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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ८५ विचित्रं श्रीराधाविलापपरीक्षणरूपं केशवस्य केलिरहस्यं) [भक्तानां] शुभानि वितनोतु (विस्तारयतु) ॥८॥ अनुवाद— श्रीजयदेव कवि द्वारा रचित यह अद्भुत मङ्गलमय ललित गीत सभीके यशका विस्तार करे। यह शुभद गीत श्रीवृन्दावनके विपिन विहारमें श्रीराधाजीके विलास परीक्षण एवं श्रीकृष्णके द्वारा की गयी अद्भुत कामक्रीड़ाके रहस्यसे सम्बन्धित है। यह गान वन बिहारजनित सौष्ठवको अभिवर्द्धित करनेवाला है॥ पद्यानुवाद— मग्न हुए रस सरिमें कवि 'जय' निशिदिन बहते बहते। श्रोता भी हों मुक्त क्लेशसे सब कुछ सहते सहते॥ बालबोधिनी—गीतके उपसंहारमें कहा गया है कि कवि जयदेवजीने श्रीकेशवकी अद्भुत केलिक्रीड़ा-रहस्यका इस गीतमें निरूपण किया है। अद्भुत रहस्य यह है कि एक ही श्रीकृष्णने एक ही समयमें अनेक वराङ्गनाओंकी अभिलाषाओंकी पूर्त्ति करते हुए उनके साथ क्रीड़ा की। ताल और रागमें आबद्ध होनेके कारण यह गीत अति ललित है। इसके लालित्यका सबसे बड़ा कारण यह है कि इसमें श्रीकेशवकी केलि-कलाका रहस्य वर्णित है। यह मञ्जुल मधुर गीत पढ़ने और सुननेवाले भक्तजनोंका कल्याण करे और उनके सुयशकी वृद्धि करे॥८॥ विश्वेषामनुरञ्जनेन जनयन्नानन्दमिन्दीवर- श्रेणीश्यामल-कोमलैरूपनयन्नङ्गै रनङ्गोत्सवम् । स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीभिरभितः प्रत्यङ्गमालिङ्गितः शृङ्गारः सखि मूर्त्तिमानिव मधौ मुग्धो हरिः क्रीड़ति ॥१९॥ अन्वय—सखि, अनुरञ्जनेन (स्वस्ववाञ्छातिरिक्त-रसदान- प्रीणतेन) विश्वेषाम् (जगताम्) आनन्दं जनयन्, मुग्धः (सुन्दरः)

८६ श्रीगीतगोविन्दम् हरिः मधौ (वसन्ते) इन्दीवर-श्रेणी-श्यामल-कोमलैः (नीलोत्पल- श्रेणीतोऽपि श्यामलैः सुकुमारैश्च) अङ्गैः अनङ्गोत्सवं (कामोल्लासं) उपनयन् (संवर्द्धयन्) [अत्र इन्दीवर-शब्देन शीतलत्वं, श्रेणीशब्देन नवनवायमानत्वं, श्यामलपदेन सुन्दरत्वं, कोमलशब्देन सुकुमारत्वञ्च सूचितम्] अभितः, (समस्ततः, सर्वैरङ्गैरित्यर्थः) व्रजसुन्दरीभिः स्वच्छन्दं, [यथास्यात् तथा] प्रत्यङ्गम् (प्रत्यवयम्) आलिङ्गितः (प्रगाढाश्लिष्टः; आलिङ्गनानु-रञ्जनेनानुरञ्जित इत्यर्थः) मूर्त्तिमान् (देहधरः) शृङ्गारः (शृङ्गाररसः) इव क्रीड़ति (एक एव विश्वमनुरञ्जयन् आनन्दयति) [शृङ्गार-रसोऽपि श्यामवर्णः—यथा— स्थायी भावो रतिः श्यामवर्णोऽयं विष्णुदैवतः इति] ॥९॥ अनुवाद— हे सखि ! इस वसन्तकालमें विलास-रसमें उन्मत्त श्रीकृष्ण मूर्त्तिमान शृङ्गार रसस्वरूप होकर विहार कर रहे हैं। वे इन्दीवर कमलसे भी अतीव अभिराम कोमल श्यामल अङ्गोंसे कन्दर्प महोत्सवका सम्पादन कर रहे हैं। गोपियोंकी जितनी भी अभिलाषा है, उससे भी कहीं अधिक उनकी उन्मत्त लालसाओंको अति अनुरागके साथ तृप्त कर रहे हैं। परन्तु व्रजसुन्दरियाँ विपरीत रतिरसमें आविष्ट हो विवश होकर उनके प्रत्येक अङ्गप्रत्यङ्गको सम्यक् एवं स्वतन्त्र रूपसे आलिङ्गित कर रही हैं ॥१॥ पद्यानुवाद— हैं विहर रहे मधु ऋतुमें, अनुरागमयी आँखोंसे— कोमल श्यामल सरसिजकी, मधु स्निग्धमयी पाँखोंसे ॥ है अङ्ग अङ्ग आलिङ्गित, मृदु गोपीजन-अङ्गोंमें। शृङ्गार-मूर्त्ति हरि दीपित, जन करते रस-रङ्गोंसे ॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीकी उद्दीपना भावनाको अभिवर्द्धित करने हेतु उन्हें प्रियतम श्रीहरिकी शृङ्गारिक चेष्टाओंको दिखलाती हुई कहती है—सखि ! देखो, इस समय वसन्तकाल है, इसमें भी मधुमास है और श्रीहरि मुग्ध होकर

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ८७ समस्त गोपीयोंके साथ साक्षात् शृङ्गार रसके समान क्रीड़ा विलास कर रहे हैं, शृङ्गारः सखिः मूर्त्तिमानिव—श्रीकृष्णको मूर्त्तिमान शृङ्गार रसके समान बनाकर सखीके द्वारा उनका प्रमदासङ्गत्व स्वरूप व्यक्त हुआ है। पुरुषः प्रमदायुक्तः शृङ्गार इति संज्ञितः—प्रमदासे युक्त पुरुष शृङ्गार कहलाता है। गोपियोंकी जितनी भी अभिलाषा रही, उससे भी कहीं अधिक रूपमें श्रीकृष्ण अनङ्ग-उत्सव द्वारा उनका अनुरञ्जन कर रहे हैं, आनन्दवर्द्धन कर रहे हैं। वे श्रीहरि अनुरागके द्वारा समस्त जीवोंको आनन्द प्रदान कर रहे हैं। श्रीकृष्णके अङ्गोंका सौन्दर्य वर्णन करते हुए सखी कहती है कि वे नीलकमलसे भी अधिक श्यामल तथा कोमल हैं। इन्दीवर शब्दसे शीतलत्व, श्यामलत्व और कोमलत्व सूचित होता है। और भी इन्दीवर शब्दसे शैत्य और श्रेणी शब्दसे नव-नवायमानत्व समझा जाता है। श्यामल शब्दसे सुन्दरत्व और कोमल शब्दसे सुकुमारत्व घोषित होता है। अपने इन कोमलतम अङ्गोंके द्वारा श्रीकृष्ण कामोत्सव मना रहे हैं। व्रजसुन्दरियाँ बिना किसी अवरोधके स्वच्छन्दतापूर्वक उनके उन-उन अङ्गोंका आलिङ्गन किये हुए हैं। रस निष्पत्ति दो प्रकारसे होती है। नायकका नायिकाके प्रति तथा नायिकाका नायकके प्रति अनुरागसे। नायकका नायिकाके प्रति अनुराग रहनेपर भी नायिकाका नायकके प्रति जबतक अनुराग नहीं होता तब तक रसकी निष्पत्ति नहीं हो सकती है। प्रश्न होता है कि यहाँ तो परस्पर अनुरञ्जन मात्र हुआ है, तब रस कहाँ है ? विभाव, अनुभाव, सात्त्विक तथा सञ्चारी भावोंके सम्मिलनमें रसकी स्थिति है। यही रस स्नेह, मान, प्रणय,

८८ श्रीगीतगोविन्दम् राग-अनुराग, भाव-महाभाव आदिके क्रमसे अभिवर्द्धित होता है। अतः जब प्रेमका परिपाक हो जाता है तब रसका अभ्युदय होता है। यह प्रेम-रस जब प्रकाशित होने लगता है, तब नायक-नायिकामें काल, देश और क्रियाके सम्बन्धमें कोई सङ्कोच नहीं रहता। निःसङ्कोच भाव रहनेपर भी मिलनमें सम्पूर्णता नहीं हो सकती, इसके उत्तरमें कहते हैं कि महाभाव रसके द्वारा सर्वाङ्ग मिलन सिद्ध होता है। पुनः शङ्का होनेपर कि श्रीकृष्णने अङ्गनाओंका केवल एकदेशीय रूपमें अवलोकन किया है तो इसका निराकरण यह है कि प्रत्यङ्गमालिङ्गित-अर्थात् श्रीकृष्णने सर्वाङ्ग-एक-एक अङ्गको यथोचित क्रियाओं द्वारा आलिङ्गन, चुम्बन, स्पर्श आदिके द्वारा उन सबका अनुरञ्जन किया है। अब फिर यह प्रश्न सामने आया कि एकाकी श्रीकृष्णने सबका आलिङ्गन कैसे किया ? समाधान यह है कि जैसे शृङ्गार रस एक होकर भी समस्त जगतमें परिव्याप्त है, उसी प्रकार श्रीकृष्णमें भी सर्वव्यापकत्व है। इसी गुणसे वह अखिल विश्वका अनुरञ्जन करते हैं। प्रस्तुत श्लोकमें दीपकालङ्कार है, वैदर्भी रीति है, शार्दूल विक्रीड़ित छन्द है, शृङ्गार रस है तथा वाक्यौचित्य है। सम्पूर्ण गीतकी नायिका श्रीराधा उत्कण्ठिता नायिका हैं। नायकके द्वारा विपरीत आचरण किये जाने पर जो नायिका विरहोत्कण्ठिता तथा उदास रहती है, वह उत्कण्ठिता नायिका कहलाती है॥१॥ रासोल्लासभरेण विभ्रम-भृतामाभीर-वामभ्रुवा- मभ्यर्णे परिरभ्य निर्भरमुरः प्रेमान्धया राधया। साधु तद्वदनं सुधामयमिति व्याहृत्य गीतस्तुति- व्याजादुद्भटचुम्बितः स्मितमनोहारी हरिः पातु वः ॥२॥ इति श्रीगीतगोविन्द महाकाव्ये सामोद दामोदर नाम प्रथमः सर्गः।

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ८९ अन्वय—[अधुना कविर्वसन्तरासमनुवर्णयन् शारदीय- रासकृत-श्रीराधाकृष्ण-विलासमनुस्मरन् तद्वर्णनरूपया आशिषा भक्तान् संवर्द्धयति]—प्रेमान्धया (अनुरागभरेण ज्ञानशून्यया) राधया रासोल्लासभरेण (रासोत्सवानन्दातिशयेन) विभ्रमभृताम् (हावभाव-समन्विताम्) आभीर-वामभ्रुवाम् (गोप-ललनानां) [मध्ये] अभ्यर्णं (समीपे) निर्भरं (गाढं यथा तथा) उरः (वक्षः) परिरभ्य (आश्लिष्य), त्वद्वदनं (तव मुखं) साधु सुधामयम् (पीयूषपूर्णम्) इति गीतस्तुतिव्याजात् (गानप्रशंसाच्छलेन) व्याहृत्य (उक्त्वा) उद्घटचुम्बितः (प्रगाढचुम्बितः) [अतएव] स्मितमनोहारी (स्मितेन मनोहरणशीलः) हरिः वः (युष्मान्) [भक्तानिति भावः] पातु॥ [अतएव सर्गोऽयं श्रीराधा-विलासानुभवेन सम्यङ्मोदेन सह वर्त्तमानो दामोदरो यत्र स इति सामोद-दामोदरः प्रथमः] ॥१०॥ अनुवाद—जिस श्रीकृष्णके प्रेममें अन्धी होकर विमुग्धा श्रीराधा लज्जाशून्य होकर रासलीलाके प्रेममें विह्वला शुभ्रा गोपाङ्गनाओंके समक्ष ही उनके वक्षःस्थलका सुदृढ़रूपसे आलिङ्गन कर 'अहा नाथ' तुम्हारा वदनकमल कितना सुन्दर है, कैसी अनुपम सुधाराशिका आकर है—इस प्रकार स्तुति-गान करती हुई सुचारु रूपसे चुम्बन करने लगी तथा श्रीराधाकी ऐसी प्रेमासक्ति देखकर हृदयमें स्वतःस्फूर्त्त आनन्दके कारण जिस श्रीकृष्णका मुखकमल मनोहर हास्यभूषणसे विभूषित होने लगा, ऐसे हे श्रीकृष्ण! आप सबका मङ्गलविधान करें। पद्यानुवाद— मधु रास-मुग्ध सखि सम्मुख मातल राधा भर भुजमें— हरिको; बोली—'प्रिय, कितना है अमृत मुख सरसिजमें।' फिर गीत-स्तुति मिस सत्वर वह चूम उठी मुख उनका। प्रिय चुम्बनसे प्रमुदित हरि अब दूर करें दुःख सबका॥ बालबोधिनी—यह प्रथम सर्गका अन्तिम श्लोक है। इस सर्गका नाम सामोद-दामोदर है।

९० श्रीगीतगोविन्दम् सखी वासन्ती रातका चित्राङ्कन करते हुए श्रीराधाजीको शारदीया रासस्थित श्रीकृष्णके विलासका स्मरण कराने लगी। श्रीकृष्ण वसन्त ऋतुमें कामोत्सवमें मग्न हैं। लीलानायक श्रीकृष्ण आभीर वामनयना गोपियोंके मध्य विराजमान हैं। पहले तो श्रीराधा विरहोत्कण्ठिता थी, किन्तु सखीसे प्रेरित होने पर उनके हृदयमें उत्कट अभिलाषा जाग उठी। लज्जाशीला होनेपर भी प्रेमावेशके कारण सभी सखियोंके समक्ष सुधामय वाक्योंसे स्तुतिगान करनेके बहाने श्रीकृष्णके वक्षःस्थलका सुदृढ़ आलिङ्गन कर उनका चुम्बन करने लगी। समस्त व्रजरम्भाओंके समक्ष राधाके हृदयका भाव निःसङ्कोच उद्घाटित होनेपर श्रीकृष्णका मुखमण्डल मञ्जुल हर्षसे परिपूर्ण हो गया। शील-स्वभावा श्रीराधिकाकी विदग्धता एवं रासोल्लासके कारण विभ्रम भावोन्मत्ता प्रेमान्धतासे अभिभूत हुए श्रीकृष्ण सबका मङ्गल विधान करें। प्रस्तुत श्लोकमें नायिका प्रगल्भा है और नायक मुग्ध है। शार्दूल विक्रीड़ित छन्द है। आशीः, अप्रस्तुत प्रशंसा, व्याजोक्ति आदि अलङ्कार हैं। इति बालबोधन्यां श्रीगीतगोविन्दटीकायां प्रथमः सर्गः। 卐卐卐

द्वितीयः सर्गः (अक्लेश-केशवः) विहरति वने राधा साधारण-प्रणये हरौ विगलित-निजोत्कर्षादीर्ष्यावशेन गतान्यतः। क्वचिदपि लताकुञ्जे गुञ्जन्मधुव्रत-मण्डली- मुखर-शिखरे लीना दीनाप्युवाच रहः सखीम् ॥१॥ अन्वय—[अथ सखीवचनं निशम्य श्रीकृष्णस्य साधारण- विहरणं विलोक्य ईर्ष्यादयात् तद्दर्शनमप्यसहमाना अन्यतोगता राधा सखीमुवाच]—साधारण-प्रणये (साधारणः समानः सर्वास्वेव गोपाङ्गनासु इति शेषः प्रणयः प्रीतिः यस्य तथाभूते) हरौ (कृष्णे) वने विहरति (विहारं कुर्वति सति) राधा विगलित- निजोत्कर्षात् (विगलितो निजोत्कर्षः अहमेव असाधारणी प्रिया इत्येवं रूपेण यतस्तस्मादित्यर्थः (ईर्ष्यावशेन) (अन्योत्कर्षा- सहिष्णुताया) दीना (कातरा) [सती] [प्रणयतारतम्यादपि विहारस्य साम्यव्यवहरणात् श्रीकृष्णस्य स्वभावान्यथात्वदर्शनाक्षमतया] अन्यतः (अन्यस्मिन्) गुञ्जन्मधुव्रत-मण्डली-मुखर-शिखरे (गुञ्जन्तो ये मधुव्रताः (भ्रमरास्तेषां मण्डलीभिः श्रेणीभिः मुखरं ध्वनितं शिखरम् अग्रं यस्य तादृशे) क्वचिदपि लताकुञ्जे लीना लुक्कायिता सती) रहः (निर्जने) सखीम् [अत्यन्तगोप्यमपि] उवाच ॥१॥ अनुवाद—समस्त गोपाङ्गनाओंके साथ एक समान स्नेहमय श्रीकृष्णको वृन्दाविपिनमें विहार करते हुए देखकर अन्य गोपिकाओंकी अपेक्षा अपना वैशिष्ट्य न होनेसे प्रणय-कोपके आवेशमें वहाँसे दूर जाकर भ्रमर-मण्डलीसे गुञ्जित दूसरे लताकुञ्जमें श्रीराधा छिप गयी एवं अति दीन होकर गोपनीय बातोंको भी सखीसे कहने लगी।

९२ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— राधा बोल उठी मनकी लख हरि गोपीजनकी क्रीड़ा निशिदिन वृन्दावनकी अलिकुल-गुञ्जित लता-कुञ्जमें छिपकर जीवन-धनकी। लीलासे ईर्षाहित होकर भूली सुध-बुध तनकी राधा बोल उठी मनकी ॥१॥ बालबोधिनी—इस द्वितीय सर्गका नाम अक्लेश-केशव है। तात्पर्य यह है कि स्वयं-भगवान् रसिक-शेखर श्रीकृष्ण सदैव क्लेशरहित हैं। उनमें क्लेशका संक्लेश मात्र भी नहीं है। भगवान्‌के दो असाधारण चिह्न हैं— १. अखिलहेयप्रत्यनिकत्त्व, अर्थात् भगवान्‌से किसी प्रकारके क्लेश-कर्म-विपाक आदि प्राकृतिक दोषोंका सम्पर्क नहीं होता है। वे सभी दोषोंके प्रत्यनीक हैं अर्थात् प्रबल शत्रु हैं। योगसूत्रकारने भी साधनपादमें कहा है— क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः। अर्थात् क्लेश कर्म, उनके परिणाम तथा वासनादि दोषोंके सम्पर्कसे रहित पुरुषविशेषको ईश्वर शब्दसे अभिहित किया जाता है। २. अखिल कल्याण गुणाकरत्व—श्रीकृष्ण सम्पूर्ण संसारका कल्याण करनेवाले अप्राकृत सद्गुणोंके आकर हैं। इन्हीं अर्थोंके कारण इस सर्गका नाम अक्लेश-केशव है। मानवती श्रीराधा सखीके समझाये जानेपर श्रीकृष्णके मदन-महोत्सवमें सम्मिलित हो गयीं। इस मदन-उत्सवमें श्रीकृष्ण सभी सखियोंके प्रति समान स्नेह रखते हुए विहार कर रहे थे। जब कि श्रीराधाको यह गर्व था कि मैं उनकी सर्वश्रेष्ठा वल्लभा हूँ, नित्य सहचरी हूँ, परन्तु आज अपने प्रति विशिष्ट स्नेह प्रदर्शित न होनेसे श्रीराधा प्रणय-कोपके

द्वितीयः सर्गः-अक्लेश-केशवः ९३ आवेशमें अन्यत्र एक कुञ्जमें चली आयीं और छिपकर बैठ गयीं। ईर्ष्याकषायिता श्रीराधाको वहाँ भी कहीं शान्ति नहीं मिली। इस लताकुञ्जके शिखरपर पुष्पोंमें मँडराता हुआ अलिवृन्द गुञ्जार कर रहा था। उस समय श्रीराधा अपनी मानकी वेदनासे पीड़ित होकर अपनी सखीसे उन रहस्यात्मक बातोंको कहने लगी, जिन्हें किसीके समक्ष कहा नहीं जाना चाहिए। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छन्द है। हरिणी छन्दका लक्षण है—‘रसयुग हयैः न्सौ म्नौ स्लौ गो यदा हरिणी।’ नायिका प्रौढ़ा है। रतिभावके उद्रेकातिशयके कारण रसवदलङ्कार तथा अनुप्रास अलङ्कार हैं। अपि-सोत्कर्ष भावमयी राधा कुछ न बोल सकनेकी स्थितिमें थीं, रहस्यमयी बातें बतलाने वाली नहीं थीं, यह ‘अपि’ शब्दके द्वारा घोषित है। अतः ‘अपि’ शब्द चमत्कारातिशय युक्त है। गुर्ज्जरी रागेण यति तालेन गीयते ॥ प्रबन्ध ५॥ प्रस्तुत श्लोक पञ्चम प्रबन्धकी पुष्पिका रूप है। दूसरे श्लोकसे इसका समुचित प्रारम्भ है। यह प्रबन्ध गुर्ज्जरी-राग तथा यति-तालसे गाया जाता है॥१॥ गीतम् ॥५॥ गुर्ज्जरीराग यतितालाभ्यां गीयते सञ्चरदधर-सुधा-मधुर-ध्वनि-मुखरित-मोहन-वंशं बलित-दृगञ्चल-चञ्चल-मौलि-कपोल-विलोल-वतंसम्। रासे हरिमिह विहित-विलासं स्मरति मनो मम कृत-परिहासम् ॥१॥ध्रुवम्॥ अन्वय-सखि, सञ्चरदधर-सुधा मधुर-ध्वनि-मुखरित- मोहन-वंशं (सञ्चरन्ती उद्गच्छन्ता अधरसुधा यत्र तेन

“हरि-मूरतका ध्यान, हो आता अनजान”

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः ९५ मधुरेण ध्वनिना मुखरितः शब्दितः मोहनः मनोमोहकरः वंशः वेणु येन तादृशं) वलित-दृगञ्चल-चञ्चल-मौलि-कपोल- विलोल-वतंसं (वलितेन इतस्ततः प्रचरता दृगञ्चलेन दृशोः नेत्रयोः अञ्चलं चक्षुःप्रान्तभागः तेन कटाक्षेणेत्यर्थः योऽसौ चञ्चलमौलिः कम्पितशिरोभूषणं तेन कपोलयोः गण्डयोः विलोलौ चञ्चलौ वतंसौ मणिकुण्डले यस्य तादृशं) इह रासे (शारदीय-रासलीलायां) विहितविलासं (विहितः कृतः विलासः हावभावो येन तादृशं) [तथा] कृतपरिहासं (कृतः परिहासो येन तादृशं) हरिं मम मनः स्मरति ॥१॥ अनुवाद—सखि, कैसी आश्चर्यकी बात है कि इस शारदीय रासोत्सवमें श्रीकृष्ण मुझे छोड़कर अन्य कामिनियोंके साथ कौतुक आमोदमें विलास कर रहे हैं। फिर भी मेरा मन उनका पुनः पुनः स्मरण कर रहा है। वे सञ्चरणशील अपने मुखामृतको अपने करकमलमें स्थित वेणुमें भरकर फुत्कारके साथ सुमधुर मुखर स्वरोंमें बजा रहे हैं, अपाङ्ग-भङ्गीके द्वारा अपने मणिमय शिरोभूषणको चञ्चलता प्रदान कर रहे हैं, उनके कानोंके आभूषण कपोल देशमें दोलायमान हो रहे हैं, उनके इस श्याम रूपका, उनके हास-परिहासका मुझे बारम्बार स्मरण हो रहा है॥१॥ पद्यानुवाद— हे सखि! कम्पित अधर मधु-ध्वनित वेणु-स्वर चलित दृगञ्चल चञ्चल शिर, भर— गति कपोल द्वय लोल वलय वर रास विलास हास कृत मनहर हरि मूरतका ध्यान, हो आता अनजान ॥ बालबोधिनी—सखिने कहा—प्रिय राधिके! जब श्रीकृष्णने तुम्हारा प्रत्याख्यान किया है, तब तुम क्यों उनके प्रेममें इतनी अधीर हो रही हो?

९६ श्रीगीतगोविन्दम् सखीके द्वारा अपनी भर्त्सना सुनकर श्रीराधा अति दीन भावसे कहने लगी—सखि ! तुम ठीक कह रही हो, श्रीकृष्ण मेरा परित्याग कर दूसरी रमणियोंके साथ अतिशय अनुरागयुक्त होकर विहार कर रहे हैं, तब उनके प्रति मेरा अनुराग प्रकाशित होना व्यर्थ ही है, पर मैं क्या करूँ? मुझे उनकी नर्मकेलिका अनुभव है, उनके विलासोंका स्मरण हो रहा है, सखि ! ये वे ही केलिवन हैं, जहाँ हमने केलिसुख प्राप्त किया था, उनके प्रति मेरी प्रबल आसक्ति है, मुझसे उनका त्याग नहीं होता। सब समय उनके गुणोंका ही स्मरण होता रहता है। मेरे हृदयमें उनके दोषका लेशमात्र भी भाव नहीं उठता, मुझे सदैव सन्तुष्टि रहती है। जब श्यामसुन्दर रास-रजनीमें व्रजाङ्गनाओंके साथ हास-परिहास करते हैं तब—सञ्चरदधर सुधा मधुर ध्वनि मुखरित विग्रहम्—सञ्चरन्त्या अधरसुधया मधुरो ध्वनि यत्र तद् यथा स्याद् तथा मुखरिता मोहिनी वंशी येन तम्। वे जब अधरसुधासे संक्रान्त मधुर-ध्वनि करनेवाली उस वंशीको बजाते हैं, जिसका मोहनकारित्व प्रख्यात है, उस समय मेरा मन अस्थिर हो जाता है, मैं अपना धैर्य खो बैठती हूँ। उनके अङ्गोंका सौन्दर्य, चञ्चल शिरोभूषण, दोलायमान कर्णकुण्डल तथा विशेषकर गोप-युवतियोंका आलिङ्गन चुम्बन स्मरण करते ही मैं सुधबुध खो बैठती हूँ—सखि मैं क्या करूँ? ॥१॥ चन्द्रक-चारु-मयूर-शिखण्डक-मण्डल-वलयित-केशं। प्रचुर-पुरन्दर-धनुरनुरञ्जित-मेदुर-मुदिर-सुवेशं ॥ रासे हरिमिह ... ... ॥२॥ अन्वय—सखि, चन्द्रक-चारु-मयूर-शिखण्डक-मण्डल- वलयितकेशं (चन्द्रकेण अर्द्धचन्द्राकारेण चारूणां मयूरशिखण्डकानां मयूरपुच्छानां मण्डलेन वलयितः वेष्टितः केशो यस्य तादृशं) [अतएव] प्रचुरपुरन्दर-धनुरनुरञ्जित-चित्रितः मेदुरः स्निग्धो यो

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः ९७ मुदिरो नवजलधरः तद्वत् सुशोभनो वेशो यस्य तादृशं) [रासे विहितविलासमित्यादि] ॥२॥ अनुवाद—अर्द्धचन्द्राकारसे सुशोभित अति मनोहर मयूर- पिच्छसे वेष्टित केशवाले तथा प्रचुर मात्रामें इन्द्रधनुषोंसे अनुरञ्जित नवीन जलधर पटलके समान शोभा धारण करनेवाले श्रीकृष्णका मुझे अधिक स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— चन्द्रक चारु मयूर शिखण्डित कोमल केश वलय आमण्डित। प्रचुर पुरन्दर धनु अनुरञ्जित सघन मेघ-छवि वपु बहु सज्जित॥ बालबोधिनी—मोर पंखके अन्तिम भागमें बने हुए वृत्ताकार मण्डलको 'चन्द्रक' कहा जाता है। चन्द्रमाके समान यह भी आह्लाददायक होता है। इन्हीं मधुर पिच्छोंसे श्रीकृष्णका केशपाश वलयित हो रहा है। उससे उनका श्यामवर्ण ऐसे प्रतीत हो रहा है, मानो सजल मेघ अनेक इन्द्रधनुषोंसे सुसज्जित हो, उन्हींके कमनीय दिव्य विग्रहका मुझे बारबार स्मरण हो रहा है॥२॥ गोप-कदम्ब-नितम्बवती-मुख-चुम्बन-लम्भित-लोभं। बन्धुजीव-मधुराधर-पल्लवमुल्लसित-स्मित-शोभम्॥ रासे हरिमिह ... ... ॥३॥ अन्वय—सखि, गोप-कदम्ब-नितम्बवती-मुखचुम्बन-लम्भित- लोभम् (गोप-कदम्बस्य गोपकुलस्य या नितम्बवत्यः नितम्बिन्यः तरुण्यः तासां मुख-चुम्बने लम्भितः प्रापितः लोभः यस्य तं) [तथा] बन्धुजीव-मधुराधर-पल्लवम् (बन्धुक-पुष्पवत् अरुणः मधुरः मनोहरश्च अधरपल्लवो यस्य तादृशम्) [तथा] उल्लसित-स्मित-शोभम् (उल्लासिता परिवर्द्धिता स्मितेन मृदुमधुरहासेन शोभा यस्य तथोक्तम्) [मम मनः रासे विहितविलासमित्यादि] ॥३॥

९८ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—गोपललनाओंके मुखकमलका चुम्बन करनेकी अभिलाषासे इस अनङ्ग उत्सवमें अपने मुखको झुकाये हुए, उनका सुकुमार अधर पल्लव बन्धुक कुसुमवत् मनोहारी अरुण वर्णीय हो रहा है, स्फूत्तियुक्त मन्द-मुस्कानकी अपूर्व शोभा उनके सुन्दर मुखमण्डलमें विस्तार प्राप्त कर रही है, ऐसे उन श्रीकृष्णका मुझे अति स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— गोप वधू चुम्बन-रस लोभित अधर वधूक स्मित मधु शोभित। पुलक युवति-भुज अति आलिङ्गित पद-कर मणि-द्युति निशि-तमचूर्णित ॥ हरि मूरतका ध्यान हो आता अनजान ॥ बालबोधिनी—गोपवधुओंके मुख चुम्बनका लोभ धारण करनेवाले श्रीकृष्णकी मुझे याद आ रही है। जिस समय वे रहस्यमयी कुञ्जक्रीड़ामें निमग्न रहते हैं, उस समय उन गोपियोंके मुखका बारंबार चुम्बन करनेका लोभ बढ़ता जाता है। श्रीकृष्णके बन्धुक अर्थात् दुपहरियाके पुष्पके समान लाल-लाल होंठका मुझे स्मरण आता है। सखि ! मुस्करानेपर तो उनकी शोभा और भी बढ़ जाती है। विपुल-पुलक-भुज-पल्लव-वलयित-वल्लव-युवति-सहस्रं। कर-चरणोरसि-मणिगण-भूषण-किरण-विभिन्न-तमिस्रं— रासे हरिमिह ... ... ॥४॥ अन्वय—सखि, विपुल-पुलक-भुजपल्लव-वलयित- वल्लव-युवति- सहस्रं (विपुलाः अगाधाः पुलका रोमाञ्चा ययोस्ताभ्यां भुजपल्लवाभ्यां पल्लव-पेलव-भुजाभ्यां वलयितं परिवेष्टितम् आलिङ्गितमित्यर्थः वल्लव-युवतीनां गोप-तरुणीनां सहस्रं येन तम्; एकदानेकालिङ्गनात् नैकनिष्ठप्रेमाणमित्यर्थः);

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः ९९ [तथा] करचरणोरसि (हस्तपदवक्षसि) मणिगण-भूषण-किरण- विभिन्न-तमिस्रं (मणिगणभूषणानां मणिमयालङ्काराणां किरणेन विभिन्नं निराकृतं तमिस्रम् अन्धकारो येन तादृशम्) [मम मनः रासे विहितविलासमित्यादि] ॥४॥ अनुवाद—अतिशय रोमाञ्चसे परिप्लुत होकर अपने सुकोमल भुज-पल्लवके द्वारा हजारों-हजारों गोप-युवतियोंको समालिङ्गित करनेवाले एवं कर, चरण और वक्षस्थलमें ग्रथित मणिमय आभूषणोंकी किरणोंसे दिशाओंको आलोकित करनेवाले श्रीकृष्णका मुझे स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— पुलक युवती भुज अति आलिङ्गित पद कर मणि द्युति निशि तम चूर्णित॥ हरि मूरतका ध्यान हो आता अनजान॥ बालबोधिनी—इस समय श्यामसुन्दरके उन कोमल-कोमल पल्लवोंके समान हस्तोंका मुझे स्मरण हो रहा है, जो प्रभूत रोमाञ्चसे युक्त हैं और जिनसे वे सहस्र गोपियोंको परिवेष्टित कर उनका समालिङ्गन करते हैं। उनके कर, चरण तथा हृदयस्थलके आभूषणोंके सौन्दर्यकी किरणोंसे सम्पूर्ण अन्धकार विदूरित हो गया है॥४॥ जलद-पटल-बलदिन्दु-विनिन्दक-चन्दन-तिलक-ललाटं। पीन-पयोधर-परिसर-मर्दन-निर्दय-हृदय-कवाटम्— रासे हरिमिह ... ... ॥५ ॥ अन्वय—सखि, जलद-पटल-बलदिन्दु-विनिन्दक-चन्दन- तिलक-ललाटं (जलद-पटलेन मेघसमूहेन बलन् परिस्फुरन् यः इन्दुः चन्द्रः तस्य विनिन्दकः तिरस्कारकः चन्दनतिलकः ललाटे यस्य तादृशं) [तथा] पीन-पयोधर-परिसर-मर्दन-निर्दय-

१०० श्रीगीतगोविन्दम् हृदय-कवाटम् (पीनयोः स्थूलयोः पयोधरयोः स्तनयोः यः परिसरः परिणाहः विस्तार इति यावत् तस्य मर्दनाय निर्दयः हृदयकवाटः विशालं वक्षः यस्य तादृशम्; अत्र हृदयस्य दृढ़त्व-विस्तीर्णत्वाभ्यां कवाटत्वेन निरूपणम्) [मम मनः रासे विहित-विलास-मित्यादि] ॥५॥ अनुवाद—अपने ललाटमें मनोहर चन्दनके तिलकको धारणकर नवीन जलद मण्डलमें विद्यमान चञ्चल चन्द्रमाकी महती शोभाको पराभूतकर अनिर्वचनीय सुषमाको धारण करनेवाले एवं वर युवतियोंके पीन पयोधरोंके अमूल्य प्रान्त भागको अपने सुविशाल सुदृढ़ वक्षःस्थलसे निपीडित करनेमें सतत अनुरक्त कवाटमय (किवाड़ स्वरूप) निर्दय-हृदय श्रीकृष्णका मुझे बार-बार स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— चन्दन तिलक ललाट विचर्चित, जलद पटलमें विधु सम दर्शित। युवती पीन पयोधर मर्दित, अपनी निर्दयता पर हर्षित। हरि मूरतका ध्यान, हो आता अनजान ॥ बालबोधिनी—सजल बादलोंके बीच चञ्चल चन्द्रमाकी शोभा अत्यधिक प्रेक्षणीय होती है। श्रीकृष्णके श्यामवर्णका विस्तृत ललाट-पटल ही सजल मेघतुल्य है और उसपर श्वेतवर्णका चन्दन तिलक आह्लादप्रदायी चन्द्रमाकी छटाओंका भी तिरस्कार करनेवाला है। रतिकालमें युवतियोंके कोमल स्तनोंको अपने विशाल वक्षःस्थलसे बड़ी ही निर्दयतापूर्वक मर्दन करनेवाले श्रीकृष्णका मुझे अतिशय स्मरण हो रहा है ॥५॥

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश—केशवः १०१ मणिमय-मकर मनोहर-कुण्डल-मण्डित-गण्डमुदारं। पीतवसन मनुगत-मुनि-मनुज-सुरासुरवर-परिवारं— रासे हरिमिह ... ... ॥६॥ अन्वय—सखि, मणिमय-मकर-मनोहर-कुण्डल-मण्डित-गण्डं (मणिमयाभ्यां मणिप्रचुराभ्यां मकराभ्यां मकराकार-मनोहर- कुण्डलाभ्यां मण्डितौ शोभितौ गण्डौ यस्य तम्) [तथा] अनुगत-मुनि-मनुज-सुरासुर-वर-परिवारम् (अनुगताः सौन्दर्यादिना आकृष्टाः मुनि-मनुज-सुरासुराणां वराः श्रेष्ठाः परिवाराः परिग्रहाः येन तादृशम्) उदारं (महान्तम्) पीत-वसनम् (पीताम्बरम्) [हरिं मम मनः रासे विहितविलास-मित्यादि ॥६॥ अनुवाद—जिनके कपोल-युगल मणिमय मनोहर मकराकृति कुण्डलोंके द्वारा सुशोभित हो रहे हैं, जिन्होंने कामिनी जनोंके मनोभिलाषको पूर्ण करनेमें महान उदार भाव अर्थात् दक्षिण नायकत्वको धारण किया है, जिन पीताम्बरधारी श्रीकृष्णने अपनी माधुरीका विस्तारकर सुर, असुर, मुनि, मनुष्य आदि अपने श्रेष्ठ परिवारको प्रेमरसमें सराबोर कर दिया है, उन श्रीकृष्णका मुझे बरबस ही स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— युग्म कपोल रत्न-मणि मण्डित, मकर मनोहर कुण्डल लम्बित सुन्दर पीत वसन परिवेष्टित, मुनि, सुर, असुर, पद्म-पद पूजित हरि मूरतका ध्यान, हो आता अनजान॥ बालबोधिनी—श्रीकृष्णके कानोंमें लटकनेवाले कुण्डल मकराकृतिके हैं, जिनसे उनके कपोलद्वय समलंकृत हैं। दक्षिण नायक हैं, पीताम्बर धारण करते हैं। नारदादि मुनि, भीष्मादि मनुष्य, प्रह्लादादि असुर तथा इन्द्रादि देवगण उनका श्रेष्ठ परिवार है। ऐसे श्रीकृष्णका मुझे स्मरण हो रहा है॥६॥

१०२ श्रीगीतगोविन्दम् विशद-कदम्बतले मिलितं कलि-कलुषभयं शमयन्तं मामपि किमपि तरङ्गदनङ्गदृशा मनसा रमयन्तं— रासे हरिमिह ... ... ॥७॥ अन्वय—विशद-कदम्बतले (पुष्पित-कदम्बतरुतले) मिलितं (मया सह सङ्गतं) कलि-कलुषभयं शमयन्तं (कलिः कलहः कलुषं मालिन्यः प्रेमकलहोद्भूतं चित्तमालिन्यं तदपनयन्तं चाटुभिरितिशेषः; यद्वा कलिजनित-पाप-तापभयं निवारयन्तं) किमपि (अनिर्वचनीयं यथा तथा) तरङ्गदनङ्ग-दृशा (तरङ्ग इव आचरन् अनङ्गो यत्र तया दृशा दृष्ट्या) मामपि (मामेव) रमयन्तं (मया सह रतिं ध्यायन्तमित्यर्थः) [रासे विहित- विलासमित्यादि] ॥७॥ अनुवाद—विशाल एवं सुविकसित कदम्ब वृक्षके नीचे समागत होकर मेरी अपेक्षामें प्रतीक्षा करनेवाले विविध प्रकारके आश्वासनयुक्त चाटुवचनोंके द्वारा विच्छेद भयको सम्यक् रूपसे अपनयन (दूरीभूत) करनेवाले प्रबलतर अनङ्ग रसके द्वारा चञ्चल नेत्रोंसे तथा नितान्त स्पृहायुक्त मानसमें मेरे साथ मन-ही-मन रमण करनेवाले श्रीकृष्णका स्मरण कर मेरा हृदय विकल हो रहा है। पद्यानुवाद— विशद कदम्बतले उपवेष्टित, जन मनसे कलि भय अपसारित निज अपाङ्गसे मम मन पूरित, सुन्दर मोहन कवि जय वर्णित हरि मूरतका ध्यान, हो आता अनजान ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा कहती हैं—हे सखि! वे अतिशय उत्कण्ठाके साथ इस विशाल कदम्बके नीचे सङ्केत स्थानपर मेरी प्रतीक्षा करते रहते हैं। प्रणय कलह होनेपर विच्छेदके भयसे चाटु वाक्यों द्वारा मनाते रहते हैं। इस तरह वे मुझे

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः १०३ अपनी सरस दृष्टि तथा सानुराग मनसे आनन्दित करते रहते हैं। ‘मामपि’—मुझे भी आनन्दित करते रहते हैं, अर्थात् प्रियतम श्रीकृष्णकी चेष्टाएँ इतनी मनोज्ञ हैं कि उनको देखकर मैं भी हर्ष-प्रकर्षका अनुभव करती हूँ॥७॥ श्रीजयदेव-भणितमतिसुन्दर-मोहन-मधुरिपु-रूपं। हरि-चरण-स्मरणं संप्रति पुण्यवतामनुरूपं॥ रासे हरिमिह ... ... ॥८॥ अन्वय—अति-सुन्दर-मोहन-मधु-रिपु-रूपं (अतिशयेन सुन्दरं मोहनं मनोहरं मधुरिपोः श्रीकृष्णस्य रूपं यत्र तादृशं) श्रीजयदेव-भणितं (श्रीजयदेवोक्तं) सम्प्रति (अधुना) पुण्यवतां (सुकृतिशालिनां भगवद्भक्तानां साधूनां) हरि-चरण-स्मरणं प्रति अनुरूपं (योग्यं तादृशभावेन आस्वादनीयमिति भावः) [भवतु इति शेषः] [रासे विहितविलासमित्यादि] ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कविने सम्प्रति हरिचरण स्मृतिरूप इस काव्यको भगवद्-भक्तिमान पुण्यशाली पुरुषोंके लिए प्रस्तुत किया है, जिसमें श्रीकृष्णके अतिशय सुन्दर मोहन रूपका वर्णन हुआ है। इसका आस्वादन मुख्यरसके आश्रयमें रहकर ही किया जाना चाहिये। बालबोधिनी—पञ्चम प्रबन्धका उपसंहार करते हुए श्रीजयदेव कविने कहा है कि इस प्रबन्धका प्रणयन प्रेमाभक्तियुक्त पुण्यवान पुरुषोंके द्वारा श्रीकृष्णके श्रीचरणकमलोंका स्मरण करनेके लिए किया गया है। ‘चरण’ का अर्थ रासलीला आदिसे है, जो भक्तोंके लिए आज भी अनुकूल है। यह अतीव सुन्दर लीला है और वही श्रीकृष्णके श्रीचरणकमलोंके स्मरणका साधन है, जिसे श्रीराधा कभी भुला नहीं पाती। इस अष्टपदी प्रबन्धमें लय छन्द है। जिसका लक्षण है—‘मुनिर्यगणैर्लयमामन्नन्ति’। इस पाँचवे प्रबन्धका नाम है ‘मधुरिपुरत्नकण्ठिका’।

१०४ श्रीगीतगोविन्दम् गणयति गुणग्रामं भ्रामं भ्रमादपि नेहते वहति च परितोषं दोषं विमुञ्चति दूरतः। युवतिषु वलत्तृष्णे कृष्णे विहारिणि मां विना पुनरपि मनो वामं कामं करोति करोमि किम् ॥१॥ इति श्रीगीतगोविन्दे पञ्चमः सन्दर्भः। अन्वय—[ननु श्रीकृष्णस्त्वां विहाय अन्याभिश्चेत् विहरति तर्हि तं किमिति स्मरसीति स्वाभिप्रायं वक्ष्यमाणं सखीं प्रत्याह]—सखि, युवतिषु (गोपाङ्गनासु) वलत्तृष्णे (वलन्ती प्रस्फुरन्ती तृष्णा रमणाकाङ्क्षा यस्य तादृशे) [अतएव मां बिना विहारिणि (मां विहाय अन्यया सह रममाणेऽपीति भावः) कृष्णे [मम] वामं (प्रतिकूलम् अवाध्यमिति यावत्) मनः पुनरपि कामं (अभिलाषं) करोति, गुणग्रामं (श्रीहरेः गुणसमूहं) गणयति (विचारयति); भ्रमादपि भ्रामं (विस्मरणं) न ईहते (चेष्टते; न कथमपि विस्मरतीत्यर्थः); परितोषं (तृप्तिं) [तत्स्मरणेन इति शेषः] वहति; [तथा] दोषं (अवज्ञाजनितमपराधं) दूरतः मुञ्चति (परिहरति, न गणयतीत्यर्थः); किं करोमि [नास्त्यन्या मे गतिरिति भावः] ॥१॥ अनुवाद—“श्रीकृष्णने तुम्हें प्रत्याख्यान किया है, फिर भी तुम क्यों उनके प्रेममें व्याकुल हो रही हो”—प्रियसखिके द्वारा इस प्रकार भर्त्सना किये जानेपर श्रीराधा कहने लगी—सखि ! श्रीकृष्ण मुझे परित्यागकर दूसरी-दूसरी युवतियोंके साथ अतिशय अनुरागके साथ विहार कर रहे हैं, यह देखकर उनके प्रति अनुराग दिखाना व्यर्थ है, यह मैं जानती हूँ, फिर भी मैं क्या करूँ, उनके प्रति मेरी प्रबल आसक्ति किसी तरह से दूर नहीं होती है, मैं तो उनके गुणोंकी गणना ही करती रहती हूँ, अपने उत्कर्षका अनुभवकर आनन्दमें उन्मत्त हो जाती हूँ, भ्रमसे भी मुझे उनके प्रति क्रोध नहीं होता, उनके दोषोंको देखे बिना ही सन्तोषका अनुभव करती