गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— ले चल उन कुञ्जोंमें जिनमें, ब्रजबालायें घेरे- रहती हैं श्रीहरिको आतुर, पर दिखते ही मेरे- हाथोंसे उनके गिर पड़ती, बंशी सहज सबेरे १। दूर कटाक्षोंसे कर देते, गोपीजनके भेरे २ ॥ बालबोधिनी—विरहमें तीन प्रकारका अनुभव होता है—स्मरण, स्फूर्ति और आविर्भाव। श्रीराधाका कृष्ण-विरहमें पहले स्मरण हुआ, सुदीप्त महाभावमें उनके हृदयमें लीलाएँ स्वतःस्फूर्त्त हुई और अब उन्हें साक्षात् अनुभव हो रहा है। वे सखीसे कहती हैं—देख सखि! मैं इस ब्रजकाननमें ब्रजसुन्दरियोंके साथ विराजमान श्रीगोविन्दको देखकर हँस रही हूँ और आनन्दित हो रही हूँ। सखिने प्रश्न किया—अरी मुग्धे! जब श्रीकृष्ण तुम्हें छोड़कर दूसरी गोपललनाओंके साथ विहार कर रहे हैं, तब तुम्हें आनन्द क्यों हो रहा है? श्रीराधा कहती हैं—जब ऐसी स्थितिमें वे मुझे देखेंगे तो बहुत अधिक लज्जित हो जायेंगे, लज्जाके मारे वे पसीने-पसीने हो जायेंगे, उनके कपोल भी पसीनेसे भीग जायेंगे। मेरे सात्त्विक भावोंको देखकर उनके अङ्गोंमें भी सात्त्विक भाव उदित हो जायेंगे। लज्जाके कारण उनके हाथोंसे बंशी स्खलित हो पड़ेगी। उस समय वे अपने भ्रु-भङ्गियोंसे—इशारेसे उन मनोहर भ्रुलताओंसे युक्त ब्रजवल्लभियोंको अपने पाससे हटा देंगे। उस समय उनका मुख-मण्डल मन्द-मुस्कानसे अतीव मनोहर होगा। इस प्रकार प्रियतमको देखकर परमानन्दित होऊँगी। सखि! ऐसे प्रियतम श्रीकृष्णसे कब मिलूँगी? इस श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द तथा दीपकालङ्कार, विप्रलम्भ-शृङ्गार-रस, पाञ्चाली रीति, लारानुप्रासालङ्कार तथा दक्षिण नायक है॥१॥ १ सबेरे = शीघ्र; २ भेरे = समूह