भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 121

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ८९ अन्वय—[अधुना कविर्वसन्तरासमनुवर्णयन् शारदीय- रासकृत-श्रीराधाकृष्ण-विलासमनुस्मरन् तद्वर्णनरूपया आशिषा भक्तान् संवर्द्धयति]—प्रेमान्धया (अनुरागभरेण ज्ञानशून्यया) राधया रासोल्लासभरेण (रासोत्सवानन्दातिशयेन) विभ्रमभृताम् (हावभाव-समन्विताम्) आभीर-वामभ्रुवाम् (गोप-ललनानां) [मध्ये] अभ्यर्णं (समीपे) निर्भरं (गाढं यथा तथा) उरः (वक्षः) परिरभ्य (आश्लिष्य), त्वद्वदनं (तव मुखं) साधु सुधामयम् (पीयूषपूर्णम्) इति गीतस्तुतिव्याजात् (गानप्रशंसाच्छलेन) व्याहृत्य (उक्त्वा) उद्घटचुम्बितः (प्रगाढचुम्बितः) [अतएव] स्मितमनोहारी (स्मितेन मनोहरणशीलः) हरिः वः (युष्मान्) [भक्तानिति भावः] पातु॥ [अतएव सर्गोऽयं श्रीराधा-विलासानुभवेन सम्यङ्मोदेन सह वर्त्तमानो दामोदरो यत्र स इति सामोद-दामोदरः प्रथमः] ॥१०॥ अनुवाद—जिस श्रीकृष्णके प्रेममें अन्धी होकर विमुग्धा श्रीराधा लज्जाशून्य होकर रासलीलाके प्रेममें विह्वला शुभ्रा गोपाङ्गनाओंके समक्ष ही उनके वक्षःस्थलका सुदृढ़रूपसे आलिङ्गन कर 'अहा नाथ' तुम्हारा वदनकमल कितना सुन्दर है, कैसी अनुपम सुधाराशिका आकर है—इस प्रकार स्तुति-गान करती हुई सुचारु रूपसे चुम्बन करने लगी तथा श्रीराधाकी ऐसी प्रेमासक्ति देखकर हृदयमें स्वतःस्फूर्त्त आनन्दके कारण जिस श्रीकृष्णका मुखकमल मनोहर हास्यभूषणसे विभूषित होने लगा, ऐसे हे श्रीकृष्ण! आप सबका मङ्गलविधान करें। पद्यानुवाद— मधु रास-मुग्ध सखि सम्मुख मातल राधा भर भुजमें— हरिको; बोली—'प्रिय, कितना है अमृत मुख सरसिजमें।' फिर गीत-स्तुति मिस सत्वर वह चूम उठी मुख उनका। प्रिय चुम्बनसे प्रमुदित हरि अब दूर करें दुःख सबका॥ बालबोधिनी—यह प्रथम सर्गका अन्तिम श्लोक है। इस सर्गका नाम सामोद-दामोदर है।