गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—मुग्धानायिकाकी चेष्टाओंका वर्णन करती हुई सखी कह रही है—वह नायिका श्रीकृष्णके मुख कमलका ध्यान कर रही है। श्रीश्यामसुन्दर प्रेमविलासके कारण विलसित अपने चञ्चल नेत्रोंसे दृष्टि डालकर वर रमणियोंके मदनविकारको अभिवर्द्धित कर रहे हैं और अत्यधिक आनन्दका अनुभव मन-ही-मन कर रहे हैं। मुग्धा नायिकामें लज्जाका प्राचुर्य होता है, अतएव उसकी शृङ्गारिक चेष्टाएँ बड़ी ही मर्यादित होती हैं॥३॥ कापि कपोलतले मिलिता लपितुं किमपि श्रुतिमूले। चारु चुचुम्ब नितम्बवती दयितं पुलकैरनुकूले— [हरिरिह-मुग्ध-वधूनिकरे... ॥४॥] अन्वय—सखि, नितम्बवती (विपुलनितम्बा) कापि (तरुणी गोपाङ्गना) श्रुतिमूले (कर्णमूले) किमपि लपितुं (भाषितुं) मिलिता (किञ्चित् कथनच्छलेन सङ्गता सती) पुलकैः (रोमाञ्चैः) [प्रियतम-स्पर्शसुखेन-अधीरा सतीति भावः] अनुकूले (अभिलाषुकै, प्रियाभिलाषसूचके इति यावत्) कपोलतले (प्रियतमस्य गण्डदेशे) चारु (मनोज्ञं यथास्यात् तथा) दयितं (प्रियं हरिं) चुचुम्ब॥४॥ अनुवाद—वह देखो सखि! एक नितम्बिनी (गोपी) ने अपने प्राणवल्लभ श्रीकृष्णके कर्ण (श्रुतिमूल) में कोई रहस्यपूर्ण बात करनेके बहाने जैसे ही गण्डस्थलपर मुँह लगाया तभी श्रीकृष्ण उसके सरस अभिप्रायको समझ गये और रोमाञ्चित हो उठे। पुलकाञ्चित श्रीकृष्णको देख वह रसिका नायिका अपनी मनोवाञ्छाको पूर्ण करने हेतु अनुकूल अवसर प्राप्त करके उनके कपोलको परमानन्दमें निमग्न हो चुम्बन करने लगी। पद्यानुवाद— चारु नितम्बवती कोई मिस कानोंमें कुछ कहने— पुलक कपोल चूम श्रीहरिके लगी प्रेम रस बहने ॥