करते हुए उसीमें विश्राम करता रहता है, उसी प्रकार श्रीमथुसूदन भी पुष्पवत् समस्त गोपियोंका त्याग कर मेरा उत्कर्ष जानकर मेरे प्रति अत्यासक्त रूपसे अनुरागी हुए हैं। मैं भी कृष्णकी रति- विदग्धताका अनुभवकर उनकी अनुरागिणी हो गयी हूँ। श्रीराधाके मनमें पूर्व अनुभूत लीलाओंका स्मरण होनेपर अतिशय अधीर होकर उन्होंने श्रीश्यामसुन्दरसे मिलनेके लिए अपनी सखीको अपनी हृदयकी बात सुनायी। श्रीजयदेव कवि वर्णित परम उत्कण्ठिता निधुवन-नागरी श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति अनुराग तथा सुरत-क्रीड़ाका यह वर्णन सबका मङ्गल विधान करे। इस सम्पूर्ण गीतमें विप्रलम्भ शृङ्गार-रस है तथा लय छन्द है॥८॥