गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— राधा बोल उठी मनकी लख हरि गोपीजनकी क्रीड़ा निशिदिन वृन्दावनकी अलिकुल-गुञ्जित लता-कुञ्जमें छिपकर जीवन-धनकी। लीलासे ईर्षाहित होकर भूली सुध-बुध तनकी राधा बोल उठी मनकी ॥१॥ बालबोधिनी—इस द्वितीय सर्गका नाम अक्लेश-केशव है। तात्पर्य यह है कि स्वयं-भगवान् रसिक-शेखर श्रीकृष्ण सदैव क्लेशरहित हैं। उनमें क्लेशका संक्लेश मात्र भी नहीं है। भगवान्के दो असाधारण चिह्न हैं— १. अखिलहेयप्रत्यनिकत्त्व, अर्थात् भगवान्से किसी प्रकारके क्लेश-कर्म-विपाक आदि प्राकृतिक दोषोंका सम्पर्क नहीं होता है। वे सभी दोषोंके प्रत्यनीक हैं अर्थात् प्रबल शत्रु हैं। योगसूत्रकारने भी साधनपादमें कहा है— क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः। अर्थात् क्लेश कर्म, उनके परिणाम तथा वासनादि दोषोंके सम्पर्कसे रहित पुरुषविशेषको ईश्वर शब्दसे अभिहित किया जाता है। २. अखिल कल्याण गुणाकरत्व—श्रीकृष्ण सम्पूर्ण संसारका कल्याण करनेवाले अप्राकृत सद्गुणोंके आकर हैं। इन्हीं अर्थोंके कारण इस सर्गका नाम अक्लेश-केशव है। मानवती श्रीराधा सखीके समझाये जानेपर श्रीकृष्णके मदन-महोत्सवमें सम्मिलित हो गयीं। इस मदन-उत्सवमें श्रीकृष्ण सभी सखियोंके प्रति समान स्नेह रखते हुए विहार कर रहे थे। जब कि श्रीराधाको यह गर्व था कि मैं उनकी सर्वश्रेष्ठा वल्लभा हूँ, नित्य सहचरी हूँ, परन्तु आज अपने प्रति विशिष्ट स्नेह प्रदर्शित न होनेसे श्रीराधा प्रणय-कोपके