गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 120, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ें८८ श्रीगीतगोविन्दम् राग-अनुराग, भाव-महाभाव आदिके क्रमसे अभिवर्द्धित होता है। अतः जब प्रेमका परिपाक हो जाता है तब रसका अभ्युदय होता है। यह प्रेम-रस जब प्रकाशित होने लगता है, तब नायक-नायिकामें काल, देश और क्रियाके सम्बन्धमें कोई सङ्कोच नहीं रहता। निःसङ्कोच भाव रहनेपर भी मिलनमें सम्पूर्णता नहीं हो सकती, इसके उत्तरमें कहते हैं कि महाभाव रसके द्वारा सर्वाङ्ग मिलन सिद्ध होता है। पुनः शङ्का होनेपर कि श्रीकृष्णने अङ्गनाओंका केवल एकदेशीय रूपमें अवलोकन किया है तो इसका निराकरण यह है कि प्रत्यङ्गमालिङ्गित-अर्थात् श्रीकृष्णने सर्वाङ्ग-एक-एक अङ्गको यथोचित क्रियाओं द्वारा आलिङ्गन, चुम्बन, स्पर्श आदिके द्वारा उन सबका अनुरञ्जन किया है। अब फिर यह प्रश्न सामने आया कि एकाकी श्रीकृष्णने सबका आलिङ्गन कैसे किया ? समाधान यह है कि जैसे शृङ्गार रस एक होकर भी समस्त जगतमें परिव्याप्त है, उसी प्रकार श्रीकृष्णमें भी सर्वव्यापकत्व है। इसी गुणसे वह अखिल विश्वका अनुरञ्जन करते हैं। प्रस्तुत श्लोकमें दीपकालङ्कार है, वैदर्भी रीति है, शार्दूल विक्रीड़ित छन्द है, शृङ्गार रस है तथा वाक्यौचित्य है। सम्पूर्ण गीतकी नायिका श्रीराधा उत्कण्ठिता नायिका हैं। नायकके द्वारा विपरीत आचरण किये जाने पर जो नायिका विरहोत्कण्ठिता तथा उदास रहती है, वह उत्कण्ठिता नायिका कहलाती है॥१॥ रासोल्लासभरेण विभ्रम-भृतामाभीर-वामभ्रुवा- मभ्यर्णे परिरभ्य निर्भरमुरः प्रेमान्धया राधया। साधु तद्वदनं सुधामयमिति व्याहृत्य गीतस्तुति- व्याजादुद्भटचुम्बितः स्मितमनोहारी हरिः पातु वः ॥२॥ इति श्रीगीतगोविन्द महाकाव्ये सामोद दामोदर नाम प्रथमः सर्गः।