गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ श्रीगीतगोविन्दम् मानिनी गोपीके रति पराङ्मुख होनेपर बार-बार अनुनय विनय करते हुए उसके क्रोध (रोष) को विगलित करनेका प्रयास करते हैं। प्रस्तुत श्लोकमें श्रीकृष्णका शठत्व, धृष्टत्व, दक्षिणत्व, अनुकूलत्व तथा धूर्त्तत्व दिखायी देता है। सभी नायिकाएँ अभिसारिका नायिकाएँ हैं। शृङ्गारतिलक ग्रन्थमें धृष्ट नायकके लक्षण इस प्रकार बताये हैं— अभिव्यक्तान्य तरुणी भोगलक्ष्मापि निर्भयः। मिथ्यावचन दक्षश्च धृष्टोऽयं खलु कथ्यते॥ (शृ. ति. १-१७) अर्थात् अन्य तरुणीके साथ सम्भोगके चिह्नोंके स्पष्ट रहनेपर भी बिना भयके निपुणताके साथ जो झूठ बोलता है, उसे धृष्ट नायक कहते हैं। शठके लक्षण इस प्रकार बताये गये हैं— प्रियं व्यक्ति पुरोऽन्यत्र विप्रियं कुरुते भृशम्। निगूढ़मपराधं च शठोऽयं कथितो बुधैः॥ (शृ. ति. १-१८) अर्थात् विद्वानोंने उस नायकको शठ नायक कहा है, जो अपने अपराधको छिपाये रहता है। किसी दूसरी नायिकाके प्रति आसक्त रहता है और अपनी नायिकाके समक्ष मीठी-मीठी बातें करता है॥७॥ श्रीजयदेव-भणितमिदमद्भुत-केशव-केलि-रहस्यं । वृन्दावन-विपिने ललितं वितनोतु शुभानि यशस्यम्— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे...॥८॥] अन्वय—श्रीजयदेव-भणितम् (श्रीजयदेवेन भणितम् उक्तम्) वृन्दावन-विपिने ललितं (मनोहरं) यशस्यम् (यशस्करम्) इदम् अद्भुत-केशव-केलिरहस्यं (अद्भुतम् वैदग्धी-विशेषेण