गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ श्रीगीतगोविन्दम् हरिः मधौ (वसन्ते) इन्दीवर-श्रेणी-श्यामल-कोमलैः (नीलोत्पल- श्रेणीतोऽपि श्यामलैः सुकुमारैश्च) अङ्गैः अनङ्गोत्सवं (कामोल्लासं) उपनयन् (संवर्द्धयन्) [अत्र इन्दीवर-शब्देन शीतलत्वं, श्रेणीशब्देन नवनवायमानत्वं, श्यामलपदेन सुन्दरत्वं, कोमलशब्देन सुकुमारत्वञ्च सूचितम्] अभितः, (समस्ततः, सर्वैरङ्गैरित्यर्थः) व्रजसुन्दरीभिः स्वच्छन्दं, [यथास्यात् तथा] प्रत्यङ्गम् (प्रत्यवयम्) आलिङ्गितः (प्रगाढाश्लिष्टः; आलिङ्गनानु-रञ्जनेनानुरञ्जित इत्यर्थः) मूर्त्तिमान् (देहधरः) शृङ्गारः (शृङ्गाररसः) इव क्रीड़ति (एक एव विश्वमनुरञ्जयन् आनन्दयति) [शृङ्गार-रसोऽपि श्यामवर्णः—यथा— स्थायी भावो रतिः श्यामवर्णोऽयं विष्णुदैवतः इति] ॥९॥ अनुवाद— हे सखि ! इस वसन्तकालमें विलास-रसमें उन्मत्त श्रीकृष्ण मूर्त्तिमान शृङ्गार रसस्वरूप होकर विहार कर रहे हैं। वे इन्दीवर कमलसे भी अतीव अभिराम कोमल श्यामल अङ्गोंसे कन्दर्प महोत्सवका सम्पादन कर रहे हैं। गोपियोंकी जितनी भी अभिलाषा है, उससे भी कहीं अधिक उनकी उन्मत्त लालसाओंको अति अनुरागके साथ तृप्त कर रहे हैं। परन्तु व्रजसुन्दरियाँ विपरीत रतिरसमें आविष्ट हो विवश होकर उनके प्रत्येक अङ्गप्रत्यङ्गको सम्यक् एवं स्वतन्त्र रूपसे आलिङ्गित कर रही हैं ॥१॥ पद्यानुवाद— हैं विहर रहे मधु ऋतुमें, अनुरागमयी आँखोंसे— कोमल श्यामल सरसिजकी, मधु स्निग्धमयी पाँखोंसे ॥ है अङ्ग अङ्ग आलिङ्गित, मृदु गोपीजन-अङ्गोंमें। शृङ्गार-मूर्त्ति हरि दीपित, जन करते रस-रङ्गोंसे ॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीकी उद्दीपना भावनाको अभिवर्द्धित करने हेतु उन्हें प्रियतम श्रीहरिकी शृङ्गारिक चेष्टाओंको दिखलाती हुई कहती है—सखि ! देखो, इस समय वसन्तकाल है, इसमें भी मधुमास है और श्रीहरि मुग्ध होकर