गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ८३ श्लिष्यति कामपि चुम्बति कामपि कामपि रमयति रामां। पश्यति सस्मित-चारुतराम्परामनुगच्छति वामां— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥७॥] अन्वय—सखि, [हरिः] कामपि (तरुणीं) श्लिष्यति (आलिङ्गति),; कामपि चुम्बति; कामपि रामां रमयति (क्रीड़ाकौतुकेन सुखयति); सस्मित-चारुतराम् (सस्मिता अतएव चारुतरा ताम्; मृदुमधुर-हासेन अतिमनोहरामित्यर्थः) [कामपि] पश्यति; [तथा] अपरां वामाम् (प्रतिकूलाम्, प्रणयकोपवशात् अभिमानभरेण स्थानान्तर-गामिनीम्) अनुगच्छति ॥७॥ अनुवाद—शृङ्गार-रसकी लालसामें श्रीकृष्ण कहीं किसी रमणीका आलिङ्गन करते हैं, किसीका चुम्बन करते हैं, किसीके साथ रमण कर रहे हैं और कहीं मधुर स्मित सुधाका अवलोकन कर किसीको निहार रहे हैं तो कहीं किसी मानिनीके पीछे-पीछे चल रहे हैं। पद्यानुवाद— किसी सखीको भुजमें भरते और किसीसे रसते। गीले कर फिर किसी अधरको, किसी आँखमें हँसते ॥ कहीं किसीके पीछे पीछे छायासे हरि चलते। वृन्दावनके लताकुञ्जकी क्रीड़ा कहते कहते ॥ बालबोधिनी—रासक्रीड़ामें श्रीकृष्ण विविध रूप धारण करके क्रीड़ोन्मुख नायिकाओंके साथ विविध शृङ्गारिक चेष्टाओंको किया करते हैं। सम्भोग सुखकी लालसाके वशीभूत होकर श्रीकृष्ण कभी किसी कामिनीका आलिङ्गन करते हैं तो कभी किसीका चुम्बन। कहीं किसीके साथ विहार कर रहे हैं तो कहीं सरस रसपूर्ण नेत्रोंसे किसी वर सुन्दरीका सतृष्ण भावसे निरीक्षण कर रहे हैं और कभी विभ्रमके कारण किसी वराङ्गनाको 'श्रीराधा' कहकर सम्बोधित कर रहे हैं, जिससे वह मानिनी हो जाती है। रतिकी भावना तीव्र होनेपर चेष्टाविशेषके साथ उसका अनुगमन करते हैं।