भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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८२ श्रीगीतगोविन्दम् यमुनातीरे न कहकर यमुना जलतीरे कहनेका अभिप्राय है कि जलके समान ही तटपर शैत्य (शीतलता) तथा पावनता भी है। अन्य नायिकामें अनुरक्त श्रीकृष्णका वस्त्र खींचकर ले जाना अधीरताका अभिव्यञ्जक है ॥५ ॥ करतल-ताल-तरल-वलयावलि-कलित-कलस्वन-वंशे। रासरसे सहनृत्यपरा हरिणा युवतिः प्रशंससे— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥६ ॥] अन्वय—सखि, हरिणा (श्रीकृष्णेन) करतल-ताल-तरल- वलयावलि-कलित-कलम्बने-वंशे (करतलयोः पाणितलयोः तालेन ध्वनिविशेषेण तरला चञ्चला या वलयावलिः कङ्कणश्रेणिः तया कलितः अनुपूरितः कलम्बनः मधुरस्वरो वंशः वाद्यविशेषः यस्मिन् तादृशे) रासरसे (रासोत्सवे) सहनृत्यपरा (सहनृत्यन्ती) काचित् युवतिः प्रशंससे (साधु साध्विति प्रशंसिता) ॥६॥ अनुवाद—हाथोंकी तालीके तानके कारण चञ्चल कंकण- समूहसे अनुगत वंशीनादसे युक्त अद्भुत स्वरको देखकर श्रीहरि रासरसमें आनन्दित नृत्य-परायणा किसी युवतीकी प्रशंसा करने लगे। पद्यानुवाद— जिसकी ताल समय कर-चूड़ी वंशी-स्वरमें खनकी। रास-सखी की स्तुति श्रीहरिने जी भर भर कर की॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीसे कह रही है कि रासलीलामें श्रीकृष्णके साथ नृत्य करती हुई कोई युवती तान, मान, लयके साथ हाथोंसे ताली बजाने लगी, जिससे उसकी चूड़ियाँ एक दूसरेसे टकराकर अभिघातके कारण मधुर ध्वनि प्रकट करने लगीं और इस प्रकार वलयकी खनकाहट और वंशीध्वनि मिलकर अद्भुत मधुर नाद प्रस्तुत करने लगी, जिसे सुनकर श्रीकृष्ण पुनः पुनः उस रमणीकी प्रशंसा करने लगे ॥६ ॥

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