गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः सर्गः - मुग्ध-मधुसूदनः १३१ श्रीराधाके विरहमें मुझे धन, जन, जीवन तथा निकेतन सब कुछ असार बोध हो रहा है। पद्यानुवाद- क्या न करेगी, क्या बोलेगी विरह-विदग्धा वनमें। राधा बिन है शेष मुझे क्या जगती में, जीवन में ॥ बालबोधिनी - विरही श्रीकृष्णकी अवस्थाका वर्णन करते हुए कहते हैं कि श्रीराधाके वियोगमें जो मुझपर बीत रही है, वही उसपर भी बीत रही होगी। कितनी आकुलता व्याकुलता अनुभव कर रही होगी? इस वियोगजनित दुःखानुभवका कारण मेरा अपराध ही है। मेरे ही कारण उसे इतना कष्ट हो रहा है। जब उससे मिलूँगा तो न जाने वह कोप तथा ईर्ष्या आदिकी अभिव्यक्ति कैसे करेगी? अपनी प्रिय सखीके निकट 'निर्दय', 'निष्ठुर' कहकर मुझपर अभियोग लगायेगी, न जाने क्या-क्या कहेगी? उसके अनन्तर मैं कहूँगा कि राधे, तुम्हारे अभावमें धन, जन, गोधन और गृह सम्पदा सब कुछ तुच्छ प्रतीत होता है ॥२॥ चिन्तयामि तदाननं कुटिल भ्रु-कोपभरेण। शोणपद्ममिवोपरि भ्रमताकुलं भ्रमरेण- हरि हरि हतादरतया... ॥३॥ अन्वय-कोपभरेण (कोपातिशयेन) कुटिलभ्रू (कुटिले वक्रे भ्रूवौ यत्र तादृशं) तदाननम् (तस्याः प्रियतमाया आननम्) उपरि भ्रमता भ्रमरेण आकुलं (व्याप्तं) शोणपद्ममिव (रक्तपङ्कजमिव) चिन्तयामि ॥३॥ अनुवाद - मैं श्रीराधाके मँडराते हुए श्याम भ्रमरोंके द्वारा परिवेष्टित आरक्त मुखकमलको प्रत्यक्षकी भाँति देख रहा हूँ, जो रोष-भारसे कुटिल भ्रूलतायुक्त रक्तपद्मकी शोभाको धारण किये हुए हैं।