भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ८५ विचित्रं श्रीराधाविलापपरीक्षणरूपं केशवस्य केलिरहस्यं) [भक्तानां] शुभानि वितनोतु (विस्तारयतु) ॥८॥ अनुवाद— श्रीजयदेव कवि द्वारा रचित यह अद्भुत मङ्गलमय ललित गीत सभीके यशका विस्तार करे। यह शुभद गीत श्रीवृन्दावनके विपिन विहारमें श्रीराधाजीके विलास परीक्षण एवं श्रीकृष्णके द्वारा की गयी अद्भुत कामक्रीड़ाके रहस्यसे सम्बन्धित है। यह गान वन बिहारजनित सौष्ठवको अभिवर्द्धित करनेवाला है॥ पद्यानुवाद— मग्न हुए रस सरिमें कवि 'जय' निशिदिन बहते बहते। श्रोता भी हों मुक्त क्लेशसे सब कुछ सहते सहते॥ बालबोधिनी—गीतके उपसंहारमें कहा गया है कि कवि जयदेवजीने श्रीकेशवकी अद्भुत केलिक्रीड़ा-रहस्यका इस गीतमें निरूपण किया है। अद्भुत रहस्य यह है कि एक ही श्रीकृष्णने एक ही समयमें अनेक वराङ्गनाओंकी अभिलाषाओंकी पूर्त्ति करते हुए उनके साथ क्रीड़ा की। ताल और रागमें आबद्ध होनेके कारण यह गीत अति ललित है। इसके लालित्यका सबसे बड़ा कारण यह है कि इसमें श्रीकेशवकी केलि-कलाका रहस्य वर्णित है। यह मञ्जुल मधुर गीत पढ़ने और सुननेवाले भक्तजनोंका कल्याण करे और उनके सुयशकी वृद्धि करे॥८॥ विश्वेषामनुरञ्जनेन जनयन्नानन्दमिन्दीवर- श्रेणीश्यामल-कोमलैरूपनयन्नङ्गै रनङ्गोत्सवम् । स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीभिरभितः प्रत्यङ्गमालिङ्गितः शृङ्गारः सखि मूर्त्तिमानिव मधौ मुग्धो हरिः क्रीड़ति ॥१९॥ अन्वय—सखि, अनुरञ्जनेन (स्वस्ववाञ्छातिरिक्त-रसदान- प्रीणतेन) विश्वेषाम् (जगताम्) आनन्दं जनयन्, मुग्धः (सुन्दरः)