भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ८१ बालबोधिनी-नितम्बवती किसी प्रौढ़ा नायिकाकी सौन्दर्या- तिशयताको इस पद द्वारा सूचित किया गया है। सखियोंके बीचमें प्रियतमका चुम्बन करना अनुचित है, इसलिए कार्यान्तर बोधनका बहाना बनाकर उसने श्रीकृष्णके कपोलप्रान्तको चूम लिया-इस वाक्यांशके द्वारा नायिकाके शृङ्गार वैदग्ध्यको सूचित किया गया है, यहाँ श्रीकृष्ण अनुकूल नायक हैं ॥४॥ केलि-कला-कुतुकेन च काचिदमूं यमुनावनकुले। मञ्जुल-वञ्जुल-कुञ्जगतं विचकर्ष करेण दुकूले- [हरिरिह-मुग्ध-वधूनिकरे... ॥५॥] अन्वय-सखि, काचित् (गोपललना) यमुनाकूले (यमुनातीरे) मञ्जुल-वञ्जुल-कुञ्जगतं (मञ्जुलः मनोहरः यः वञ्जुलकुञ्जः लतादिपिहितो वेतसकुञ्जः तत्र गतं) अमुं (हरिं) केलिकला- कुतुकेन (केलिकलायां सुरतनैपुण्ये यत् कुतुकम् औत्सुक्यं तेन हेतुना) करेण (हस्तेन) दुकूले (पीताम्बरे) विचकर्ष (आकृष्टवती) ॥५॥ अनुवाद-सखि ! देखो, यमुना पुलिनपर मनोहर वेतसी (वञ्जुल या बेंत) कुञ्जमें किसी गोपीने एकान्त पाकर काम रस वशवर्त्तिनी हो क्रीड़ाकला कौतूहलसे उनके वस्त्रयुगलको अपने हाथोंसे पकड़कर खींच लिया। पद्यानुवाद- केलि कलाकुल कोई गोपी, यमुना जलके तीरे। ले जाने हरि, वसन खींचती, वञ्जुल वनमें धीरे ॥ बालबोधिनी-सखी किसी अधीरा नायिकाका वर्णन करते हुए श्रीराधासे कहती है, श्रीकृष्ण जब मनोहर वेतसी लताकुञ्जमें गये हुए थे, तब वह अधीरा नायिका श्रीकृष्णका वस्त्र पकड़कर उन्हें यमुना किनारे ले गयी; क्योंकि वह रहकेलि कलाकौतूहलसे आविष्ट हो गई थी। 'च' कारसे तात्पर्य है कि उसने विजन स्थान देखकर श्रीकृष्णके साथ अनेक प्रकारसे परिहास किया।