भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 125

द्वितीयः सर्गः-अक्लेश-केशवः ९३ आवेशमें अन्यत्र एक कुञ्जमें चली आयीं और छिपकर बैठ गयीं। ईर्ष्याकषायिता श्रीराधाको वहाँ भी कहीं शान्ति नहीं मिली। इस लताकुञ्जके शिखरपर पुष्पोंमें मँडराता हुआ अलिवृन्द गुञ्जार कर रहा था। उस समय श्रीराधा अपनी मानकी वेदनासे पीड़ित होकर अपनी सखीसे उन रहस्यात्मक बातोंको कहने लगी, जिन्हें किसीके समक्ष कहा नहीं जाना चाहिए। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छन्द है। हरिणी छन्दका लक्षण है—‘रसयुग हयैः न्सौ म्नौ स्लौ गो यदा हरिणी।’ नायिका प्रौढ़ा है। रतिभावके उद्रेकातिशयके कारण रसवदलङ्कार तथा अनुप्रास अलङ्कार हैं। अपि-सोत्कर्ष भावमयी राधा कुछ न बोल सकनेकी स्थितिमें थीं, रहस्यमयी बातें बतलाने वाली नहीं थीं, यह ‘अपि’ शब्दके द्वारा घोषित है। अतः ‘अपि’ शब्द चमत्कारातिशय युक्त है। गुर्ज्जरी रागेण यति तालेन गीयते ॥ प्रबन्ध ५॥ प्रस्तुत श्लोक पञ्चम प्रबन्धकी पुष्पिका रूप है। दूसरे श्लोकसे इसका समुचित प्रारम्भ है। यह प्रबन्ध गुर्ज्जरी-राग तथा यति-तालसे गाया जाता है॥१॥ गीतम् ॥५॥ गुर्ज्जरीराग यतितालाभ्यां गीयते सञ्चरदधर-सुधा-मधुर-ध्वनि-मुखरित-मोहन-वंशं बलित-दृगञ्चल-चञ्चल-मौलि-कपोल-विलोल-वतंसम्। रासे हरिमिह विहित-विलासं स्मरति मनो मम कृत-परिहासम् ॥१॥ध्रुवम्॥ अन्वय-सखि, सञ्चरदधर-सुधा मधुर-ध्वनि-मुखरित- मोहन-वंशं (सञ्चरन्ती उद्गच्छन्ता अधरसुधा यत्र तेन