गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 162, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ें१३० श्रीगीतगोविन्दम् हाय! वह समादृत न होनेके कारण क्रुद्धसी होकर यहाँसे चली गयी। पद्यानुवाद— रूठ गयी अपमानित हो लख मुझको गोपीजनमें। मैं अपराधी रोक न पाया उसको आकुल क्षणमें॥ बालबोधिनी—हरिहरीति—खेदे—श्रीकृष्ण अपने विषादकी अभिव्यक्ति कर रहे हैं। हाय! बड़े कष्टकी बात है कि प्रभूत गुणसम्पन्ना श्रीराधा मुझे ब्रजसुन्दरी समूहसे घिरा हुआ देखकर अपनेको अनादृत एवं उपेक्षित समझकर यहाँसे दूर चली गयीं। वे मेरे हृदयमें प्रेयसीके रूपमें विद्यमान हैं, मेरे प्रति उनके आन्तरिक प्रेमका कभी व्यतिक्रम भी नहीं हुआ है, फिर भी श्रीराधाके प्रति यह मेरा अपराध हो गया है। अपराधी होनेके कारण मैं भयभीत हो गया, उनसे अनुनय विनय भी नहीं कर सका, उन्हें मना भी न सका। वे कुपित-सी होकर यहाँसे चली गयीं। मुझे बड़ा विषाद हो रहा है॥१॥ किं करिष्यति किं वदिष्यति सा चिरं विरहेण। किं धनेन किं जनेन किं मम जीवितेन गृहेण— हरि हरि हतादरतया... ॥२॥ अन्वय—सा चिरं विरहेण (दीर्घेण मद्विच्छेदेन) [काववस्थां प्राप्य] किं करिष्यति (किमुपायं विधास्यति); [सखीं प्रति], किं वदिष्यति [इत्यहं न जाने]। [तया बिना] मम धनेन (गोधनेन) किं? जनेन (ब्रजजनेन) किं? गृहेण (गृहावस्थानेन) किं? [किं बहुना] जीवितेन [वा] किम्; [तां बिना सर्वमेवाकिञ्चित्करमिति भावः] [हरि हरि हतादरेत्यादि सर्वत्र योजनीयम्] ॥२॥ अनुवाद—चिरकालतक निदारुण विरहके तापसे परितप्त होकर न जाने वह क्या करेगी, न जाने क्या कहेगी? अहो!