गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९० श्रीगीतगोविन्दम् सखी वासन्ती रातका चित्राङ्कन करते हुए श्रीराधाजीको शारदीया रासस्थित श्रीकृष्णके विलासका स्मरण कराने लगी। श्रीकृष्ण वसन्त ऋतुमें कामोत्सवमें मग्न हैं। लीलानायक श्रीकृष्ण आभीर वामनयना गोपियोंके मध्य विराजमान हैं। पहले तो श्रीराधा विरहोत्कण्ठिता थी, किन्तु सखीसे प्रेरित होने पर उनके हृदयमें उत्कट अभिलाषा जाग उठी। लज्जाशीला होनेपर भी प्रेमावेशके कारण सभी सखियोंके समक्ष सुधामय वाक्योंसे स्तुतिगान करनेके बहाने श्रीकृष्णके वक्षःस्थलका सुदृढ़ आलिङ्गन कर उनका चुम्बन करने लगी। समस्त व्रजरम्भाओंके समक्ष राधाके हृदयका भाव निःसङ्कोच उद्घाटित होनेपर श्रीकृष्णका मुखमण्डल मञ्जुल हर्षसे परिपूर्ण हो गया। शील-स्वभावा श्रीराधिकाकी विदग्धता एवं रासोल्लासके कारण विभ्रम भावोन्मत्ता प्रेमान्धतासे अभिभूत हुए श्रीकृष्ण सबका मङ्गल विधान करें। प्रस्तुत श्लोकमें नायिका प्रगल्भा है और नायक मुग्ध है। शार्दूल विक्रीड़ित छन्द है। आशीः, अप्रस्तुत प्रशंसा, व्याजोक्ति आदि अलङ्कार हैं। इति बालबोधन्यां श्रीगीतगोविन्दटीकायां प्रथमः सर्गः। 卐卐卐