गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ८७ समस्त गोपीयोंके साथ साक्षात् शृङ्गार रसके समान क्रीड़ा विलास कर रहे हैं, शृङ्गारः सखिः मूर्त्तिमानिव—श्रीकृष्णको मूर्त्तिमान शृङ्गार रसके समान बनाकर सखीके द्वारा उनका प्रमदासङ्गत्व स्वरूप व्यक्त हुआ है। पुरुषः प्रमदायुक्तः शृङ्गार इति संज्ञितः—प्रमदासे युक्त पुरुष शृङ्गार कहलाता है। गोपियोंकी जितनी भी अभिलाषा रही, उससे भी कहीं अधिक रूपमें श्रीकृष्ण अनङ्ग-उत्सव द्वारा उनका अनुरञ्जन कर रहे हैं, आनन्दवर्द्धन कर रहे हैं। वे श्रीहरि अनुरागके द्वारा समस्त जीवोंको आनन्द प्रदान कर रहे हैं। श्रीकृष्णके अङ्गोंका सौन्दर्य वर्णन करते हुए सखी कहती है कि वे नीलकमलसे भी अधिक श्यामल तथा कोमल हैं। इन्दीवर शब्दसे शीतलत्व, श्यामलत्व और कोमलत्व सूचित होता है। और भी इन्दीवर शब्दसे शैत्य और श्रेणी शब्दसे नव-नवायमानत्व समझा जाता है। श्यामल शब्दसे सुन्दरत्व और कोमल शब्दसे सुकुमारत्व घोषित होता है। अपने इन कोमलतम अङ्गोंके द्वारा श्रीकृष्ण कामोत्सव मना रहे हैं। व्रजसुन्दरियाँ बिना किसी अवरोधके स्वच्छन्दतापूर्वक उनके उन-उन अङ्गोंका आलिङ्गन किये हुए हैं। रस निष्पत्ति दो प्रकारसे होती है। नायकका नायिकाके प्रति तथा नायिकाका नायकके प्रति अनुरागसे। नायकका नायिकाके प्रति अनुराग रहनेपर भी नायिकाका नायकके प्रति जबतक अनुराग नहीं होता तब तक रसकी निष्पत्ति नहीं हो सकती है। प्रश्न होता है कि यहाँ तो परस्पर अनुरञ्जन मात्र हुआ है, तब रस कहाँ है ? विभाव, अनुभाव, सात्त्विक तथा सञ्चारी भावोंके सम्मिलनमें रसकी स्थिति है। यही रस स्नेह, मान, प्रणय,