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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

द्वितीयः सर्गः-अक्लेश-केशवः ९३ आवेशमें अन्यत्र एक कुञ्जमें चली आयीं और छिपकर बैठ गयीं। ईर्ष्याकषायिता श्रीराधाको वहाँ भी कहीं शान्ति नहीं मिली। इस लताकुञ्जके शिखरपर पुष्पोंमें मँडराता हुआ अलिवृन्द गुञ्जार कर रहा था। उस समय श्रीराधा अपनी मानकी वेदनासे पीड़ित होकर अपनी सखीसे उन रहस्यात्मक बातोंको कहने लगी, जिन्हें किसीके समक्ष कहा नहीं जाना चाहिए। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छन्द है। हरिणी छन्दका लक्षण है—‘रसयुग हयैः न्सौ म्नौ स्लौ गो यदा हरिणी।’ नायिका प्रौढ़ा है। रतिभावके उद्रेकातिशयके कारण रसवदलङ्कार तथा अनुप्रास अलङ्कार हैं। अपि-सोत्कर्ष भावमयी राधा कुछ न बोल सकनेकी स्थितिमें थीं, रहस्यमयी बातें बतलाने वाली नहीं थीं, यह ‘अपि’ शब्दके द्वारा घोषित है। अतः ‘अपि’ शब्द चमत्कारातिशय युक्त है। गुर्ज्जरी रागेण यति तालेन गीयते ॥ प्रबन्ध ५॥ प्रस्तुत श्लोक पञ्चम प्रबन्धकी पुष्पिका रूप है। दूसरे श्लोकसे इसका समुचित प्रारम्भ है। यह प्रबन्ध गुर्ज्जरी-राग तथा यति-तालसे गाया जाता है॥१॥ गीतम् ॥५॥ गुर्ज्जरीराग यतितालाभ्यां गीयते सञ्चरदधर-सुधा-मधुर-ध्वनि-मुखरित-मोहन-वंशं बलित-दृगञ्चल-चञ्चल-मौलि-कपोल-विलोल-वतंसम्। रासे हरिमिह विहित-विलासं स्मरति मनो मम कृत-परिहासम् ॥१॥ध्रुवम्॥ अन्वय-सखि, सञ्चरदधर-सुधा मधुर-ध्वनि-मुखरित- मोहन-वंशं (सञ्चरन्ती उद्गच्छन्ता अधरसुधा यत्र तेन

“हरि-मूरतका ध्यान, हो आता अनजान”

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः ९५ मधुरेण ध्वनिना मुखरितः शब्दितः मोहनः मनोमोहकरः वंशः वेणु येन तादृशं) वलित-दृगञ्चल-चञ्चल-मौलि-कपोल- विलोल-वतंसं (वलितेन इतस्ततः प्रचरता दृगञ्चलेन दृशोः नेत्रयोः अञ्चलं चक्षुःप्रान्तभागः तेन कटाक्षेणेत्यर्थः योऽसौ चञ्चलमौलिः कम्पितशिरोभूषणं तेन कपोलयोः गण्डयोः विलोलौ चञ्चलौ वतंसौ मणिकुण्डले यस्य तादृशं) इह रासे (शारदीय-रासलीलायां) विहितविलासं (विहितः कृतः विलासः हावभावो येन तादृशं) [तथा] कृतपरिहासं (कृतः परिहासो येन तादृशं) हरिं मम मनः स्मरति ॥१॥ अनुवाद—सखि, कैसी आश्चर्यकी बात है कि इस शारदीय रासोत्सवमें श्रीकृष्ण मुझे छोड़कर अन्य कामिनियोंके साथ कौतुक आमोदमें विलास कर रहे हैं। फिर भी मेरा मन उनका पुनः पुनः स्मरण कर रहा है। वे सञ्चरणशील अपने मुखामृतको अपने करकमलमें स्थित वेणुमें भरकर फुत्कारके साथ सुमधुर मुखर स्वरोंमें बजा रहे हैं, अपाङ्ग-भङ्गीके द्वारा अपने मणिमय शिरोभूषणको चञ्चलता प्रदान कर रहे हैं, उनके कानोंके आभूषण कपोल देशमें दोलायमान हो रहे हैं, उनके इस श्याम रूपका, उनके हास-परिहासका मुझे बारम्बार स्मरण हो रहा है॥१॥ पद्यानुवाद— हे सखि! कम्पित अधर मधु-ध्वनित वेणु-स्वर चलित दृगञ्चल चञ्चल शिर, भर— गति कपोल द्वय लोल वलय वर रास विलास हास कृत मनहर हरि मूरतका ध्यान, हो आता अनजान ॥ बालबोधिनी—सखिने कहा—प्रिय राधिके! जब श्रीकृष्णने तुम्हारा प्रत्याख्यान किया है, तब तुम क्यों उनके प्रेममें इतनी अधीर हो रही हो?

९६ श्रीगीतगोविन्दम् सखीके द्वारा अपनी भर्त्सना सुनकर श्रीराधा अति दीन भावसे कहने लगी—सखि ! तुम ठीक कह रही हो, श्रीकृष्ण मेरा परित्याग कर दूसरी रमणियोंके साथ अतिशय अनुरागयुक्त होकर विहार कर रहे हैं, तब उनके प्रति मेरा अनुराग प्रकाशित होना व्यर्थ ही है, पर मैं क्या करूँ? मुझे उनकी नर्मकेलिका अनुभव है, उनके विलासोंका स्मरण हो रहा है, सखि ! ये वे ही केलिवन हैं, जहाँ हमने केलिसुख प्राप्त किया था, उनके प्रति मेरी प्रबल आसक्ति है, मुझसे उनका त्याग नहीं होता। सब समय उनके गुणोंका ही स्मरण होता रहता है। मेरे हृदयमें उनके दोषका लेशमात्र भी भाव नहीं उठता, मुझे सदैव सन्तुष्टि रहती है। जब श्यामसुन्दर रास-रजनीमें व्रजाङ्गनाओंके साथ हास-परिहास करते हैं तब—सञ्चरदधर सुधा मधुर ध्वनि मुखरित विग्रहम्—सञ्चरन्त्या अधरसुधया मधुरो ध्वनि यत्र तद् यथा स्याद् तथा मुखरिता मोहिनी वंशी येन तम्। वे जब अधरसुधासे संक्रान्त मधुर-ध्वनि करनेवाली उस वंशीको बजाते हैं, जिसका मोहनकारित्व प्रख्यात है, उस समय मेरा मन अस्थिर हो जाता है, मैं अपना धैर्य खो बैठती हूँ। उनके अङ्गोंका सौन्दर्य, चञ्चल शिरोभूषण, दोलायमान कर्णकुण्डल तथा विशेषकर गोप-युवतियोंका आलिङ्गन चुम्बन स्मरण करते ही मैं सुधबुध खो बैठती हूँ—सखि मैं क्या करूँ? ॥१॥ चन्द्रक-चारु-मयूर-शिखण्डक-मण्डल-वलयित-केशं। प्रचुर-पुरन्दर-धनुरनुरञ्जित-मेदुर-मुदिर-सुवेशं ॥ रासे हरिमिह ... ... ॥२॥ अन्वय—सखि, चन्द्रक-चारु-मयूर-शिखण्डक-मण्डल- वलयितकेशं (चन्द्रकेण अर्द्धचन्द्राकारेण चारूणां मयूरशिखण्डकानां मयूरपुच्छानां मण्डलेन वलयितः वेष्टितः केशो यस्य तादृशं) [अतएव] प्रचुरपुरन्दर-धनुरनुरञ्जित-चित्रितः मेदुरः स्निग्धो यो

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः ९७ मुदिरो नवजलधरः तद्वत् सुशोभनो वेशो यस्य तादृशं) [रासे विहितविलासमित्यादि] ॥२॥ अनुवाद—अर्द्धचन्द्राकारसे सुशोभित अति मनोहर मयूर- पिच्छसे वेष्टित केशवाले तथा प्रचुर मात्रामें इन्द्रधनुषोंसे अनुरञ्जित नवीन जलधर पटलके समान शोभा धारण करनेवाले श्रीकृष्णका मुझे अधिक स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— चन्द्रक चारु मयूर शिखण्डित कोमल केश वलय आमण्डित। प्रचुर पुरन्दर धनु अनुरञ्जित सघन मेघ-छवि वपु बहु सज्जित॥ बालबोधिनी—मोर पंखके अन्तिम भागमें बने हुए वृत्ताकार मण्डलको 'चन्द्रक' कहा जाता है। चन्द्रमाके समान यह भी आह्लाददायक होता है। इन्हीं मधुर पिच्छोंसे श्रीकृष्णका केशपाश वलयित हो रहा है। उससे उनका श्यामवर्ण ऐसे प्रतीत हो रहा है, मानो सजल मेघ अनेक इन्द्रधनुषोंसे सुसज्जित हो, उन्हींके कमनीय दिव्य विग्रहका मुझे बारबार स्मरण हो रहा है॥२॥ गोप-कदम्ब-नितम्बवती-मुख-चुम्बन-लम्भित-लोभं। बन्धुजीव-मधुराधर-पल्लवमुल्लसित-स्मित-शोभम्॥ रासे हरिमिह ... ... ॥३॥ अन्वय—सखि, गोप-कदम्ब-नितम्बवती-मुखचुम्बन-लम्भित- लोभम् (गोप-कदम्बस्य गोपकुलस्य या नितम्बवत्यः नितम्बिन्यः तरुण्यः तासां मुख-चुम्बने लम्भितः प्रापितः लोभः यस्य तं) [तथा] बन्धुजीव-मधुराधर-पल्लवम् (बन्धुक-पुष्पवत् अरुणः मधुरः मनोहरश्च अधरपल्लवो यस्य तादृशम्) [तथा] उल्लसित-स्मित-शोभम् (उल्लासिता परिवर्द्धिता स्मितेन मृदुमधुरहासेन शोभा यस्य तथोक्तम्) [मम मनः रासे विहितविलासमित्यादि] ॥३॥

९८ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—गोपललनाओंके मुखकमलका चुम्बन करनेकी अभिलाषासे इस अनङ्ग उत्सवमें अपने मुखको झुकाये हुए, उनका सुकुमार अधर पल्लव बन्धुक कुसुमवत् मनोहारी अरुण वर्णीय हो रहा है, स्फूत्तियुक्त मन्द-मुस्कानकी अपूर्व शोभा उनके सुन्दर मुखमण्डलमें विस्तार प्राप्त कर रही है, ऐसे उन श्रीकृष्णका मुझे अति स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— गोप वधू चुम्बन-रस लोभित अधर वधूक स्मित मधु शोभित। पुलक युवति-भुज अति आलिङ्गित पद-कर मणि-द्युति निशि-तमचूर्णित ॥ हरि मूरतका ध्यान हो आता अनजान ॥ बालबोधिनी—गोपवधुओंके मुख चुम्बनका लोभ धारण करनेवाले श्रीकृष्णकी मुझे याद आ रही है। जिस समय वे रहस्यमयी कुञ्जक्रीड़ामें निमग्न रहते हैं, उस समय उन गोपियोंके मुखका बारंबार चुम्बन करनेका लोभ बढ़ता जाता है। श्रीकृष्णके बन्धुक अर्थात् दुपहरियाके पुष्पके समान लाल-लाल होंठका मुझे स्मरण आता है। सखि ! मुस्करानेपर तो उनकी शोभा और भी बढ़ जाती है। विपुल-पुलक-भुज-पल्लव-वलयित-वल्लव-युवति-सहस्रं। कर-चरणोरसि-मणिगण-भूषण-किरण-विभिन्न-तमिस्रं— रासे हरिमिह ... ... ॥४॥ अन्वय—सखि, विपुल-पुलक-भुजपल्लव-वलयित- वल्लव-युवति- सहस्रं (विपुलाः अगाधाः पुलका रोमाञ्चा ययोस्ताभ्यां भुजपल्लवाभ्यां पल्लव-पेलव-भुजाभ्यां वलयितं परिवेष्टितम् आलिङ्गितमित्यर्थः वल्लव-युवतीनां गोप-तरुणीनां सहस्रं येन तम्; एकदानेकालिङ्गनात् नैकनिष्ठप्रेमाणमित्यर्थः);

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः ९९ [तथा] करचरणोरसि (हस्तपदवक्षसि) मणिगण-भूषण-किरण- विभिन्न-तमिस्रं (मणिगणभूषणानां मणिमयालङ्काराणां किरणेन विभिन्नं निराकृतं तमिस्रम् अन्धकारो येन तादृशम्) [मम मनः रासे विहितविलासमित्यादि] ॥४॥ अनुवाद—अतिशय रोमाञ्चसे परिप्लुत होकर अपने सुकोमल भुज-पल्लवके द्वारा हजारों-हजारों गोप-युवतियोंको समालिङ्गित करनेवाले एवं कर, चरण और वक्षस्थलमें ग्रथित मणिमय आभूषणोंकी किरणोंसे दिशाओंको आलोकित करनेवाले श्रीकृष्णका मुझे स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— पुलक युवती भुज अति आलिङ्गित पद कर मणि द्युति निशि तम चूर्णित॥ हरि मूरतका ध्यान हो आता अनजान॥ बालबोधिनी—इस समय श्यामसुन्दरके उन कोमल-कोमल पल्लवोंके समान हस्तोंका मुझे स्मरण हो रहा है, जो प्रभूत रोमाञ्चसे युक्त हैं और जिनसे वे सहस्र गोपियोंको परिवेष्टित कर उनका समालिङ्गन करते हैं। उनके कर, चरण तथा हृदयस्थलके आभूषणोंके सौन्दर्यकी किरणोंसे सम्पूर्ण अन्धकार विदूरित हो गया है॥४॥ जलद-पटल-बलदिन्दु-विनिन्दक-चन्दन-तिलक-ललाटं। पीन-पयोधर-परिसर-मर्दन-निर्दय-हृदय-कवाटम्— रासे हरिमिह ... ... ॥५ ॥ अन्वय—सखि, जलद-पटल-बलदिन्दु-विनिन्दक-चन्दन- तिलक-ललाटं (जलद-पटलेन मेघसमूहेन बलन् परिस्फुरन् यः इन्दुः चन्द्रः तस्य विनिन्दकः तिरस्कारकः चन्दनतिलकः ललाटे यस्य तादृशं) [तथा] पीन-पयोधर-परिसर-मर्दन-निर्दय-

१०० श्रीगीतगोविन्दम् हृदय-कवाटम् (पीनयोः स्थूलयोः पयोधरयोः स्तनयोः यः परिसरः परिणाहः विस्तार इति यावत् तस्य मर्दनाय निर्दयः हृदयकवाटः विशालं वक्षः यस्य तादृशम्; अत्र हृदयस्य दृढ़त्व-विस्तीर्णत्वाभ्यां कवाटत्वेन निरूपणम्) [मम मनः रासे विहित-विलास-मित्यादि] ॥५॥ अनुवाद—अपने ललाटमें मनोहर चन्दनके तिलकको धारणकर नवीन जलद मण्डलमें विद्यमान चञ्चल चन्द्रमाकी महती शोभाको पराभूतकर अनिर्वचनीय सुषमाको धारण करनेवाले एवं वर युवतियोंके पीन पयोधरोंके अमूल्य प्रान्त भागको अपने सुविशाल सुदृढ़ वक्षःस्थलसे निपीडित करनेमें सतत अनुरक्त कवाटमय (किवाड़ स्वरूप) निर्दय-हृदय श्रीकृष्णका मुझे बार-बार स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— चन्दन तिलक ललाट विचर्चित, जलद पटलमें विधु सम दर्शित। युवती पीन पयोधर मर्दित, अपनी निर्दयता पर हर्षित। हरि मूरतका ध्यान, हो आता अनजान ॥ बालबोधिनी—सजल बादलोंके बीच चञ्चल चन्द्रमाकी शोभा अत्यधिक प्रेक्षणीय होती है। श्रीकृष्णके श्यामवर्णका विस्तृत ललाट-पटल ही सजल मेघतुल्य है और उसपर श्वेतवर्णका चन्दन तिलक आह्लादप्रदायी चन्द्रमाकी छटाओंका भी तिरस्कार करनेवाला है। रतिकालमें युवतियोंके कोमल स्तनोंको अपने विशाल वक्षःस्थलसे बड़ी ही निर्दयतापूर्वक मर्दन करनेवाले श्रीकृष्णका मुझे अतिशय स्मरण हो रहा है ॥५॥

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश—केशवः १०१ मणिमय-मकर मनोहर-कुण्डल-मण्डित-गण्डमुदारं। पीतवसन मनुगत-मुनि-मनुज-सुरासुरवर-परिवारं— रासे हरिमिह ... ... ॥६॥ अन्वय—सखि, मणिमय-मकर-मनोहर-कुण्डल-मण्डित-गण्डं (मणिमयाभ्यां मणिप्रचुराभ्यां मकराभ्यां मकराकार-मनोहर- कुण्डलाभ्यां मण्डितौ शोभितौ गण्डौ यस्य तम्) [तथा] अनुगत-मुनि-मनुज-सुरासुर-वर-परिवारम् (अनुगताः सौन्दर्यादिना आकृष्टाः मुनि-मनुज-सुरासुराणां वराः श्रेष्ठाः परिवाराः परिग्रहाः येन तादृशम्) उदारं (महान्तम्) पीत-वसनम् (पीताम्बरम्) [हरिं मम मनः रासे विहितविलास-मित्यादि ॥६॥ अनुवाद—जिनके कपोल-युगल मणिमय मनोहर मकराकृति कुण्डलोंके द्वारा सुशोभित हो रहे हैं, जिन्होंने कामिनी जनोंके मनोभिलाषको पूर्ण करनेमें महान उदार भाव अर्थात् दक्षिण नायकत्वको धारण किया है, जिन पीताम्बरधारी श्रीकृष्णने अपनी माधुरीका विस्तारकर सुर, असुर, मुनि, मनुष्य आदि अपने श्रेष्ठ परिवारको प्रेमरसमें सराबोर कर दिया है, उन श्रीकृष्णका मुझे बरबस ही स्मरण हो रहा है। पद्यानुवाद— युग्म कपोल रत्न-मणि मण्डित, मकर मनोहर कुण्डल लम्बित सुन्दर पीत वसन परिवेष्टित, मुनि, सुर, असुर, पद्म-पद पूजित हरि मूरतका ध्यान, हो आता अनजान॥ बालबोधिनी—श्रीकृष्णके कानोंमें लटकनेवाले कुण्डल मकराकृतिके हैं, जिनसे उनके कपोलद्वय समलंकृत हैं। दक्षिण नायक हैं, पीताम्बर धारण करते हैं। नारदादि मुनि, भीष्मादि मनुष्य, प्रह्लादादि असुर तथा इन्द्रादि देवगण उनका श्रेष्ठ परिवार है। ऐसे श्रीकृष्णका मुझे स्मरण हो रहा है॥६॥

१०२ श्रीगीतगोविन्दम् विशद-कदम्बतले मिलितं कलि-कलुषभयं शमयन्तं मामपि किमपि तरङ्गदनङ्गदृशा मनसा रमयन्तं— रासे हरिमिह ... ... ॥७॥ अन्वय—विशद-कदम्बतले (पुष्पित-कदम्बतरुतले) मिलितं (मया सह सङ्गतं) कलि-कलुषभयं शमयन्तं (कलिः कलहः कलुषं मालिन्यः प्रेमकलहोद्भूतं चित्तमालिन्यं तदपनयन्तं चाटुभिरितिशेषः; यद्वा कलिजनित-पाप-तापभयं निवारयन्तं) किमपि (अनिर्वचनीयं यथा तथा) तरङ्गदनङ्ग-दृशा (तरङ्ग इव आचरन् अनङ्गो यत्र तया दृशा दृष्ट्या) मामपि (मामेव) रमयन्तं (मया सह रतिं ध्यायन्तमित्यर्थः) [रासे विहित- विलासमित्यादि] ॥७॥ अनुवाद—विशाल एवं सुविकसित कदम्ब वृक्षके नीचे समागत होकर मेरी अपेक्षामें प्रतीक्षा करनेवाले विविध प्रकारके आश्वासनयुक्त चाटुवचनोंके द्वारा विच्छेद भयको सम्यक् रूपसे अपनयन (दूरीभूत) करनेवाले प्रबलतर अनङ्ग रसके द्वारा चञ्चल नेत्रोंसे तथा नितान्त स्पृहायुक्त मानसमें मेरे साथ मन-ही-मन रमण करनेवाले श्रीकृष्णका स्मरण कर मेरा हृदय विकल हो रहा है। पद्यानुवाद— विशद कदम्बतले उपवेष्टित, जन मनसे कलि भय अपसारित निज अपाङ्गसे मम मन पूरित, सुन्दर मोहन कवि जय वर्णित हरि मूरतका ध्यान, हो आता अनजान ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा कहती हैं—हे सखि! वे अतिशय उत्कण्ठाके साथ इस विशाल कदम्बके नीचे सङ्केत स्थानपर मेरी प्रतीक्षा करते रहते हैं। प्रणय कलह होनेपर विच्छेदके भयसे चाटु वाक्यों द्वारा मनाते रहते हैं। इस तरह वे मुझे

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः १०३ अपनी सरस दृष्टि तथा सानुराग मनसे आनन्दित करते रहते हैं। ‘मामपि’—मुझे भी आनन्दित करते रहते हैं, अर्थात् प्रियतम श्रीकृष्णकी चेष्टाएँ इतनी मनोज्ञ हैं कि उनको देखकर मैं भी हर्ष-प्रकर्षका अनुभव करती हूँ॥७॥ श्रीजयदेव-भणितमतिसुन्दर-मोहन-मधुरिपु-रूपं। हरि-चरण-स्मरणं संप्रति पुण्यवतामनुरूपं॥ रासे हरिमिह ... ... ॥८॥ अन्वय—अति-सुन्दर-मोहन-मधु-रिपु-रूपं (अतिशयेन सुन्दरं मोहनं मनोहरं मधुरिपोः श्रीकृष्णस्य रूपं यत्र तादृशं) श्रीजयदेव-भणितं (श्रीजयदेवोक्तं) सम्प्रति (अधुना) पुण्यवतां (सुकृतिशालिनां भगवद्भक्तानां साधूनां) हरि-चरण-स्मरणं प्रति अनुरूपं (योग्यं तादृशभावेन आस्वादनीयमिति भावः) [भवतु इति शेषः] [रासे विहितविलासमित्यादि] ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कविने सम्प्रति हरिचरण स्मृतिरूप इस काव्यको भगवद्-भक्तिमान पुण्यशाली पुरुषोंके लिए प्रस्तुत किया है, जिसमें श्रीकृष्णके अतिशय सुन्दर मोहन रूपका वर्णन हुआ है। इसका आस्वादन मुख्यरसके आश्रयमें रहकर ही किया जाना चाहिये। बालबोधिनी—पञ्चम प्रबन्धका उपसंहार करते हुए श्रीजयदेव कविने कहा है कि इस प्रबन्धका प्रणयन प्रेमाभक्तियुक्त पुण्यवान पुरुषोंके द्वारा श्रीकृष्णके श्रीचरणकमलोंका स्मरण करनेके लिए किया गया है। ‘चरण’ का अर्थ रासलीला आदिसे है, जो भक्तोंके लिए आज भी अनुकूल है। यह अतीव सुन्दर लीला है और वही श्रीकृष्णके श्रीचरणकमलोंके स्मरणका साधन है, जिसे श्रीराधा कभी भुला नहीं पाती। इस अष्टपदी प्रबन्धमें लय छन्द है। जिसका लक्षण है—‘मुनिर्यगणैर्लयमामन्नन्ति’। इस पाँचवे प्रबन्धका नाम है ‘मधुरिपुरत्नकण्ठिका’।

१०४ श्रीगीतगोविन्दम् गणयति गुणग्रामं भ्रामं भ्रमादपि नेहते वहति च परितोषं दोषं विमुञ्चति दूरतः। युवतिषु वलत्तृष्णे कृष्णे विहारिणि मां विना पुनरपि मनो वामं कामं करोति करोमि किम् ॥१॥ इति श्रीगीतगोविन्दे पञ्चमः सन्दर्भः। अन्वय—[ननु श्रीकृष्णस्त्वां विहाय अन्याभिश्चेत् विहरति तर्हि तं किमिति स्मरसीति स्वाभिप्रायं वक्ष्यमाणं सखीं प्रत्याह]—सखि, युवतिषु (गोपाङ्गनासु) वलत्तृष्णे (वलन्ती प्रस्फुरन्ती तृष्णा रमणाकाङ्क्षा यस्य तादृशे) [अतएव मां बिना विहारिणि (मां विहाय अन्यया सह रममाणेऽपीति भावः) कृष्णे [मम] वामं (प्रतिकूलम् अवाध्यमिति यावत्) मनः पुनरपि कामं (अभिलाषं) करोति, गुणग्रामं (श्रीहरेः गुणसमूहं) गणयति (विचारयति); भ्रमादपि भ्रामं (विस्मरणं) न ईहते (चेष्टते; न कथमपि विस्मरतीत्यर्थः); परितोषं (तृप्तिं) [तत्स्मरणेन इति शेषः] वहति; [तथा] दोषं (अवज्ञाजनितमपराधं) दूरतः मुञ्चति (परिहरति, न गणयतीत्यर्थः); किं करोमि [नास्त्यन्या मे गतिरिति भावः] ॥१॥ अनुवाद—“श्रीकृष्णने तुम्हें प्रत्याख्यान किया है, फिर भी तुम क्यों उनके प्रेममें व्याकुल हो रही हो”—प्रियसखिके द्वारा इस प्रकार भर्त्सना किये जानेपर श्रीराधा कहने लगी—सखि ! श्रीकृष्ण मुझे परित्यागकर दूसरी-दूसरी युवतियोंके साथ अतिशय अनुरागके साथ विहार कर रहे हैं, यह देखकर उनके प्रति अनुराग दिखाना व्यर्थ है, यह मैं जानती हूँ, फिर भी मैं क्या करूँ, उनके प्रति मेरी प्रबल आसक्ति किसी तरह से दूर नहीं होती है, मैं तो उनके गुणोंकी गणना ही करती रहती हूँ, अपने उत्कर्षका अनुभवकर आनन्दमें उन्मत्त हो जाती हूँ, भ्रमसे भी मुझे उनके प्रति क्रोध नहीं होता, उनके दोषोंको देखे बिना ही सन्तोषका अनुभव करती

द्वितीयः सर्गः-अक्लेश-केशवः १०५ हूँ, उनकी बार-बार स्पृहा करती हूँ, सखि, वे मुझसे भुलाये नहीं जाते-मैं क्या करूँ? पद्यानुवाद- सपनोंमें सुधि बनकर आते। सखि वे भुला भुला कर भाते॥ निरगुणियाके गुण ही मनमें 'गुन-गुन' स्वर भर जाते। पर-रत होने पर भी मुझमें रति बनकर ढर जाते॥ सखि! वे भुला-भुला कर भाते। सपनोंमें सुधि बन कर आते॥ बालबोधिनी-षष्ठ प्रबन्धके प्रारम्भमें अपनी रहःवार्त्ताकी ओर अधिक विवृति करते हुए श्रीराधाजी कहती हैं-सखि! अन्य गोपियोंके साथ विहार करनेवाले उन श्रीकृष्णके प्रति मेरे मनने दाक्षिण्य भावको धारण किया है, मेरे न चाहने पर भी यह उनकी गुणावलीका स्मरण करता रहता है, उनको प्राप्त करनेकी कामना करता है। 'भ्रामं भ्रमादपि नेहते'-यहाँ 'भ्राम' शब्द क्रोधका वाचक है। मेरा मन भूलसे भी उनके प्रति क्रोध करना नहीं चाहता। उनकी 'परनायिकासक्ति', 'मदुपेक्षाकारिता' आदि दोषोंको देखना नहीं चाहता, पूर्णरूपेण सन्तुष्ट ही रहता है, मैं क्या करूँ? इस श्लोकमें श्रीराधा उत्कण्ठिता नायिकाके रूपमें प्रस्तुत है। उत्कण्ठिताका लक्षण है- उत्का भवति सा यस्या वासके नागतः प्रियः। तस्यानागमने हेतुं चिन्तयन्त्याकुला यथा॥ अर्थात् जिस नायिकाकी शय्यापर नायक नहीं आता है, वह अपने प्रियतमके नहीं आनेके कारणके विषयमें व्याकुल होकर सोचती रहती है-इसलिए उसे उत्कण्ठिता कहा जाता है। इस श्लोकमें हरिणी नामक छन्द, यमक नामक

१०६ श्रीगीतगोविन्दम् शब्दालङ्कार, संशय एवं दीपक नामक अर्थालङ्कार एवं क्रियौचित्य है। प्रस्तुत श्लोक षष्ठ प्रबन्धकी पुष्पिका मात्र है॥१॥ इति श्रीगीतगोविन्दे पञ्चमः सन्दर्भः। गीतम् ॥६॥ मालव गौड़ रागेण एक ताली तालेन च गीयते निभृत-निकुञ्ज-गृहं गतया निशि रहसि निलीय वसन्तं चकित-विलोकित-सकल-दिशा रति-रभस-भरेन हसन्तं ॥१॥ सखि हे केशि-मथनमुदारम्। रमय मया सह मदन-मनोरथ-भावितया सविकारम् ॥ध्रुवम्॥ अन्वय—सखि, निभृत-निकुञ्ज-गृहं गतया (निर्ज्जननिकुञ्ज- गृहं प्रस्थितया) [मया सह] निशि (रात्रौ) [तदलाभात् मम वैकल्यादि-दिदृक्षया] रहसि (एकान्ते) निलीय (आत्मानं संगोप्य) वसन्तं (तिष्ठन्तं) [केशिमथनम्.....]; [तथा] चकित-विलोकित- सकलदिशा (चकितं कृष्णं कुत्र निलीयते इति इति सशङ्कं यथा तथा विलोकिता दृष्टा सकला दिक् यया तादृश्या) [मया सह] रति-रभस-भरेण (रतौ यः रभसः औत्सुक्यं तस्य भरेण आतिशय्येन) हसन्तं (मद्वैकल्यं समीक्ष्येतिशेषः) [केशिमथनम् ....]; [तथाच] मदन-मनोरथ-भावितया (मदनेन प्रेम्णा यः मनोरथः अभिलाषः तेन भावितया युक्तया) [मया सह] सविकारम् (कामवशेन भावान्तरगतम्) उदारः (महान्तं मनोरथदातारमित्यर्थः) केशिमथनं रमय (रतिं कारय) ॥१॥ अनुवाद—मालव राग तथा एकताली तालके द्वारा यह गीत गाया जाता है, इसकी गति द्रुत है। हे सखि! वह केशिमथन श्रीकृष्ण, जो मदन-सन्तापका शान्तिविधान करनेमें कभी अनुदार नहीं होते और जिनका

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः १०७ मन मेरे प्रति अतिशय अनुरागके कारण विमोहित हुआ है, उनके साथ मेरा अनङ्ग विषयक मनोरथ कैसे सिद्ध होगा ? इसी भावनासे मैं व्याकुल हो रही हूँ। अब तुम उनके साथ मेरा मिलन सम्पादन करा दो। जो विहित पूर्व सङ्केतानुसार निशीथमें निभृत निकुञ्ज-गृहमें आकर, मैं उनके लिए कैसी उत्कण्ठिता हूँ अथवा उनके अदर्शनसे मुझमें कितनी तड़प है, इस कौतुक भावके साथ निकुञ्जवनके गोपनतम स्थानमें छिपकर देखनेवाले, वे कब आयेंगे ? ऐसी चिन्तामें निमग्ना जब थकित चकित नेत्रोंसे देखती थी, तब मेरी कातरताको देखकर शृङ्गार रसभरी हास्यसुधासे मुझको आनन्दित करनेवाले उदार तथा केशी नामक दैत्यका वध करनेवाले श्रीकृष्णका मुझ-कामकेलिकी इच्छासे परिपूर्ण अन्तःकरणवाली तथा रतिचेष्टाएँ करनेवालीके साथ अनङ्ग सम्बन्धीय मनोरथ सिद्ध कराओ ॥१॥ पद्यानुवाद— निशि अन्धियारी ऋतु वसन्त सखि ! घन निकुञ्ज वन नन्दन री। खोज रहे कबसे दिशि दिशिमें, थकित चकित दृग् खंजन री। ले चल वहीं थमे जिससे यह शाश्वत जी का क्रन्दन री। रति-रस-भीने जहाँ विहँसते छिपे खड़े नन्दनन्दन री ॥ बालबोधिनी—काम ज्वरसे सन्तप्ता हृदया श्रीराधा सखीसे कृष्णानुसन्धानकी अभिलाषा व्यक्त करती हैं। प्रस्तुत श्लोकमें उस प्रसङ्गका प्रकाश है, जिसमें उन्होंने अपने प्राणनाथको रतिक्रीड़ाके द्वारा सुख प्रदान किया था, यह गाढ़तम रहस्यपूर्ण लीला है। 'सखि ! रमय केशिमथनमुदारम् मया सह'—हे सखि ! केशिनिसूदनके साथ मेरा रमण कराओ। यहाँ तो श्रीराधाजीकी स्वाभिलाषा व्यक्त हुई है, अपने सुखकी वासना प्रकट हुई है, यह शुद्धभक्तिकी परिभाषाके विपरीत है। अतः ऐसी अभिलाषा क्यों ?

१०८ श्रीगीतगोविन्दम् इसके उत्तरमें कहते हैं कि गोपियोंने सबकुछ त्यागकर श्रीकृष्णसे प्रीति की है, उनमें अपने सुखका लेशमात्र भी नहीं है। पुनः जबतक परस्पर गाढ़ अनुराग न हो तबतक प्रेम परिस्फुट नहीं होता। प्रेमीके हृदयमें प्रेमकी वासना जाग्रत कराने हेतु प्रेयसीको स्वानुराग प्रदर्शित करना होता है, यह प्रेमका स्वभाव है। एकदेशीय प्रेममें रसाभास दोष आ जाता है। कहा गया है— अनुरागोऽनुरक्तायां रसावह इति स्थितिः। अभावेत्वनुरागस्य रसाभासं जगुर्बुधाः ॥ अर्थात् प्रीति जब अनुरक्ता स्त्रीमें होती है, तब वह रसवर्द्धनकारी होती है, परन्तु अनुरागके अभावमें तो रसाभास ही हो जाता है, ऐसा विद्वानोंका मत है। अतः यहाँ श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति अनुराग रस- वर्द्धनकारी है। सखि! कृष्णने सर्वप्रथम मेरे साथ रमणकर रतिसुखका अनुभव किया था, उनके विरहमें वही क्रीड़ा-सुख मुझे बार-बार स्मरण हो रहा है, जिससे मेरा चित्त व्याकुल हो रहा है। सम्प्रति मेरा हृदय 'मादनाख्य' मदन रसमें विभावित हो रहा है। मनोरथके प्रदाता केशीमथनका विरह मुझे असहनीय हो रहा है। सखि! उनसे मेरा रमण कराओ। इस प्रकार कविने श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति और श्रीकृष्णका श्रीराधाके प्रति अनुराग प्रदर्शित किया है। यदि मिलन प्रसङ्ग पहले दिखाया होता तो रसाभास दोष हो जाता। 'सविकारम्' पदके द्वारा श्रीराधा कह रही हैं—मुझमें काम विकार उत्पन्न हो गये हैं। कामजनित विकार मनमें उत्पन्न होनेपर नारियाँ व्याजान्तरसे अर्थात् बहाना बनाकर अपने प्रियतमको नाभि, स्तन आदि दिखाती हैं।

द्वितीयः सर्गः-अक्लेश-केशवः १०९ रसिक सर्वस्व नामक व्याख्यामें कहा गया है कि- नाभिमूलकुचोदरप्रकटनव्याजेन यद्योषितां साकांक्षं मुहुरीक्षणं स्खलितता नीवीनिबन्धस्य च। केशभ्रंसन संयमौ चकमितुर्मित्रादि सन्दर्शनैः सौभाग्यादि गुण प्रशस्ति कथनैः तत्सानुरागेङ्गितकम्॥ अर्थात् कामविकार उत्पन्न होनेपर स्त्रियाँ अनुरागपूर्ण चेष्टाएँ करती हैं। जैसे किसी माध्यमसे अपनी नाभि, स्तन तथा उदर दिखलाती हैं, अपने प्रेमीको सस्पृह दृष्टिसे बारम्बार देखती हैं, नीवी-बन्धन स्खलित हो जाता है, केशोंका भ्रंशन और संयमन होता है, प्रियतमके मित्रोंको सम्यक् प्रकारसे देखती हैं, उनके साथ अपने इष्टके सौभाग्य तथा गुणोंकी प्रशंसा करती हैं। इस प्रकारकी रतिपूर्ण चेष्टा करनेवाली मेरे साथ श्रीकृष्णको मिला दो। 'मदन मनोरथ भावितया' - मेरा अन्तःकरण कामजनित कामनाओंसे परिपूर्ण हो गया है। चेष्टा भवति पूत्रार्यो रत्युत्थानातिसक्तयोः । सम्भोगो विप्रलम्भश्च स शृङ्गारो द्विधामतः ॥ अर्थात् जहाँपर रतिकी उद्दीपन क्रियामें अत्यासक्त स्त्री तथा पुरुष शृङ्गारिक चेष्टाएँ किया करते हैं, वहाँ पर शृङ्गार दो प्रकारका होता है- सम्भोग तथा विप्रलम्भ। मुझ विरहिणीकी जैसी अभिलाषा श्रीकृष्णमें है, वैसी ही अभिलाषा वे मुझमें रखते हैं, सखि ! मुझे उनसे मिला दो। यहाँपर शृङ्गार रसकी सम्पूर्ति हुई है। श्रीराधाजी कह रही हैं-जब मैं निशीथ रात्रिमें निभृत निकुञ्जके अभिसार स्थानमें पहुँची, तब उस लतागृहमें श्रीश्यामसुन्दरको न देखकर बड़ी विकलतासे चतुर्दिग् देखने लगी, उस समय सघन-कुञ्जमें छिपकर निवास करनेवाले श्रीकृष्ण मेरी उत्कण्ठाको देखने लगे। जब मैं चकित नेत्रोंसे उनका अनुसन्धान करने लगी,

११० श्रीगीतगोविन्दम् तब वे रतिके उत्साहसे युक्त होकर समस्त दिशाओंको उल्लसितकर हँसते-हँसते मेरे सामने प्रकट हो गये। सखी री, उन्हीं कृष्णसे मुझे मिला दो॥१॥ प्रथम समागम लज्जितया पटु-चाटु-शतैरनुकूलम्। मृदु-मधुर-स्मित-भाषितया शिथिलीकृत-जघन-दुकूलम्— सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥२॥ अन्वय—प्रथम-समागम-लज्जितया (प्रथमः आद्यः यः समागमः सङ्गमः तेन लज्जितया जातलज्जया) [मया सह] पटुचाटुशतैः (पटूनि नारी-मनोहरण-निपुणानि-निपुणानि यानि चाटूनां प्रियवादनां शतानि तैः) अनुकूलं (अनुकूलयन्तं कृतापराधं मां क्षमस्वेति असकृत् कथयन्तं) [केशिमथनम्..], [तथा] मृदु-मधुर-स्मित-भाषितया (मृदु मधुरं यत् स्मितम् ईषद्धासः तेन सह भाषितं भाषणं यस्याः तथाभूतया) [मया सह] शिथिलीकृत-जघन-दुकूलं (शिथलीकृतं प्रभ्रंशितं जघनस्थं दुकूलं वसनं येन तादृशं) [केशिमथनम्.....] ॥२॥ अनुवाद—प्रथम मिलनमें स्वभावसुलभ लज्जासे अत्यन्त विमुग्ध देखकर मेरी लज्जाको दूर करनेके लिए उन्होंने अनेक प्रकारकी अनुनय-विनयरूप वचन परम्पराका प्रयोग किया। उनकी चाटुकारितापूर्ण बातोंसे विमुग्ध होकर मैं कोमल तथा मधुर मुस्कानके साथ उनसे वार्तालाप करने लगी, उस समय मेरे जघन-प्रदेशके वस्त्रको हटानेवाले विदग्ध श्रीकृष्णसे मुझे मिला दो॥१॥ पद्यानुवाद— प्रथम मिलनकी बेला आयी, चढ़ व्रीड़ाके स्यन्दन री। किन्तु मधुर बोलोंसे उनके, बनी स्वयं रस-रञ्जन री॥ बालबोधिनी—श्रीराधा सखीसे कहती हैं—यद्यपि प्रियतम श्रीकृष्णसे यह मेरा प्रथम मिलन नहीं था, फिर भी मैं उनके समक्ष ऐसी चेष्टा कर रही थी, जिस प्रकार कोई नायिका

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः १११ प्रथम समागमके कालमें अपने प्रियतमके समीप बहुत लज्जित होती है। श्रीकृष्ण उसी समय अपने चाटुवाक्योंसे मुझे अपने मनो can play role/अनुकूल बनाते जाते थे। मैं उनके उन मधुर वचनोंसे आह्लादित होती थी और मधुर मुस्कानके साथ उनसे मृदु भाषण करती थी। जैसे ही वे मुझे मनो can play role/मनोनुकूल देखते थे—तभी मेरी जंघाके वस्त्रोंको उन्मोचित कर देते थे। मैं उन्हीं श्रीकृष्णके साथ रमण करना चाहती हूँ—सखी! मुझे उनसे मिलाओ। प्रथम समागम—यह रति-रस नवनवायमान रूपमें ही नित्य अनुभूत होता है॥३॥ किशलय-शयन-निवेशितया चिरमुरसि ममैव शयानम्। कृत-परिरम्भण-चुम्बनया परिरभ्य कृताधरपानम्— सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥३॥ अन्वय—किशलय-शयन-निवेशितया पल्लव-शय्याशायितया) [मया सह] चिरं (बहुक्षणं) ममैव उरसि (वक्षसि) शयानं [केशिमथनम्.....] [तथा] कृत-परिरम्भण-चुम्बनया (कृतं परिरम्भणं चुम्बनञ्च यया) [मया सह] परिरभ्य [आलिङ्ग्य] कृताधरपानं (कृताधरचुम्बनं) [केशिमथनम्.....] ॥३॥ अनुवाद—मनोरम, नवीन एवं कोमल पल्लवोंकी शय्यापर जिन्होंने मुझे सुलाकर मेरे हृदयके ऊपर बड़े उल्लसित होकर सुखसे शयन किया था, जिनका मैंने प्रगाढ़रूपसे आलिङ्गन एवं चुम्बन किया था, पुनः जिन्होंने उसी प्रबलतर अनङ्ग रसमें निमज्जित होते हुए मेरा परिरम्भण कर मेरे अधरसुधाका बारम्बार पान किया था, सखि! उन्हीं प्राणप्रियतम श्रीकृष्णसे मुझे मिला दो ॥३॥ पद्यानुवाद— भूली वदन वसनकी सुधि सब, भूली पूजा-वन्दन री। मेरी शय्या किशलय उनकी, मेरे उरका स्पन्दन री॥

११२ श्रीगीतगोविन्दम् भूली किन अधरोंने किनका, लिया मधुर कब चुम्बन री। किन घड़ियोंमें हुआ हमारा, युग-युगका परिरम्भण री ॥ बालबोधिनी—सखि ! वे श्रीकृष्ण सङ्केत-स्थानमें मुझे कोमल पल्लवोंसे रचित शय्यापर सुला देते थे, इसके पश्चात् वे मेरे वक्षःस्थलपर चिरकालतक रमण करते थे। मैं उन श्रीकृष्णका आलिङ्गन कर उनका चुम्बन कर लेती थी। उस समय श्रीकृष्ण भी मुझे आलिङ्गन करके मेरे अधरसुधाका पान करते थे। सखी मुझे उन श्रीकृष्णसे मिलन करा दो। कृत परिरम्भण—इस प्रकारके आलिङ्गनको रसमञ्जरीकारने क्षीरनीर नामक आलिङ्गन बताया है और कथनकी पुष्टिके लिए पञ्चसायक नामक ग्रन्थका प्रमाण दिया है। रसिकप्रियाकारने इस प्रकारके आलिङ्गनको तिल-तण्डुल नामक आलिङ्गन माना है और अपने कोकशास्त्रका प्रमाण दिया है ॥३॥ अलस-निमीलित-लोचनया पुलकावलि-ललित-कपोलम् श्रमजल-सकल-कलेवरया वरमदन-मदादतिलोलम्— सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥४॥ अन्वय—अलस-निमीलित-लोचना (अलसेन सुरतश्रमजातेन आलस्येन निमीलिते मुकुलिते विलोचने यस्याः तादृश्या) [मया सह] पुलकावलि-ललित-कपोलं (पुलकानां रोमाञ्चानाम् आवल्या श्रेण्या चुम्बनादिति भावः ललितौ कपोलौ गण्डौ यस्य तादृशं) [केशिमथनम्.....] [तथा] श्रमजल-सकल-कलेवरया (श्रमजलं स्वेदाम्बु सकलकलेवरे यस्याः तादृश्या) [मया सह] वर-मदनमदात् (प्रवृद्ध-मनसिज-विकारात् हेतोः) अतिलोलं (मां प्रति नितरां साकाङ्क्षं) [केशिमथनम्.....] ॥४॥ अनुवाद—जिनके साथ मदन-आमोदमें अप्रत्याशित सुखसे मेरी आँखें अलसा गयीं, मुँद गयीं, उस विलास सुखसे श्रीकृष्णके कपोलयुगलने अत्यन्त मनोज्ञ तथा ललित रूप